
वह लेटरबॉक्स दिन में वहाँ नहीं था। यह बात अर्जुन को तीसरी रात समझ आई।
रात की शिफ़्ट ख़त्म करके वह हर रात उसी रास्ते से घर लौटता था — पुरानी दिल्ली की गली चूड़ीवालान, जहाँ दिन में चूड़ियों की खनक होती है और रात में सिर्फ़ कुत्तों के भौंकने की आवाज़। दूसरी रात उसने मोड़ पर एक लाल डाकघर देखा था — पुराने ज़माने वाला, गोल टोपी-सा ढक्कन। अजीब बात ये थी कि दिन में उसी मोड़ से गुज़रते हुए उसने वहाँ सिर्फ़ एक बंद पान की दुकान देखी थी।
तीसरी रात वह रुका। स्ट्रीटलाइट की पीली रौशनी में डाकघर दमक रहा था — जैसे अभी-अभी पेंट हुआ हो। अर्जुन ने जेब से एक पर्ची निकाली, उस पर लिखा — "ये डाकघर आधी रात को ही क्यों खुलता है?" — और पर्ची दरार में डाल दी।
"कुछ चिट्ठियाँ दिन के उजाले में शर्माती हैं। — सना"
जवाब अगली रात उसी डाकघर के मुँह में फँसा मिला — सुंदर, घुमावदार लिखावट में। अर्जुन की साँस अटक गई। उसने आस-पास देखा — गली ख़ाली थी।
वह रात उसने घर जाकर तीन चिट्ठियाँ लिखीं। सना ने एक का जवाब दिया — लंबा, हँसी-मज़ाक़ से भरा, और आख़िर में एक लाइन: "तुम्हारी लिखावट देखकर लगता है, तुम रात को जागने वाले इंसान हो। मैं भी।"
फिर तो यह सिलसिला बन गया। हर रात एक चिट्ठी, हर रात एक जवाब। सना मज़ाक़िया थी, तेज़ थी, और कभी-कभी इतनी उदास कि अर्जुन की छाती में कुछ चुभ जाता। उसने लिखा — "काश मैं तुम्हें देख पाता।" सना ने जवाब दिया — "काश तुम मुझे देख पाते। मगर कुछ दूरियाँ मीलों की नहीं होतीं, अर्जुन। कुछ दूरियाँ सालों की होती हैं।"
"मतलब?"
"मैं सन् 1962 से लिख रही हूँ।"
अर्जुन हँस पड़ा था — गली के बीचों-बीच, अकेला। फिर उसने चिट्ठी दोबारा पढ़ी। और तिबारा। लिखावट में कोई मज़ाक़ नहीं था।
अगली रात उसने परीक्षा ली। "कल शहर में क्या होगा, बताओ।"
जवाब आया — "कल दोपहर बादलों का एक अजीब रेला पूरब से आएगा, और शाम को ऐसी बारिश होगी जैसी इस साल नहीं हुई। तुम्हारी गली की बत्ती गुल हो जाएगी — मोमबत्ती जला लेना।"
अगली शाम वैसी ही बारिश हुई। गली की बत्ती गुल हो गई। अर्जुन मोमबत्ती की रौशनी में बैठा सना की चिट्ठी को देखता रहा — और पहली बार उसके हाथ काँपे।

"तुम सच में... वहाँ हो?"
"मैं उतनी ही सच हूँ जितनी ये चिट्ठियाँ।" उसने लिखा था। "और अर्जुन — मेरा वक़्त ख़त्म हो रहा है। ये डाकघर सिर्फ़ उनतीस चिट्ठियाँ लेता है। ये अट्ठाईसवीं है।"
अर्जुन ने गिना — सच में अट्ठाईस। उसकी उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
"फिर? उनतीसवीं के बाद क्या होगा?"
