आईने में उसका चेहरा नहीं था।
उसकी जगह एक अजनबी खड़ा था — किताबों से भरे कमरे में, सीधे उसे देखता हुआ।
सनाया का हाथ कंघी पर थम गया। अट्ठाईस साल की उम्र में उसने ऐसा कुछ नहीं देखा था।
वो झटके से पलटी।
कमरे में कोई नहीं था। सिर्फ़ टेबल-लैंप की पीली रोशनी, और दीवार पर टँगा वो लंबा वेनिस का आईना — जिसके शीशे के किनारों पर मोर खुदे थे।
उसने फिर आईने में देखा।
वो था — क़रीब तीस का, हल्की दाढ़ी। उसके पीछे लकड़ी की अलमारियाँ किताबों से इतनी भरी थीं कि दीवार दिखती नहीं थी। वो एक पुरानी किताब के पन्ने सीधा कर रहा था, और रह-रहकर नज़रें उठाकर सीधे सनाया की आँखों में देख रहा था।
"कौन हो तुम?" सनाया की आवाज़ काँपी।
अजनबी ने सिर हल्का-सा झुकाया — जैसे उसने सुन लिया हो।
सनाया ने काँपते हाथ से आईने को छुआ — शीशा बर्फ़ जैसा ठंडा था। उसने फ़ोन से तस्वीर खींची — स्क्रीन पर सिर्फ़ उसका अपना कमरा था। अजनबी का कोई निशान नहीं।
तीन दिन पहले वो आईना उसने अमीनाबाद की एक तंग गली से ख़रीदा था।
दुकान इतनी छोटी थी कि अंदर दो लोग मुश्किल से खड़े हो सकते थे — पुरानी घड़ियाँ, पीतल के लैंप, और दीवारों पर दर्जनों आईने। दुकानदार रफ़ीक़ — सड़सठ साल का, सफ़ेद दाढ़ी — ने यही आईना उसकी तरफ़ धकेला था।
"मैडम, ये लीजिए। वेनिस का काम है, सौ साल पुराना।"
रफ़ीक़ ने पहले आईने को देखा, फिर उसे — "आईना चुनता है, चुना नहीं जाता।"
सनाया हँस पड़ी थी। "ये तो हर दुकानदार की लाइन है, चाचा।"
"हर दुकानदार के पास ऐसा आईना भी नहीं होता।"
अब, आधी रात को, उसके हाथ अब भी ठंडे थे।
सनाया — अट्ठाईस साल की, फ़्रीलांस कैलिग्राफ़ी आर्टिस्ट — हज़रतगंज का ये फ़्लैट दो महीने पहले लिया था। बेडरूम की ख़ाली दीवार के लिए उसे "कुछ पुराना, कुछ कहानी वाला" चाहिए था।
आईना मिल गया था। कहानी भी — साथ में मुफ़्त।
अगली रात उसने बड़ी लाइट बंद की, सिर्फ़ लैंप जलाया — और आईने के सामने बैठ गई।
वो था।
इस बार वो किताब की जिल्द पर सुनहरा काम कर रहा था — बारीक ब्रश से। एक बार उसने मुस्कुराकर सिर हिलाया, जैसे कह रहा हो, "तुम फिर आईं।"
"तुम मुझे देख सकते हो?" सनाया ने पूछा।
अजनबी किताब एक तरफ़ रखकर आईने के बिल्कुल क़रीब आया — इतना क़रीब कि सनाया को लगा वो शीशे के उस पार से हाथ बढ़ा देगा। फिर लैंप की रोशनी फड़फड़ाई — और वो ग़ायब हो गया।
उस रात उसने उसका चेहरा स्केच किया — कलम से, अपनी कैलिग्राफ़ी वाली सधी उँगलियों से। जबड़ा, आँखें, वो हल्की मुस्कान। काग़ज़ पर वो इतना ज़िंदा लगा कि सनाया ने स्केच को तकिए के नीचे छिपा दिया।
तीसरे दिन उसकी दोस्त ज़ेबा — उन्तीस साल की, बेबाक और हर बात पर हँसने वाली — फ़्लैट पर आई।
"दिखा तेरा भूतिया आईना," ज़ेबा ने कहा।
दिन के उजाले में आईना मामूली था — सिर्फ़ शीशा, जिसमें ज़ेबा की परछाईं साफ़ दिख रही थी।
"तू थकी हुई है," ज़ेबा बोली। "डेडलाइन, नींद की कमी — दिमाग़ खेल खेलता है।"
"रात को बड़ी लाइट बंद करके देखना," सनाया ने कहा।
ज़ेबा उस रात रुकी। लैंप की रोशनी में आईने में सिर्फ़ दो दोस्त दिखे — कोई अजनबी नहीं।
"शायद वो सिर्फ़ तुम्हें दिखता है," ज़ेबा ने कहा।
शायद वो सिर्फ़ उसे दिखता था। और यही बात उसे सबसे ज़्यादा डराती — और सबसे ज़्यादा खींचती भी।
अगले दो हफ़्ते सनाया ने लखनऊ की हर पुरानी किताबों की दुकान छान मारी — हर दुकानदार को स्केच दिखाया, हर जगह जवाब एक-सा — "नहीं मैडम।"
पंद्रहवें दिन, हज़रतगंज की एक गली के आख़िर में "किताब महल" मिली। बूढ़े दुकानदार ने चश्मा ठीक किया — "पीछे वाले कमरे में देख लो। वहाँ रेयान बैठता है — पुरानी किताबें ठीक करता है।"
पिछला कमरा। लकड़ी की मेज़। पीतल का लैंप। किताबों की दीवार। और दीवार पर — वही आईना। वही मोर। वही नक्क़ाशी।
मेज़ के पीछे से एक आदमी ने सिर उठाया — क़रीब इकतीस साल का, हल्की दाढ़ी, उँगलियों पर सुनहरे रंग के निशान। उसकी नज़र सनाया पर पड़ी — और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"तुम वही हो न... जो मेरे आईने में दिखती हो?"
