छत्तीसवाँ फ़्रेम दबाने से पहले आदित्य की उँगली हमेशा काँपती थी — क्योंकि उसके पिता के पुराने लाइका में आख़िरी फ़्रेम कभी वर्तमान की तस्वीर नहीं देता था।
उन्तीस साल का आदित्य उदयपुर का वेडिंग फ़ोटोग्राफ़र था। पिता की मौत के बाद उसे ये कैमरा मिला था — और उसके साथ एक लकड़ी का डिब्बा, जिस पर पिता की लिखावट में था: "छत्तीसवाँ फ़्रेम कभी बर्बाद मत करना।"
पहले तो वो हँसा था। फिर उसने पहली रील डेवलप की।
पैंतीस फ़्रेम — शादी, बारात, हँसी। और छत्तीसवाँ... एक खाली मंडप, आधी रात में, टूटे दिए। तीन दिन बाद वो शादी टूट गई थी।
तब से हर रील का आख़िरी फ़्रेम भविष्य दिखाता था। कभी छोटा — "कल बारिश होगी, छाता रखना।" कभी बड़ा — किसी की ज़िंदगी बदल देने वाला।
आदित्य ने कभी किसी को नहीं बताया। वो छत्तीसवाँ फ़्रेम जानबूझकर कभी नहीं खींचता था — वो ख़ुद आ जाता था, जैसे कैमरा साँस लेता हो।
एक बार उसने छत्तीसवें फ़्रेम को झुठलाने की कोशिश की थी — फ़्रेम में दिखा था कि दूल्हे का दोस्त स्टेज से गिरेगा। आदित्य ने उसे पहले ही किनारे खींच लिया... और वो सीढ़ियों से और बुरी तरह लुढ़क गया। तब समझा — फ़्रेम चेतावनी नहीं देता, नियति दिखाता है।
उस अक्टूबर में वो पिछोला के किनारे एक बड़ी शादी शूट कर रहा था — अंब्राई घाट, रोशनियाँ पानी में तैर रही थीं।
रील डेवलप हुई। पैंतीस फ़्रेम — दुल्हन, वरमाला, नाच।
और छत्तीसवाँ — एक लड़की। पीली साड़ी। गंगौर घाट की सीढ़ियों पर अकेली खड़ी, बालों में बारिश, झील को देखती हुई।
आदित्य ने फ़्रेम को तीन बार देखा। ये शादी उसने शूट नहीं की थी। ये लड़की... ये तो अभी हुई ही नहीं थी।
अगली सुबह पाँच बजे वो गंगौर घाट पर था। धुंध, ठंडी हवा, खाली सीढ़ियाँ।
कोई नहीं आया।
दूसरे दिन भी नहीं। तीसरे दिन भी।
छठे दिन उसके असिस्टेंट ने पूछा, "भाई, रोज़ सुबह कहाँ जाते हो?" आदित्य ने कहा, "लोकेशन स्काउटिंग।" झूठ उसके गले में अटका।
सातवीं सुबह — बारिश।
अक्टूबर में उदयपुर में बारिश — अजीब, बेमौसम। और सीढ़ियों पर... वो।
पीली साड़ी। गीले बाल। झील को देखती हुई। बिल्कुल वैसी, जैसी छत्तीसवें फ़्रेम में थी।
आदित्य का कैमरा हाथ से छूटते-छूटते बचा।
"आप..." उसकी आवाज़ काँपी। "आप रोज़ आती हैं?"
लड़की मुड़ी। सत्ताईस साल, आँखों में नींद और कुछ और — कुछ पुराना। "नहीं," उसने कहा। "आज पहली बार। आप?"
"मैं... मैं भी।" आदित्य ने झूठ बोला। सच बताता तो वो पागल समझती।
"प्रिया," उसने कहा। "पुणे से आई हूँ। बहन की शादी थी — परसों। अंब्राई घाट वाली।"
आदित्य के दिल की धड़कन रुक गई। वही शादी — जो उसने शूट की थी।
वो शादी उसे याद थी — दुल्हन हँस रही थी, पर उसकी आँखें बार-बार दरवाज़े की ओर जाती थीं। अब समझा — वो अपनी बहन को ढूँढ रही थी।
"आप गईं नहीं?" उसने पूछा।
प्रिया की हँसी में दर्द था। "परिवार से दूर हूँ — दो साल से। बाहर से बारात देखी, और चली आई। माँ कहती थीं — गंगौर घाट की सुबह हर ज़ख़्म भर देती है।"
वो दोनों सीढ़ियों पर बैठ गए। बारिश धीमी थी, झील पर बूँदें नाच रही थीं।
प्रिया ने बताया — वो कथक डांसर थी, एक एक्सीडेंट के बाद स्टेज छोड़ दिया। अब पुणे में बच्चों को डांस सिखाती है।
आदित्य ने बताया — बस इतना कि वो फ़ोटोग्राफ़र है। कैमरे वाला सच उसने अपने अंदर दबा रखा।
अगली सुबह वो फिर आई। फिर अगली।
दस दिन में गंगौर घाट उनकी दुनिया बन गया। वो उसके लिए कुल्हड़ की चाय लाता, वो उसके लिए पुराने गाने गुनगुनाती।
एक सुबह प्रिया ने पूछा, "तुम रोज़ क्यों आते हो, आदित्य?"
