आधी रात को निहारिका की आँख उस धुन पर खुली — वही धुन जो वो बचपन से अपने सपनों में सुनती आई थी।
खिड़की के बाहर चाँद ताल पर कोहरा तैर रहा था, और कोहरे के उस पार से बाँसुरी बज रही थी। बजाने वाला कोई दिख नहीं रहा था — बस धुन थी, पानी पर तैरती हुई, सीधे उसके सीने में उतरती हुई।
उनतीस साल की निहारिका मुंबई में म्यूज़िक वीडियो डायरेक्ट करती थी। तीन हफ़्ते पहले वो इस पहाड़ी क़स्बे में आई थी — अपने अगले वीडियो की लोकेशन खोजने, और थोड़ी नींद भी।
नींद तो पहले ही दिन से रूठी हुई थी। पर ये धुन... ये धुन उसने पहले कहाँ सुनी थी?
वो कंबल लपेटे बरामदे में आ गई। झील के उस पार, बाँसों के झुरमुट के पास, एक छोटी-सी रोशनी टिमटिमा रही थी — जैसे कोई दीया। धुन वहीं से आ रही थी।
और फिर, एक पल में, धुन रुक गई। सन्नाटा इतना गहरा कि निहारिका को अपनी साँसों की आवाज़ सुनाई देने लगी।
उसने फ़ोन उठाया — रिकॉर्डिंग ऑन थी, पर अब रिकॉर्ड करने को कुछ नहीं बचा था। सिर्फ़ तीन मिनट की धुन, अधूरी।

सुबह वो नाव वाले बूढ़े से पूछ बैठी, "रात को झील के उस पार बाँसुरी कौन बजाता है?"
बूढ़ा हँसा, "बजाता नहीं, बिटिया — बजती है। वो अद्वैत की दुकान है। हर पूर्णिमा की रात उसकी एक बाँसुरी खुद बज उठती है।"
"खुद? मतलब?"
"मतलब यही कि हाथ किसी के नहीं होते।" बूढ़े ने चप्पू पानी में डुबोया। "उसके दादाजी कहते थे — बाँस भूलता नहीं।"
निहारिका की उँगलियाँ फ़ोन पर कस गईं। "बाँस भूलता नहीं" — ये जुमला उसने भी कहीं सुना था। बहुत पहले। बहुत धुँधला।
दोपहर को वो झील के उस पार पहुँची। बाँसों के बीच एक लकड़ी का घर — ऊपर टीन की छत, बाहर तख़्ती: "बाँसुरी घर — अद्वैत"।
अंदर बाँस की ख़ुशबू, लकड़ी का बुरादा, और दीवारों पर टँगी दर्जनों बाँसुरियाँ — छोटी, बड़ी, हर साइज़ की। एक कोने में इकतीस साल का अद्वैत बाँस छील रहा था — कंधे मज़बूत, आँखें काम में धँसी।
"अद्वैत?"
उसने नज़र उठाई। "कहिए।"
निहारिका ने फ़ोन की रिकॉर्डिंग बजाई — वो तीन मिनट की अधूरी धुन। अद्वैत के हाथ रुक गए।
"ये... ये आपने कहाँ सुनी?" उसकी आवाज़ में हैरानी से ज़्यादा कुछ और था — जैसे कोई पुराना डर।
"कल रात। झील के उस पार से। आपके यहाँ से।"
वो देर तक चुप रहा। फिर उठा, अलमारी से एक पुरानी कॉपी निकाली — पन्ने पीले, किनारे मुड़े।
"मेरे दादाजी की नोटबुक।" उसने एक पन्ना खोला — उस पर हाथ से लिखी संगीत-लिपि। "ये धुन। पच्चीस साल पुरानी एंट्री — 'झील पार वाले की धुन'।"
निहारिका की साँस थम गई। "मेरे पापा... मेरे पापा यही धुन गुनगुनाते थे। मैं छोटी थी — वो मुझे गोद में लेकर झील किनारे बैठते थे, और यही धुन..."
"आपके पापा यहाँ आते थे?"
"एक बार। मैं चार साल की थी।" उसकी आँखें भर आईं। "उसके बाद वो कभी लौट नहीं पाए।"
अद्वैत ने कॉपी का पन्ना उसकी तरफ़ बढ़ाया। नीचे दादाजी की लिखावट: "बाँस काटा — पूर्णिमा की रात। इस बाँस की बाँसुरी उसी के लिए बजेगी, जो इस धुन को सपने में सुन चुका हो।"
"मतलब ये बाँसुरी..."
"आधी बनी है।" अद्वैत ने स्टैंड की तरफ़ इशारा किया — वहाँ एक अधूरी बाँसुरी रखी थी, छेद आधे छिले। "दादाजी इसे पूरा नहीं कर पाए। और हर पूर्णिमा ये खुद बज उठती है — अधूरी धुन। जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो।"
निहारिका के रोंगटे खड़े हो गए। "तो कल रात जो बजी..."
"वो आप थीं।" अद्वैत की नज़रें उससे मिलीं। "पच्चीस साल में पहली बार बाँसुरी ने धुन बदली — कल रात उसने वो हिस्सा बजाया, जो नोटबुक में लिखा ही नहीं है।"

