आधी रात को कठपुतली-घर में घुंघरू बजे — पर वहाँ कोई नहीं था।
इरा ने कैमरा नीचे रखा। वो जोधपुर के पुराने शहर में, यश के नीले मकान के आँगन में खड़ी थी, और उसके सामने बाँस का छोटा-सा मंच था। मंच पर राजा-रानी की दो कठपुतलियाँ लटकी थीं — धागे ढीले, सिर झुके। और फिर भी, घुंघरू बजे थे। साफ़। दो बार।
"तुमने सुना?" उसने फुसफुसाया।
यश उसके पास खड़ा था — तैंतीस साल का, हाथों में लकड़ी की खुरचन की महक, आँखों में वो थकान जो हुनरमंद लोगों में होती है। उसने कुछ नहीं कहा। बस मंच की तरफ़ देखा।
इरा अट्ठाईस साल की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्ममेकर थी — मुंबई से आई थी, "मरते हुनर" सीरीज़ के लिए राजस्थान के कठपुतली कलाकारों पर फ़िल्म बनाने। यश तीसरी पीढ़ी का कठपुतली-साज़ था। तीन दिन से वो उसके घर शूट कर रही थी। तीन दिन से सब कुछ सामान्य था।
आज रात कुछ सामान्य नहीं था।
"शायद हवा," यश ने आख़िर कहा। पर उसकी आवाज़ में यक़ीन नहीं था।
हवा नहीं थी। आँगन की लालटेन की लौ सीधी जल रही थी।
* * *
अगली रात इरा ने कैमरा छिपाकर लगाया।
यश सोने चला गया था — या सोने का नाटक करके अपने कमरे में चला गया था। इरा आँगन के अँधेरे कोने में बैठी रही, कैमरे की छोटी-सी स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए।
रात के एक बजे मंच हिला।
पहले धीरे — जैसे कोई साँस ले रहा हो। फिर राजा की कठपुतली का हाथ उठा। धागे तने। रानी की कठपुतली ने सिर उठाया। और दोनों — बिना किसी के छुए — नाचने लगे।
इरा की साँस रुक गई। ये कोई हवा नहीं थी। ये नाच था — पूरा, सधा हुआ, प्रेम-प्रसंग का नाच। राजा रानी के चारों ओर घूमता, रानी शर्माती, दोनों के घुंघरू एक ताल पर बजते। और सबसे अजीब — रानी की कठपुतली का चेहरा।
वो चेहरा इरा का था।
उसकी नाक की बनावट, उसके होठों का कटाव, उसकी आँखों का झुकाव — लकड़ी में तराशा हुआ, रंगों में रँगा हुआ, पर बेशक उसी का चेहरा।
इरा के हाथ काँपने लगे। कैमरा अब भी रिकॉर्ड कर रहा था।
तभी पीछे से आवाज़ आई — "तुम्हें ये नहीं देखना चाहिए था।"
यश खड़ा था। उसके चेहरे पर ग़ुस्सा नहीं था। शर्म थी।
* * *
"मैंने ये रानी छह महीने पहले बनाई थी," यश ने कहा। दोनों आँगन में बैठे थे। लालटेन की रोशनी में उसके हाथ काँप रहे थे। "तुमसे मिलने से बहुत पहले।"
"तो मेरा चेहरा...?"
"मैंने ये चेहरा सपने में देखा था।" उसने कहा। "तीन साल से, हर पूर्णिमा की रात, एक ही सपना — एक लड़की आँगन में खड़ी है, कैमरा हाथ में, और रानी की कठपुतली उसी के चेहरे वाली है। मैं जागता, तो चेहरा धुँधला हो जाता। छह महीने पहले मैंने उसे लकड़ी में उतार दिया — ताकि भूल न जाऊँ।"
इरा चुप रही। फ़िल्ममेकर का दिमाग़ कह रहा था — ये फ़िल्म का सबसे बड़ा शॉट है। औरत का दिल कह रहा था — भागो मत, सुनो।
"और ये नाच?" उसने पूछा। "बिना धागे खींचे?"
