झूला सबसे ऊपर जाकर रुक गया।
नीचे शरद मेला हज़ारों बल्बों में जगमगा रहा था — चूड़ी की दुकानें, भुट्टे की खुशबू, ढोल की थाप — और तारा की साँसें समीर के कंधे से टकराकर वापस आ रही थीं। हवा में डिब्बा हल्के से डोल रहा था, और उस ऊँचाई पर दोनों के बीच बची थी सिर्फ़ एक धड़कन की दूरी।
"डर लग रहा है?" समीर ने पूछा। उसकी आवाज़ हवा से भी धीमी थी।
तारा ने सिर हिलाया — नहीं। और फिर धीरे से अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।
समीर तीस साल का था। आठ साल से वो इस सफ़र करते शरद मेले का जायंट व्हील चलाता था — लीवर उसके हाथ में इस कदर बस गया था जैसे कोई पुराना दोस्त। उसे हर नट-बोल्ट की आवाज़ पहचान थी; कौन-सा डिब्बा किस मोड़ पर चरमराता है, ये वो आँख बंद करके बता सकता था।
तारा छब्बीस की थी, कस्बे के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती थी। मेला जब भी कस्बे के बाहरी मैदान में लगता, वो हर शाम आती — और हर रात का आख़िरी चक्कर उसी लाल डिब्बे, नंबर सात, में लेती। समीर ने उसे पहले ही हफ़्ते नोटिस कर लिया था।
उनकी बातचीत की शुरुआत बर्फ़ के गोले से हुई थी।
"भैया, एक काला खट्टा," तारा ने कहा था, और समीर — जो उस शाम गोले की ठेली के पास खड़ा था — ने बिना पूछे दो गोले बनवा दिए थे। "एक मेरे लिए भी। खट्टा-मीठा।"
तारा हँसी थी। उस हँसी में शाम की सारी थकान घुल गई थी।
फिर रोज़ का सिलसिला बन गया — आख़िरी चक्कर से पहले पाँच मिनट की बातें। वो बताती कि आज क्लास में बच्चों ने क्या शरारत की; वो बताता कि आज झूले की कौन-सी चेन ढीली पड़ी थी। दोनों जानते थे कि ये पाँच मिनट दिन का सबसे अच्छा हिस्सा हैं, और दोनों में से किसी ने ये बात ज़ुबान पर नहीं आने दी।
बदलाव उस रात आया जब चाचा ने समीर के कंधे पर हाथ रखा।
चाचा बासठ के थे, मेले के सबसे पुराने ऑपरेटर। उन्होंने समीर को लीवर थमाया था आठ साल पहले, और तब से हर रात वो पास की बेंच पर बैठकर बीड़ी पीते थे।
"सुना है आज झूला सबसे ऊपर रुका था," चाचा ने कहा। उनकी आँखों में शरारत थी।
समीर चौंका। "आपको कैसे पता?"
"मुझे सब पता है, बेटा।" चाचा ने धुआँ छोड़ा। "ये झूला... ये जिसे चुनता है, उसके लिए सबसे ऊपर रुकता है। एक गाने जितनी देर। बीस साल में आज पहली बार रुका है।"
समीर हँसा, पर हँसी गले में अटक गई। क्योंकि उस शाम वाकई — डिब्बा नंबर सात सबसे ऊपर जाकर ठहर गया था। कोई तकनीकी खराबी नहीं थी। लीवर उसके हाथ में था, और उसने कुछ नहीं किया था। डिब्बा खुद रुका था, जैसे साँस रोककर।
और उसके बाद हर रात वही होने लगा।
तारा डिब्बे में बैठती, झूला घूमता, और सबसे ऊपर पहुँचकर — ठहर जाता। एक गाने जितनी देर। पर अजीब बात ये थी कि कहीं कोई गाना बज नहीं रहा था। ढोल दूर था, लाउडस्पीकर बंद था। सिर्फ़ हवा थी, और नीचे जगमगाता मेला, और दो धड़कनें जो उस ऊँचाई पर एक ही ताल पर आ जाती थीं।
तारा ने एक रात पूछा, "ये रुकता क्यों है?"