"मैं इसे अपने वीडियो में रिकॉर्ड करना चाहती हूँ," निहारिका बोली। "ये धुन... ये मेरी कहानी का हिस्सा है।"
अद्वैत का चेहरा सख़्त हो गया। "नहीं। ये बिकने के लिए नहीं बनी।"
"मैं खरीदना नहीं चाहती — बस एक बार, कैमरे के सामने..."
"मैंने कहा न — नहीं।" उसने बाँस उठाया, बात ख़त्म। "दादाजी की वसीयत थी — ये बाँसुरी बाज़ार की नहीं है।"
निहारिका चुपचाप बाहर आ गई। झील किनारे बैठकर उसने फ़ोन में वो तीन मिनट फिर सुने — और पहली बार ध्यान दिया: धुन के आख़िर में एक ठहराव था, जैसे कोई सवाल अधूरा छूट गया हो।
शाम को वो फिर गई — इस बार खाली हाथ नहीं, अपने पापा की एक पुरानी तस्वीर लेकर। तस्वीर में पापा झील किनारे बैठे थे, गोद में चार साल की निहारिका, होठों पर वही धुन।
अद्वैत ने तस्वीर देखी — और उसके हाथ काँप गए। "ये जगह... ये तो इसी घाट की है।"
"पापा कहते थे — कुछ धुनें जगहों में बस जाती हैं।" निहारिका की आवाज़ धीमी थी। "शायद वो सच कहते थे।"
उस रात अद्वैत ने वो अधूरी बाँसुरी उठाई — पच्चीस साल बाद पहली बार किसी ने उसे पूरा करने का फ़ैसला किया।
पूर्णिमा की रात। झील किनारे दोनों बैठे थे — बीच में वो बाँसुरी, अब पूरी। चाँद ठीक सिर के ऊपर।
बारह बजते ही बाँसुरी हिली — किसी अदृश्य साँस से। और धुन शुरू हुई।
वही धुन — पर इस बार अधूरी नहीं। धुन आगे बढ़ी, उस ठहराव को पार करके, एक नए हिस्से में — जैसे कोई जवाब दे रहा हो। निहारिका की आँखों से आँसू बहे — ये वो हिस्सा था, जो वो बचपन से सपनों में ढूँढती आई थी और कभी पा नहीं पाई थी।
धुन जब थमी, तो सन्नाटे में सिर्फ़ पानी की छपछपाहट थी।
अद्वैत ने बाँसुरी उठाकर उसके हाथों में रख दी। "दादाजी लिख गए थे — बाँसुरी उसी के लिए बजेगी, जो इस धुन को सपने में सुन चुका हो। अब ये आपकी है।"
निहारिका ने बाँसुरी थामी — बाँस अब भी गरम था, जैसे अभी-अभी किसी ने उसे छुआ हो।
"अद्वैत..." उसने उसका हाथ पकड़ लिया। चाँदनी में दोनों के चेहरे इतने पास आ गए कि साँसें मिल गईं।
जब उनके होठ मिले, तो लगा झील ने भी एक पल को साँस रोक ली हो — कहीं दूर बाँसों के झुरमुट में हवा ने एक धीमी सरगोशी छेड़ दी।

आगे जो हुआ, वो सिर्फ़ चाँदनी ने देखा।
सुबह कोहरा छँट रहा था। झील किनारे दो कुल्हड़ — एक में चाय आधी बची थी, दूसरे में पूरी। निहारिका हँसी, "तुम्हारी चाय हमेशा ठंडी होती है।"
"और तुम्हारी हमेशा ज़्यादा मीठी," अद्वैत ने उसका कुल्हड़ उठाकर एक घूँट भरा। "अब ठीक है।"
उसका म्यूज़िक वीडियो उसी झील किनारे शूट हुआ — थीम म्यूज़िक वही धुन, जो अब पूरी थी। वीडियो के आख़िरी शॉट में बाँसुरी खुद बजती है — कोई हाथ नहीं, बस चाँदनी।
एक साल बाद। उसी कॉटेज के बरामदे में अब दो कुर्सियाँ हैं। दीवार पर वो बाँसुरी टँगी है — और हर पूर्णिमा की रात, ठीक बारह बजे, वो खुद बज उठती है।
अब निहारिका को धुन का आख़िरी हिस्सा ज़ुबानी याद है — वो साथ गुनगुनाती है, और बाँसुरी जैसे जवाब देती है।
दादाजी की नोटबुक के आख़िरी पन्ने पर निहारिका ने एक पंक्ति जोड़ी है: "बाँस भूलता नहीं — और अब ये धुन दो लोगों की है।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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