सनाया के हाथ से स्केच वाला काग़ज़ छूटकर मेज़ पर गिरा।
रेयान ने दराज़ से एक स्केचबुक निकाली — पन्ना दर पन्ना सनाया का चेहरा। कभी लैंप की रोशनी में, कभी कंघी करते हुए — दर्जनों स्केच, एक साल पुराने।
"एक साल से तुम मेरे आईने में आती हो," रेयान ने कहा। "मैंने सोचा था — मैं पागल हो रहा हूँ।"
"मैंने भी यही सोचा था," सनाया बोली — और दोनों हँस पड़े, जैसे दो डूबते लोगों को एक ही तिनका मिल गया हो।
"तुम्हारा आईना कहाँ से आया?" सनाया ने पूछा।
"अमीनाबाद। एक बूढ़े दुकानदार से — रफ़ीक़।" रेयान ने कहा। "उसने मुझसे भी यही कहा था — 'आईना चुनता है, चुना नहीं जाता।'"
"रफ़ीक़ ने बताया था," रेयान बोला, "ये आईने जोड़े में बनते थे। एक अकेला आईना सिर्फ़ इंतज़ार दिखाता है।"
उस शाम दुकान बंद होने तक वो बातें करते रहे — और बाहर निकलते वक़्त रेयान ने पूछा — "कल... गोमती किनारे?"
सनाया ने हाँ कहा — इतनी जल्दी कि ख़ुद हैरान रह गई।
डूबते सूरज की नारंगी रोशनी में, वो पहली बार आमने-सामने बैठे — बिना शीशे के, बिना दूरी के।
रेयान ने उसकी उँगलियों पर स्याही के धब्बे देखे — "कलम वाली के हाथ।" सनाया ने उसकी उँगलियों पर सुनहरे निशान देखे — "किताब वाले के हाथ।"
"एक साल तक मैंने तुम्हें छूने की कोशिश की," रेयान ने कहा, "और हर बार शीशा ठंडा मिला।"
"अब?" सनाया ने हाथ बढ़ाया। रेयान ने थाम लिया — गर्म, ज़िंदा, काँपता हुआ।
उस रात पहली बार दोनों के आईने धुँधले पड़ गए — जैसे चाँदी पर भाप जम गई हो। आईनों को अब कुछ दिखाना नहीं था।
जब चाँद पानी पर उतरा, रेयान ने सनाया का चेहरा अपने हाथों में लिया — धीरे, जैसे कोई पुरानी किताब का नाज़ुक पन्ना पलट रहा हो।
उसके होंठ उसके होंठों से मिले — गोमती की लहरों की आवाज़ में, चाँदनी में। एक साल का इंतज़ार — एक साँस में पूरा हो गया।
उसके बाद की रात — सिर्फ़ गोमती की लहरें जानती हैं।
सुबह सनाया आईने के सामने खड़ी हुई — पहली बार आईने ने उसे उसका अपना चेहरा दिखाया। और उसके पीछे, उसे गले लगाए, रेयान था।
आईना अब झूठ नहीं बोलता था — अब उसके पास दिखाने को सिर्फ़ सच था।
एक साल बाद उनके स्टडी रूम में दोनों आईने आमने-सामने टँगे हैं — हर आईना सिर्फ़ दूसरे का ख़ाली फ़्रेम दिखाता है, जैसे दो लोग एक-दूसरे को देख रहे हों, बिना पलक झपकाए।
रफ़ीक़ अब भी हर ग्राहक से कहता है — "आईना चुनता है, चुना नहीं जाता।" और कभी-कभी कोई ग्राहक हँसकर टाल देता है।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



Comments
Post a Comment