(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) आधी रात को जब चाँद झील के ठीक बीचोंबीच उतर आया, तो पानी से एक आवाज़ उठी — साफ़, धीमी, और बिल्कुल जानी-पहचानी — "अनाया।" अनाया ठिठक गई। उसके हाथ में मिट्टी का अधूरा दीया था, और पैरों के पास झील की लहरें चाँदनी को तोड़-मरोड़ रही थीं। पंद्रह साल में वो पहली बार नीलताल लौटी थी, और किसी ने उसका नाम इस तरह नहीं लिया था — जैसे नाम न हो, कोई पुराना कर्ज़ हो। वो यहाँ अपनी दादी की झोंपड़ी का फैसला करने आई थी — बेचना है या रखना है। शहर में वो सिरेमिक कलाकार थी; मछलियों के आकार के दीये बनाना उसका काम था, और यही काम उसे यहाँ तक खींच लाया था। पर नीलताल की हवा में कोई ऐसी अनकही बात थी जो उसे बेचैन कर रही थी — जैसे कोई अधूरी बात, जो उसने यहीं कहीं छोड़ दी थी। नीलताल का रखवाला सुबह घाट पर उसकी मुलाकात रोहन से हुई। तीस साल का रोहन झील का रखवाला था — नाव चलाता था, किनारे की सफाई देखता था, और पर्यटकों को एक ही बात सख्ती से कहता था: गहरे पानी की तरफ रात को मत जाना। "वहाँ क्या है?" अनाया ने पूछा। रोहन ने उसकी ओर देखा — लंबी, गौर से देखने वाली नज़र,...
ज्योतिषी ने कुंडली देखी, कलम रख दी, और बोला — "बेटी, ये कुंडली अधूरी है। इसमें जो लिखा है, वो अभी हुआ ही नहीं।" साक्षी की साँस एक पल को अटक गई। अट्ठाईस साल की उम्र में उसने बहुत-से ज्योतिषी देखे थे — माँ के कहने पर — पर किसी ने उसकी कुंडली को "अधूरी" नहीं कहा था। उज्जैन की उस तंग गली में शाम उतर रही थी। महाकाल के मंदिर से आती घंटियों की आवाज़ दुकान के छोटे-से दरवाज़े से अंदर आ रही थी। दीये की लौ में अस्सी साल के पंडित वासुदेव शास्त्री का चेहरा किसी पुराने ताम्रपत्र जैसा लग रहा था। "अधूरी मतलब?" साक्षी ने पूछा। "मतलब ये," वासुदेव ने काँपती उँगली से कुंडली के एक खाने पर निशान लगाया, "कि तुम्हारा विवाह-योग किसी ऐसे व्यक्ति से बँधा है, जिससे तुम अभी तक मिली ही नहीं। और..." उनकी नज़र दुकान के कोने में रखे लोहे के संदूक़ की ओर चली गई। "और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा।" साक्षी हँस पड़ी — वो हँसी जो लोग तब हँसते हैं, जब डर को छिपाना हो। "पंडितजी, माँ ने तो लड़का भी तय कर लिया है। इंदौर का है, बैंक में है। अगले महीने सगाई है। आप...