यश ने अपने दादाजी की डायरी निकाली — चमड़े की जिल्द, पीले पन्ने। एक पन्ना खोला। लिखा था: "कठपुतलियाँ उसी के लिए नाचती हैं, जिसका दिल धागों से बँधा हो। ये हुनर नहीं, इश्क़ है — लकड़ी में बसा हुआ।"
"दादाजी कहते थे," यश ने धीरे से कहा, "ये कठपुतलियाँ उसी रात नाचती हैं, जब इस घर में वो दोनों हों — जिनका इश्क़ अभी अधूरा हो।"
"वो दोनों?"
यश ने उसकी आँखों में देखा। कुछ नहीं कहा। कहना ज़रूरी भी नहीं था।
* * *
पाँचवीं रात आँधी आई। बिजली गई। पूरा मोहल्ला अँधेरे में डूब गया।
इरा और यश आँगन में थे — लालटेन की एक लौ, मंच की परछाइयाँ दीवारों पर नाचती हुईं। हवा में रेत की महक थी। दूर कहीं मेहरानगढ़ किले की रोशनी टिमटिमा रही थी।
"तुम्हारी फ़िल्म कब ख़त्म होगी?" यश ने पूछा।
"परसों।" इरा ने कहा। "फिर मुंबई।"
"और फिर?"
"और फिर... पता नहीं।"
ख़ामोशी। लालटेन की लौ हिली। मंच पर राजा-रानी की कठपुतलियाँ हल्के से डोलीं — जैसे साँस ले रही हों।
यश ने इरा का हाथ थामा। उसके हाथ खुरदरे थे — लकड़ी, रंग, धागों के निशान। इरा ने हाथ नहीं छुड़ाया।
"इरा," उसने कहा, और उसका नाम उसके मुँह में किसी प्रार्थना जैसा लगा।
उनके चेहरे क़रीब आए। लालटेन की रोशनी में उसकी आँखों में परछाइयाँ नाच रही थीं। उसके होठों पर वो सवाल था, जो तीन रातों से दोनों के बीच तैर रहा था। इरा की साँसें तेज़ थीं। यश का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा, कठपुतलियों के घुंघरू भी उसी ताल पर बजने लगे हैं।
और फिर मंच से घुंघरू बजे — धीमे, मीठे, जैसे आशीर्वाद दे रहे हों।
बिजली आ गई। पर दोनों ने आँखें नहीं खोलीं।
* * *
सुबह छत पर चाय पीते हुए, नीले शहर के ऊपर धूप फैली थी। नीचे गली में कोई भजन गा रहा था। इरा के हाथ में कुल्हड़ था, यश के हाथ में छेनी।
"क्या बना रहे हो?" इरा ने पूछा।
यश ने लकड़ी का एक छोटा-सा टुकड़ा दिखाया — दो चेहरे, एक ही लकड़ी में, हाथ थामे हुए। एक चेहरा उसका था। दूसरा — इरा का।
"नई जोड़ी," उसने कहा। "राजा-रानी अब रिटायर होंगे।"
इरा हँसी — और हँसते-हँसते उसकी आँखें भर आईं।
"तुम्हारी फ़िल्म?" यश ने पूछा।
"फ़िल्म बनेगी," इरा ने कहा। "पर वो रात वाला शॉट... वो मैं किसी को नहीं दिखाऊँगी। कुछ कहानियाँ कैमरे के लिए नहीं होतीं। कुछ सिर्फ़ दो लोगों के लिए होती हैं।"
उस रात — इरा की आख़िरी रात — पूरा कठपुतली-परिवार नाचा। राजा, रानी, और बीच में नई जोड़ी — हाथ थामे, घुंघरू बजाते। और पहली बार, नाच के अंत में राजा की कठपुतली कैमरे की तरफ़ मुड़ी — और झुककर सलाम किया।
इरा ने कैमरा बंद कर दिया।
कुछ कहानियाँ रिकॉर्ड नहीं की जातीं। उन्हें जिया जाता है।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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