समीर ने आसमान की तरफ़ देखा। "शायद इसे भी किसी का इंतज़ार था।"
तारा कुछ नहीं बोली। पर उस रात उतरते वक़्त उसकी उँगलियाँ समीर की हथेली को छूकर गुज़रीं — जानबूझकर, धीरे से।
मेले की आख़िरी रात आसमान पर काले बादल छा गए।
हवा में नमी थी, बल्बों की रोशनी में धुंध तैर रही थी। चाचा ने समीर से कहा, "आख़िरी रात है, आख़िरी चक्कर तू भी झूल ले। लीवर मैं संभाल लूँगा।"
समीर की साँस अटक गई। आठ साल में पहली बार वो ऑपरेटर की कुर्सी छोड़कर डिब्बे में बैठने वाला था — और डिब्बा नंबर सात में पहले से तारा बैठी थी, उसे देखकर मुस्कुरा रही थी।
झूला चला। नीचे मेला सिमटने लगा था — दुकानें बंद हो रही थीं, बच्चे घर जा रहे थे। डिब्बा ऊपर उठा... और सबसे ऊपर पहुँचकर रुक गया।
उसी पल आसमान फटा।
बिजली कड़की — और पूरे मेले की बत्ती गुल हो गई। नीचे चीख-पुकार मची, डिब्बे हवा में झूलने लगे। पर नंबर सात सबसे ऊपर था, सबसे शांत — जैसे तूफ़ान ने उसे छूने से इनकार कर दिया हो।
बारिश शुरू हो गई।
पहली बूँदें तारा के चेहरे पर गिरीं। समीर ने बिना सोचे उसे अपनी तरफ़ खींचा — एक हाथ उसकी कमर पर, ताकि डिब्बे के हिलने से वो संभल सके। उसके गीले बाल समीर के चेहरे से टकराए, और उस पल में बारिश की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं बचा।
"डर नहीं लग रहा?" समीर ने फुसफुसाकर पूछा।
"तुम हो ना," तारा ने कहा।
और फिर उनके होंठ मिल गए।
बारिश की बूँदें उनके चेहरों पर थीं, दूर कहीं बिजली चमकी, और उस अंधेरे में — मेले की सारी रोशनी बुझी हुई, सिर्फ़ आसमान की चमक में — वो एक-दूसरे में खो गए। वक़्त थम गया था। झूला थमा था। दुनिया थमी थी।
बत्ती वापस आई तो दोनों हँस पड़े — भीगे हुए, एक-दूसरे की बाँहों में।
और तभी कुछ ऐसा हुआ जो समीर आठ साल में कभी नहीं भूलेगा।
झूला खुद-ब-खुद चल पड़ा।
चाचा का हाथ लीवर पर था ही नहीं — वो बेंच पर बैठे मुस्कुरा रहे थे। डिब्बा नंबर सात धीरे-धीरे नीचे उतरा, जैसे किसी ने उसे नरमी से ज़मीन पर रख दिया हो।
चाचा ने समीर की आँखों में देखा और सिर्फ़ इतना कहा, "उसने मंज़ूरी दे दी, बेटा।"
समीर ने जेब से एक राइड का टोकन निकाला — पीतल का, घिसा हुआ — और तारा की उँगली में पहना दिया। अंगूठी नहीं थी, पर उस रात उससे कीमती कुछ नहीं था।
"अगले साल?" तारा ने पूछा।
"अगले साल," समीर ने कहा। "और हर साल।"
अगली सुबह मेला उखड़ गया। ट्रक आए, झूला खोला गया, बल्ब उतारे गए। कस्बा फिर से शांत हो गया।
पर कस्बे के लोग आज भी कहते हैं — शरद मेले का वो जायंट व्हील, जहाँ भी जाता है, हर रात एक बार सबसे ऊपर रुकता है। एक गाने जितनी देर। बिना किसी वजह के।
जैसे किसी का इंतज़ार करता हुआ।
और तारा कहती है — इंतज़ार अब खत्म हो चुका है। क्योंकि वो गाना अब दो दिलों में बजता है, हर रात, बिना रुके।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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