आसमान का नक़्शा
बर्नर की गर्जना के बीच तन्वी ने देखा — गुब्बारा फिर हवा के ख़िलाफ़ मुड़ रहा था।
नीचे जयपुर की भोर फैली थी — नाहरगढ़ की दीवार पर सुनहरी धार, हवा में हल्की ठंडक। पर "उड़ान" को जैसे किसी ने पुकारा हो — उसका रुख़ पूरब की ओर था, टिब्बों की तरफ़, जहाँ हवा बह रही थी उसके ठीक उल्टी दिशा में।
"ये हर बार यही करता है," तन्वी ने बास्केट के किनारे खड़े मुसाफ़िर से कहा। "तीस साल पुराना गुब्बारा है — पर ज़िद सोलह साल के लड़के जैसी।"
अभय ने हँसकर अपना मुड़ा-तुड़ा नक़्शा जेब में रखा। "ज़िद्दी चीज़ों से मेरी पुरानी दोस्ती है। मैं नक़्शे बनाता हूँ — काग़ज़ पर, हाथ से।"
तीस की तन्वी — तीन सीज़न से इस कंपनी की इकलौती महिला बैलून पायलट। चौंतीस का अभय — हेरिटेज प्रोजेक्ट के लिए 1962 के पुराने सर्वे शीट रिस्टोर करता कार्टोग्राफ़र। आज की "हेरिटेज डॉन फ़्लाइट" उसने बुक की थी — पर उसकी जेब में वो शीट था, जिस पर हाथ से बनी एक छोटी-सी छतरी का निशान था, और नीचे लिखा था — "प्रेम-छतरी"।
टिब्बों के ऊपर गुब्बारा धीरे-धीरे उतरा — जैसे कोई पुराना दोस्त घर लौट रहा हो। रेत पर बास्केट ने हल्का-सा झटका खाया, और तन्वी ने बर्नर बंद कर दिया। सन्नाटा। सिर्फ़ हवा की सरसराहट।
"यही वो जगह है," अभय फुसफुसाया। "हर बार?"
"हर भोर," तन्वी ने कहा। "कंपनी के लोग कहते हैं — उड़ान को ये टिब्बे पसंद हैं।"
अभय ने जेब से शीट निकाला, फैलाया। उसकी उँगली एक निशान पर ठहरी। फिर उसने सामने देखा — टिब्बे के उस पार, आधी रेत में धँसी, पत्थर की एक छोटी-सी छतरी। उसके हाथ काँप गए।
"तुम्हें ये जगह पता थी?" तन्वी ने पूछा।
"नहीं," अभय बोला। "पर मेरे दादाजी को थी।"
* * *
छतरी के अंदर ठंडक थी — बरसों पुरानी छाँव जैसी। दीवार पर किसी ने छेनी से खोदकर लिखा था: "श्याम — गायत्री, 1962"। और नामों के बग़ल में — एक छोटा-सा गुब्बारा, बास्केट समेत, इतनी सफ़ाई से बना कि तन्वी की साँस अटक गई।
"श्याम मेरे दादाजी थे," अभय ने धीरे से कहा। "साठ के दशक में इसी कंपनी में बैलून पायलट। और गायत्री — मेरी दादी।"
तन्वी ने बास्केट की तरफ़ देखा, फिर अभय की ओर। "उड़ान... ये वही गुब्बारा है?"
