ज्योतिषी ने कुंडली देखी, कलम रख दी, और बोला — "बेटी, ये कुंडली अधूरी है। इसमें जो लिखा है, वो अभी हुआ ही नहीं।"
साक्षी की साँस एक पल को अटक गई। अट्ठाईस साल की उम्र में उसने बहुत-से ज्योतिषी देखे थे — माँ के कहने पर — पर किसी ने उसकी कुंडली को "अधूरी" नहीं कहा था।
उज्जैन की उस तंग गली में शाम उतर रही थी। महाकाल के मंदिर से आती घंटियों की आवाज़ दुकान के छोटे-से दरवाज़े से अंदर आ रही थी। दीये की लौ में अस्सी साल के पंडित वासुदेव शास्त्री का चेहरा किसी पुराने ताम्रपत्र जैसा लग रहा था।

"अधूरी मतलब?" साक्षी ने पूछा।
"मतलब ये," वासुदेव ने काँपती उँगली से कुंडली के एक खाने पर निशान लगाया, "कि तुम्हारा विवाह-योग किसी ऐसे व्यक्ति से बँधा है, जिससे तुम अभी तक मिली ही नहीं। और..." उनकी नज़र दुकान के कोने में रखे लोहे के संदूक़ की ओर चली गई। "और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा।"
साक्षी हँस पड़ी — वो हँसी जो लोग तब हँसते हैं, जब डर को छिपाना हो। "पंडितजी, माँ ने तो लड़का भी तय कर लिया है। इंदौर का है, बैंक में है। अगले महीने सगाई है। आप बस ये बता दीजिए — कुंडली मिलती है या नहीं।"
"उस लड़के से ब्याह मत करना।" वासुदेव की आवाज़ में वो ठहराव था, जो सिर्फ़ अस्सी साल की उम्र दे सकती है। "मैं इस मिलान से इनकार करता हूँ।"
"पर क्यों?"
वासुदेव ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने संदूक़ खोला — अंदर रजिस्टरों की क़तार, चालीस-पचास साल पुराने। एक रजिस्टर निकाला, उसे खोला, और साक्षी की कुंडली के बग़ल में रख दिया।

दो कुंडलियाँ। एक आज की — साक्षी की। एक चालीस साल पुरानी — किसी और लड़की की।
खाने एक-जैसे। नक्षत्र एक-जैसे। योग एक-जैसे।
"उन्नीस सौ छियासी," वासुदेव ने धीरे से कहा। "इसी उज्जैन में। एक लड़की की कुंडली बनाई थी मैंने — ब्याह का मुहूर्त भी मैंने ही निकाला था।" उनकी आवाज़ भर्रा गई। "बारात से एक रात पहले दूल्हा क्षिप्रा में डूब गया। नाव पलटी थी।"
साक्षी के हाथ ठंडे पड़ गए।
"चालीस साल से ये रजिस्टर खुला पड़ा है, बेटी। वो योग अधूरा रह गया था। और अब..." उन्होंने साक्षी की कुंडली की ओर देखा, "अब वही योग तुम्हारी कुंडली में लौट आया है।"
साक्षी उस रात सो नहीं सकी। होटल के कमरे में क्षिप्रा की चाँदनी खिड़की से अंदर आ रही थी, और कानों में वासुदेव की बात गूँज रही थी।
फ़ोन बजा — माँ थीं। "लड़के वालों ने हाँ कर दी, साक्षी। पंडित को कुंडली दिखा दी?"
"दिखा दी, माँ," साक्षी ने कहा, और फ़ोन रख दिया। वो माँ को क्या बताती — कि पंडित ने मिलान से इनकार कर दिया है?
अगली सुबह वो घाट पर उतरी — बिना किसी मक़सद के। सीढ़ियों पर भीड़ थी, दिये तैर रहे थे, और एक लड़का पुरानी हवेली की तस्वीरें ले रहा था। तैंतीस साल का होगा — कंधे पर कैमरा था।
उसने साक्षी को देखा, कैमरा नीचे किया, और मुस्कुराया। "आप भी वास्तुकला की दीवानी हैं, या बस घाट की?"
"बस घाट की," साक्षी ने कहा — और ख़ुद हैरान रह गई। वो अजनबियों से बात नहीं करती थी।
"निहार," उसने हाथ बढ़ाया। "भोपाल से। इन हवेलियों का restoration survey कर रहा हूँ।"
"साक्षी। इंदौर से।" उसने हाथ मिलाया — और एक पल को लगा, जैसे ये हाथ उसने पहले भी थामा हो। उसने जल्दी से हाथ छुड़ा लिया।
बातें होने लगीं — हवेलियों की, क्षिप्रा की, उज्जैन की। निहार ने बताया — वो उज्जैन में ही पैदा हुआ था। छह महीने का था जब परिवार भोपाल चला गया।
"अजीब बात है," उसने क्षिप्रा की ओर देखते हुए कहा, "मैं इस शहर को याद नहीं करता, पर हर गली जानी-पहचानी लगती है। और..." वो रुका। "और एक सपना है — बरसों से। सीढ़ियाँ, तैरते दिये, और एक लड़की का चेहरा — जो कभी साफ़ नहीं दिखता।"
साक्षी की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
"तुम्हारी जन्मतिथि क्या है?" उसने अचानक पूछा।
निहार ने तारीख़ बताई — और समय भी, जो माँ ने बचपन में रटाया था। "रात के ठीक बारह बजे। माँ कहती हैं — जिस घड़ी मैं पैदा हुआ, उसी घड़ी क्षिप्रा में..." वो रुका। "पता नहीं, दादी की कोई पुरानी कहानी है। उस रात नदी में कोई डूबा था।"
साक्षी का कुल्हड़ हाथ से छूटते-छूटते बचा।
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दोपहर को वो निहार को वासुदेव की दुकान पर ले गई। पंडित ने निहार को देखा — और उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"तुम..." उनकी आवाज़ काँप रही थी।
"बैठो, बेटा।" उन्होंने काँपते हाथों से रजिस्टर खोला — चालीस साल पुराना पन्ना। "जन्म का समय बताओ।"
निहार ने बताया। वासुदेव ने वो पन्ना और एक कोरा काग़ज़ साथ रख दिए — और दोनों पर तेज़ी से खाने बनाने लगे। दुकान के बाहर मंदिर की घंटी बजी। दीये की लौ हिली। किसी ने साँस भी नहीं ली।

