(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।)
आधी रात को जब चाँद झील के ठीक बीचोंबीच उतर आया, तो पानी से एक आवाज़ उठी — साफ़, धीमी, और बिल्कुल जानी-पहचानी — "अनाया।"
अनाया ठिठक गई। उसके हाथ में मिट्टी का अधूरा दीया था, और पैरों के पास झील की लहरें चाँदनी को तोड़-मरोड़ रही थीं। पंद्रह साल में वो पहली बार नीलताल लौटी थी, और किसी ने उसका नाम इस तरह नहीं लिया था — जैसे नाम न हो, कोई पुराना कर्ज़ हो।
वो यहाँ अपनी दादी की झोंपड़ी का फैसला करने आई थी — बेचना है या रखना है। शहर में वो सिरेमिक कलाकार थी; मछलियों के आकार के दीये बनाना उसका काम था, और यही काम उसे यहाँ तक खींच लाया था। पर नीलताल की हवा में कोई ऐसी अनकही बात थी जो उसे बेचैन कर रही थी — जैसे कोई अधूरी बात, जो उसने यहीं कहीं छोड़ दी थी।
नीलताल का रखवाला
सुबह घाट पर उसकी मुलाकात रोहन से हुई। तीस साल का रोहन झील का रखवाला था — नाव चलाता था, किनारे की सफाई देखता था, और पर्यटकों को एक ही बात सख्ती से कहता था: गहरे पानी की तरफ रात को मत जाना।
"वहाँ क्या है?" अनाया ने पूछा।
रोहन ने उसकी ओर देखा — लंबी, गौर से देखने वाली नज़र, जैसे वो उसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो। "वहाँ एक सुनहरी मछली रहती है," उसने कहा। "मेरे दादा कहते थे, वो सिर्फ़ पूर्णिमा की रात बोलती है। और सिर्फ़ उससे बोलती है, जिसने कभी उसे आज़ाद किया हो।"
अनाया हँस पड़ी। "और तुम इस कहानी के पहरेदार हो?"
"मैं इस झील का पहरेदार हूँ," रोहन ने शांति से कहा। "कहानियाँ अपनी हिफाज़त खुद कर लेती हैं।"
उस दिन अनाया ने झोंपड़ी की सफाई की, दादी की पुरानी डायरी खोली, और एक पन्ने पर रुक गई। बच्चे की टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में लिखा था — "मैंने आज सुनहरी मछली को जाल से निकाला। मैंने वादा किया, हर पूर्णिमा को आऊँगी।" नीचे एक और हाथ की लिखावट थी, दादी की — "वादा निभाना, बेटा। कुछ वादे पानी में नहीं डूबते।"
अनाया का दिल ज़ोर से धड़का। उसे कुछ भी याद नहीं था। न जाल, न मछली, न वादा। सिर्फ़ एक धुँधली-सी छवि — छोटे-छोटे हाथ, एक चमकती हुई चीज़, और किनारे पर खड़ा एक लड़का जो हँस रहा था।
पूर्णिमा की रात
पूर्णिमा की रात अनाया फिर घाट पर गई। उसने रोहन की चेतावनी को जान-बूझकर अनसुना किया था — या शायद चाँदनी ने उसे बुलाया था। झील शीशे जैसी शांत थी। चाँद बीचोंबीच था।
तभी पानी हिला। एक सुनहरी लकीर गहराई से उठी, और मछली पानी की सतह के पास आकर रुक गई। उसकी आँखें छोटी-छोटी, पर उनमें वो बात थी जो मछलियों में नहीं होती — इंतज़ार।
"अनाया," मछली ने कहा। "तुम देर से आई हो। पंद्रह पूर्णिमाएँ बीत गईं।"
अनाया के पैर काँप गए। "तुम... तुम सच में बोलती हो?"
"मैं सिर्फ़ सच बोलती हूँ," मछली ने कहा। "और सच यह है कि तुमने एक वादा किया था। और एक लड़का था, जो तुम्हारी तरफ से वो वादा निभाता रहा। हर पूर्णिमा को वो यहाँ आता था, और मुझे तुम्हारे बारे में बताता था।"
"कौन?" अनाया ने फुसफुसाकर पूछा।
मछली पानी में डूबी, और उसकी सुनहरी पूँछ चाँदनी में एक आख़िरी बार चमकी। "उससे पूछो, जो इस झील का रखवाला है।"
लौटी हुई याद
अनाया दौड़ती हुई रोहन के पास गई। वो घाट की आख़िरी नाव में बैठा था, चाँद को देख रहा था — जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।
"तुम थे वो लड़का," अनाया ने कहा। यह सवाल नहीं था।
रोहन ने धीरे से सिर हिलाया। "उस दिन जाल तुम्हारे हाथ में अटका था, और चाकू मेरे हाथ में। हमने मिलकर उसे काटा था। तुमने वादा किया, और मैं... मैं रुक गया। तुम शहर चली गईं, और मैं हर पूर्णिमा को यहाँ आता रहा — मछली को तुम्हारी कहानियाँ सुनाता रहा, ताकि वो तुम्हें भूल न जाए।"
"तुमने मुझे कभी ढूँढा क्यों नहीं?" अनाया की आवाज़ भर्रा गई।
"क्योंकि वादा तुम्हारा था," रोहन ने कहा, और पहली बार उसकी आँखों में वो सारी पंद्रह साल की तड़प उतर आई। "और मैं चाहता था कि तुम अपनी मर्ज़ी से लौटो। किसी कहानी के दबाव से नहीं।"
अनाया ने उसका हाथ थामा। उसका हाथ ठंडा था, पर उसकी पकड़ में एक अजीब-सी गर्माहट थी — जैसे पंद्रह साल की धूप एक साथ उतर आई हो। "मैं लौट आई हूँ," उसने कहा। "अपनी मर्ज़ी से।"
चाँदनी में, नाव धीरे-धीरे हिल रही थी। रोहन ने उसके चेहरे की ओर देखा, और अनाया ने पहली बार किसी की आँखों में अपना पूरा अतीत देखा — वो बच्ची, वो जाल, वो वादा। उसके होंठ काँपे, और फिर दोनों के बीच की सारी दूरी मिट गई। चाँद ने शरमाकर बादल की ओट ले ली, और झील ने उनकी धड़कनों को अपने भीतर समेट लिया।
सुबह जब अनाया की आँख खुली, तो घाट पर दो मिट्टी के दीये जल रहे थे — एक उसने बनाए थे, एक रोहन ने। और झील के बीचोंबीच, सुनहरी मछली ने पानी से एक बार उछाल ली, जैसे विदाई नहीं, स्वागत कह रही हो।
वादा, जो पूरा हुआ
अनाया ने झोंपड़ी बेचने का इरादा छोड़ दिया। उसने किनारे पर एक छोटा-सा स्टूडियो खोला — नाम रखा "सुनहरी"। वहाँ वो मछलियों के आकार के दीये बनाती है, और हर दीये के नीचे एक छोटी-सी पंक्ति लिखती है — "कुछ वादे पानी में नहीं डूबते।"
रोहन अब भी झील का रखवाला है, पर अब वो अकेला नहीं रहता। हर पूर्णिमा की रात दोनों घाट पर बैठते हैं, और झील के बीचोंबीच सुनहरी मछली चाँदनी में एक बार उछलती है — जैसे कह रही हो, वादा पूरा हुआ।
और नीलताल के लोग कहते हैं कि जिस रात दो लोग सच्चे दिल से एक-दूसरे को चुनते हैं, उस रात झील का पानी थोड़ा और सुनहरा हो जाता है।
(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।)
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