उसने कैमरा उठाया — उसकी तस्वीर ली। सामान्य फ़्रेम। "शायद," उसने कहा, "कुछ तस्वीरें खींचने से पहले ही दिल में खिंच जाती हैं।"
प्रिया शर्मा गई। झील पर धूप उतर आई।
एक शाम प्रिया ने कहा, "परसों पुणे लौट रही हूँ।" आदित्य का दिल धक से हुआ। फ़्रेम ने ये नहीं दिखाया था — या दिखाया था, और उसने देखा नहीं था?
उस रात उसने पुराने फ़्रेम देखे — हर बार भविष्य बदला नहीं था। पर इस बार... इस बार फ़्रेम में वो ख़ुद था। नियति में उसका नाम लिखा था।
उस रात आदित्य ने नई रील डेवलप की। पैंतीस फ़्रेम — प्रिया। हँसती, चाय पीती, बारिश में।
और छत्तीसवाँ —
आदित्य की साँस रुक गई।
वही घाट। मंडप। प्रिया — लाल जोड़े में, दुल्हन बनी। और उसके बग़ल में दूल्हा — चेहरा उसी का था। आदित्य का। एक साल बड़ा, कैमरे की ओर देखकर मुस्कुराता हुआ।
उसके हाथ काँप रहे थे। ये पहली बार था — छत्तीसवें फ़्रेम में वो ख़ुद था।
अगली सुबह घाट पर उसने प्रिया को सब बता दिया। कैमरा, पिता का डिब्बा, छत्तीसवाँ फ़्रेम — सब।
प्रिया चुप रही। फिर धीरे से बोली, "तो... तुम मेरे भविष्य हो?"
"फ़्रेम के हिसाब से," आदित्य ने कहा, "हाँ।"
तभी बारिश शुरू हुई — वैसी ही, जैसी पहले फ़्रेम में थी।
प्रिया ने उसका हाथ थामा। "तो फिर डर किस बात का?"
उसके होंठ उसके होंठों से एक साँस की दूरी पर थे — और फिर वो दूरी मिट गई।
[यहाँ कहानी की मर्यादा है — आगे जो हुआ, वो बारिश और झील के बीच रहा।]
सुबह आँख खुली तो सीढ़ियों पर दो कुल्हड़ थे — एक खाली, एक आधा। प्रिया का सिर उसके कंधे पर था।
"अब क्या?" उसने पूछा।
आदित्य ने कैमरा उठाया — और पहली बार जानबूझकर छत्तीसवाँ फ़्रेम खींचा। खाली घाट। "अब," उसने कहा, "हम ख़ुद लिखेंगे।"
तीन महीने बाद उसने प्रिया को उसी घाट पर, उसी बारिश में — जो अब उनकी बारिश थी — घुटनों पर बैठकर पूछा। उसके पास अँगूठी नहीं थी — था पिता का कैमरा। "इसमें हमारा भविष्य है," उसने कहा। प्रिया ने कैमरा थामा — और हाँ कहा।
एक साल बाद — वही घाट, वही सुबह।
मंडप सजा था। प्रिया लाल जोड़े में आई — बिल्कुल वैसी, जैसी फ़्रेम में थी।
आदित्य ने कैमरा अपने असिस्टेंट को थमाया। "आज तुम शूट करोगे।"
शादी के बाद, डेवलप हुई रील का छत्तीसवाँ फ़्रेम —
खाली घाट। सुबह की धुंध। सीढ़ियों पर दो कुल्हड़। और गीली रेत पर — दो जोड़ी पैरों के निशानों के बग़ल में — दो नन्हे निशान।
आदित्य मुस्कुराया। कैमरा अब चेतावनी नहीं देता था — आशीर्वाद देता था।
उसने फ़्रेम को चूमा, और पिता के डिब्बे में रख दिया — उस पर्ची के बग़ल में, जिस पर लिखा था: "छत्तीसवाँ फ़्रेम कभी बर्बाद मत करना।"
नीचे उसने ख़ुद लिखा: "बर्बाद नहीं किया, पिता। बचा लिया।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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