"लॉगबुक में लिखा है — यही एनवेलप है, दो बार रिस्टोर हुआ।" अभय की आवाज़ भर्रा गई। "दादाजी की आख़िरी फ़्लाइट — 1962 की इसी तारीख़ को। इसी टिब्बे पर उतरे थे। दादी साथ थीं।"
हवा में रेत का एक बगूला उठा, छतरी के स्तंभों के बीच से गुज़रा — जैसे कोई पुरानी साँस छूकर गई हो।
"तो ये ज़िद नहीं है," तन्वी फुसफुसाई। "ये याद है।"
अभय ने उसकी ओर देखा। "शायद कुछ चीज़ें हवा से नहीं उड़तीं, तन्वी। दिल से उड़ती हैं।"
* * *
वापसी की फ़्लाइट में दोनों ख़ामोश थे — वो ख़ामोशी जो सिर्फ़ दो लोगों के बीच होती है।
सूरज अब पूरा निकल आया था। बर्नर की नीली लौ रह-रहकर भड़कती, और हर भड़क के साथ तन्वी का चेहरा सोने-सा दमकता। अभय उसे देख रहा था — देखता ही रह गया।
"क्या देख रहे हो?" उसने पूछा, नज़रें आसमान पर।
"वो नक़्शा," अभय बोला, "जो काग़ज़ पर नहीं बनता।"
तन्वी हँसी — और हँसते-हँसते उसकी आँखें भर आईं। बास्केट हवा में हल्के से डोला। अभय ने उसका हाथ थामा — धीरे से, जैसे नाज़ुक शीट थामते हैं।
उनके चेहरों के बीच बस एक साँस का फ़ासला था। बर्नर की गर्माहट, भोर की ठंडक, और नीचे बहुत दूर — रेत पर उनकी लंबी होती परछाइयाँ, एक-दूसरे में घुलती हुईं।
और फिर आसमान ने अपनी चादर तान दी — बाक़ी कहानी हवा ने अपने पास रख ली।
* * *
लैंडिंग फ़ील्ड में थर्मस की चाय थी, और रेत पर फैला उड़ान का एनवेलप — किसी विशाल गेंदे के फूल जैसा।
"दादी कहती थीं," अभय ने चाय का कुल्हड़ थामे कहा, "दादाजी हर साल इसी तारीख़ को भोर में उठते थे। आसमान देखते थे। कहते थे — 'आज उड़ान का दिन है।'"
तन्वी ने एनवेलप को देखा — धूप में उसका रंग दमक रहा था। "और अब?"
"अब ये तुम्हारा है," अभय बोला। "और शायद... थोड़ा मेरा भी।"
तन्वी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। दोनों ने आसमान की ओर देखा — जहाँ अभी-अभी दो परछाइयाँ एक हुई थीं।
* * *
ठीक एक साल बाद — उसी तारीख़, उसी भोर।
तन्वी ने बर्नर जलाया। बास्केट में अभय था, और बास्केट के बाहर — पूरी कंपनी, साँस रोके।
उड़ान ऊपर उठा। हवा पूरब से बह रही थी। तन्वी ने रस्सी खींची — और इस बार, पहली बार, गुब्बारा उसकी सुनकर सीधा सूरज की ओर उठा। न टिब्बों की ज़िद, न हवा के ख़िलाफ़ जंग।
नीचे छतरी छोटी होती गई — रेत में धँसी, धूप में चमकती। अभय ने तन्वी का हाथ थामा।
"आज उड़ान ने मेरी सुनी," तन्वी फुसफुसाई, आँखों में आँसू और होठों पर हँसी।
"क्योंकि अब उसे याद नहीं करना पड़ता," अभय बोला। "अब कहानी आगे बढ़ गई है।"
गुब्बारा सूरज की ओर तैरता रहा — आज़ाद, हल्का, बेपरवाह। और नीचे, छतरी की दीवार पर — शायद धूप का खेल था, शायद कुछ और — दो नामों के बग़ल में रेत पर एक नई लकीर चमकी, जैसे किसी ने अभी-अभी छेनी रखी हो।
कहते हैं, जयपुर के पूरब वाले टिब्बों में अब भी भोर को एक पुराना गुब्बारा दिखता है — पर अब वो हवा के ख़िलाफ़ नहीं उड़ता। अब वो जहाँ चाहे, वहाँ उतरता है।
क्योंकि कुछ नक़्शे काग़ज़ पर नहीं बनते। कुछ आसमान में बनते हैं — दो धड़कनों के बीच।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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