वासुदेव ने कलम रख दी। उनके हाथ काँप रहे थे।
"हू-ब-हू," उन्होंने फुसफुसाया। "तिथि, नक्षत्र, लग्न — सब।" उन्होंने निहार की ओर देखा, आँखों में आँसू। "उस रात — जिस रात वो दूल्हा डूबा — उसी रात, उसी शहर में, उसी घड़ी तुम पैदा हुए, बेटा। वक़्त ने अपना हिसाब ख़ुद चुकता किया। जो योग अधूरा रह गया था, वो तुम्हारे साथ लौट आया।"
निहार की हँसी फीकी थी। "पंडितजी, ये... संयोग भी हो सकता है।"
"संयोग?" वासुदेव ने साक्षी की कुंडली उठाई और चालीस साल पुरानी उस लड़की की कुंडली के बग़ल में रख दी। "तो ये भी संयोग है? चालीस साल का फ़ासला, और दोनों कुंडलियाँ एक-जैसी? बेटा, मैंने हज़ारों कुंडलियाँ देखी हैं। ऐसा... मैंने कभी नहीं देखा।"
साक्षी ने दोनों कुंडलियों को देखा — अपनी, और उस लड़की की जो चालीस साल पहले दुल्हन नहीं बन सकी थी। जैसे वक़्त ने कार्बन पेपर रखकर नक़ल उतारी हो।
"तो अब?" उसने धीरे से पूछा।
वासुदेव ने रजिस्टर बंद किया — चालीस साल में पहली बार। "अब मुहूर्त निकलेगा। और इस बार..." उनकी आवाज़ में दृढ़ता थी, "इस बार मुहूर्त अधूरा नहीं रहेगा।"
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शाम को घाट पर भीड़ थी। वासुदेव ने क्षिप्रा में दिये तैराए — दो नहीं, चार।
"दो उनके लिए," उन्होंने कहा, "जो चालीस साल पहले नहीं मिल सके। और दो..." उनकी आँखें भीग गईं, "तुम दोनों के लिए।"
चार दिये पानी पर तैरने लगे — चार लौ, एक लकीर में — जब तक चाँदनी में घुल नहीं गए।
निहार ने साक्षी का हाथ थामा। उसने हाथ नहीं छुड़ाया।
"डर लग रहा है?" उसने पूछा।
"बहुत," साक्षी ने कहा। "तुम्हें?"
"मुझे भी।" वो मुस्कुराया। "पर इस डर के बीच भी लग रहा है — जैसे हम यहाँ पहले भी आए हों। इन्हीं सीढ़ियों पर। इन्हीं दियों के साथ।"
क्षिप्रा बह रही थी। मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं। निहार ने उसके चेहरे को हाथों में लिया — धीरे, जैसे कोई पुरानी कुंडली का पन्ना पलटता है, टूटने के डर से। उनके होंठ मिलने ही वाले थे—

बाक़ी रात सिर्फ़ क्षिप्रा जानती है।
अगली सुबह वासुदेव ने दुकान का ताला खोला, रजिस्टर को संदूक़ में रखा — और चालीस साल में पहली बार संदूक़ पर ताला लगाया।
बाहर धूप निकली थी। उज्जैन जाग रहा था।
कुछ कुंडलियाँ आसमान में नहीं लिखी होतीं — वो इंतज़ार में लिखी होती हैं।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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