"डाकघर चला जाएगा। हमेशा के लिए।"
उस रात अर्जुन डाकघर के पास देर तक खड़ा रहा। उसने लेटरबॉक्स को छुआ — ठंडा लोहा, बिल्कुल असली। "सना," उसने धीरे से कहा, "मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ।"
कोई जवाब नहीं आया — जवाब तो चिट्ठियों में आते थे।
अगली रात — उनतीसवीं रात — डाकघर के मुँह में आख़िरी चिट्ठी थी। अर्जुन ने काँपते हाथों से खोली।
"मेरे अर्जुन,
मैंने तुम्हें पहली चिट्ठी कभी नहीं लिखी। पहली चिट्ठी तुमने लिखी थी — मुझे। साठ साल पहले, इसी डाकघर में, इसी मोड़ पर। मैं सिर्फ़ जवाब देती रही — हर जवाब के साथ तुमसे और जुड़ती रही।
आज रात आख़िरी चिट्ठी तुम लिखोगे। वही चिट्ठी, जो मुझे पहली बार मिली थी — वो चिट्ठी जिसने ये सब शुरू किया था। शब्द तुम्हें ख़ुद याद आ जाएँगे। लिखते वक़्त डरना मत।
और हाँ — चिट्ठी में अपना पता ज़रूर लिखना। साठ साल लंबे इंतज़ार में पते बहुत काम आते हैं।
तुम्हारी — सना"
अर्जुन की आँखों में आँसू थे। उसने पर्ची निकाली। कलम उठाई — और शब्द ख़ुद-ब-ख़ुद उतरने लगे, जैसे वह इन्हें बरसों से जानता हो —
"कुछ चिट्ठियाँ दिन के उजाले में शर्माती हैं — इसलिए मैं ये चिट्ठी आधी रात को लिख रहा हूँ। मेरा नाम अर्जुन है। मैं नहीं जानता ये चिट्ठी किस तक पहुँचेगी — मगर अगर तुम ये पढ़ रही हो, तो जान लो: कोई है, जो हर रात तुम्हारे जवाब का इंतज़ार करेगा। पता लिख रहा हूँ — आ जाना, किसी भी साल।"
उसने चिट्ठी दरार में डाली। डाकघर एक बार दमका — जैसे कोई दीया बुझने से पहले आख़िरी बार भभकता है — और फिर... वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ़ बंद पान की दुकान, ख़ाली मोड़, और भौंकता हुआ एक कुत्ता।
अर्जुन हफ़्तों तक हर रात उस मोड़ पर जाता रहा। डाकघर कभी नहीं लौटा।
फिर एक दिन वह पुरानी किताबों की दुकान में एक डायरी पर ठिठका — चमड़े की जिल्द, पन्ने पीले। दुकानदार ने कहा, "सन् 1963 की है, साहब। किसी सना नाम की औरत की।" अर्जुन के हाथ काँपने लगे। उसने आख़िरी पन्ना खोला — और स्याही ताज़ा थी, जैसे कल ही लिखी हो —
"आज रात डाकघर गया। उसने आख़िरी चिट्ठी लिख दी — वही, जो मुझे साठ साल पहले पहली बार मिली थी। अब मैं बूढ़ी हूँ, अर्जुन। मगर हर आधी रात, जब घड़ी बारह बजाती है, मैं खिड़की पर बैठकर तुम्हारी गली की तरफ़ देखती हूँ। पता मैंने सँभालकर रखा है। साठ साल लंबे इंतज़ार में पते बहुत काम आते हैं।"
डायरी में एक तस्वीर भी थी — लाल डाकघर के पास खड़ी एक युवती, कैमरे की तरफ़ मुस्कुराती हुई। तस्वीर के पीछे, उसी घुमावदार लिखावट में एक पता था — पुरानी दिल्ली का ही कोई पता।
अगली शाम अर्जुन उस पते पर था — एक पुरानी हवेली, अब सँवरी हुई। दरवाज़ा खुला — और सामने बानवे साल की एक बूढ़ी औरत खड़ी थी, आँखों में वही गहराई जो चिट्ठियों में थी।

वह एक पल उसे देखती रही। फिर धीरे से बोली — "तुम वही हो... चिट्ठियों वाले।"
अर्जुन के गले में कुछ अटक गया। "सना..."
"मैंने साठ साल तुम्हारा इंतज़ार किया, अर्जुन," उसने कहा, और उसका हाथ थाम लिया — सूखा, काँपता, मगर गर्म। "हर आधी रात।"
"मैं आ गया," अर्जुन ने कहा — और बूढ़ी उँगलियों को अपने दोनों हाथों में ले लिया।
वह उसके माथे पर झुका। उसने आँखें बंद कर लीं — साठ साल का इंतज़ार, उनतीस चिट्ठियाँ, और एक आधी रात का डाकघर — सब कुछ उस एक पल में सिमट आया। बाहर गली में स्ट्रीटलाइट जली, और कहीं दूर से रात की पहली घंटी बजी — जैसे कोई डाकिया, बहुत दूर से, आख़िरी चिट्ठी पहुँचाकर लौट रहा हो।
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