आसमान में अपना नाम देखकर प्रिशा की साँस थम गई — सुनहरे अक्षरों में, 'प्रिशा'।
नीचे घाट पर सैकड़ों लोग थे — पर उस पल उसे लगा, ये आतिशबाज़ी सिर्फ़ उसके लिए हुई है।
उनतीस साल की प्रिशा ज़िला मुख्यालय से आई फायर-सेफ्टी ऑफिसर थी। शादी के सीज़न में क़स्बे की हर आतिशबाज़ी को हरी झंडी देना उसी की ड्यूटी थी — पिछली दीवाली एक शो में हुई दुर्घटना के बाद प्रशासन कोई रिस्क नहीं चाहता था।
और तैंतीस साल का शिवांश — तीसरी पीढ़ी का आतिशबाज़ — इस क़स्बे के आसमान का जादूगर था। उसके दादाजी ने इसी घाट पर पहली बार रंग बिखेरे थे।
परीक्षण की रात — सर्टिफिकेट से पहले का आख़िरी शो। प्रिशा घाट की सीढ़ियों पर खड़ी थी — हाथ में चेकलिस्ट, आँखों में सख़्ती।
पहला खोल उठा — लाल गुलदस्ता, आसमान में खिलकर बिखर गया। दूसरा — हरी बेल, जैसे आसमान में कोई बग़ीचा उग आया हो। तीसरा — सुनहरी बारिश, जो देर तक घाट की सीढ़ियों पर उतरती रही।
तभी चौथा खोल उठा — जो लिस्ट में था ही नहीं। वो बाक़ियों से धीमा था, जैसे आसमान तक पहुँचने की उसे कोई जल्दी न हो।
और फिर वो फूटा — सुनहरी चिंगारियों का एक गुच्छा, जो बिखरने के बजाय ठहर गया, जुड़ने लगा — एक अक्षर, फिर दूसरा, फिर पूरा नाम।
'प्रिशा' — आसमान के सीने पर, सुनहरी चिंगारियों में।

घाट पर पहले सन्नाटा छाया — फिर तालियों की गड़गड़ाहट। पर प्रिशा के चेहरे पर मुस्कान नहीं, ग़ुस्सा था।
वो सीधे शिवांश के पास पहुँची — "ये क्या था?"
शिवांश खुद आसमान को देख रहा था — उसका चेहरा पीला पड़ गया था। "मैं... मैंने ये नहीं चलाया।"
"मज़ाक मत करो," प्रिशा की आवाज़ सख़्त थी। "ऑफिसर को इम्प्रेस करने का नया तरीका? रिश्वत — आतिशबाज़ी में?"
"मैडम," बिरजू काका आगे आया, हाथ में रजिस्टर। "गिनती देख लीजिए — तीन खोल लिस्ट में थे, चार फूटे।"
"तो चौथा आया कहाँ से?"
बिरजू काका ने घाट के कोने में रखे लोहे के संदूक की तरफ़ इशारा किया — उसका ताला टूटा हुआ था।
"दादाजी वाला संदूक," शिवांश फुसफुसाया। "चालीस साल से सील बंद था।"
संदूक के ढक्कन पर दादाजी की लिखावट अब भी साफ़ थी — 'बिना हुक्म के न खोलना।'
उस रात प्रिशा ने शो रोक दिया — "जब तक ये राज़ नहीं खुलता, कोई सर्टिफिकेट नहीं।"
शिवांश उसे अपने घर ले गया — दादाजी की बही दिखाने। चमड़े की जिल्द, पीले पन्ने, काँपती लिखावट। एक पन्ने पर लाल स्याही से लिखा था — 'खाली खोल।'
"दादाजी तीन खोल हमेशा खाली रखते थे," शिवांश ने धीरे से कहा। "बिना बारूद के निशान, बिना नाम के।"
"खाली खोल का क्या काम?"
"दादाजी कहते थे — जिस रात आसमान को कोई नाम कहना हो, खोल खुद भर जाता है।"
प्रिशा हँस पड़ी — थकी हुई, न मानने वाली हँसी। "और तुम ये मानते हो?"
"मैं नहीं मानता था," शिवांश ने बही का अगला पन्ना पलटा। "आज तक।"
पन्ने पर दो तारीख़ें थीं — 1949 और 1983। "पहला खाली खोल 1949 में फूटा था — आसमान में दादी का नाम। दूसरा 1983 में — अम्मा का नाम।"
"और तीसरा?"
शिवांश ने आख़िरी पन्ना खोला — वहाँ दादाजी की काँपती लिखावट थी: 'तीसरा खोल मेरे पोते के लिए — नाम आसमान लिखेगा।'
प्रिशा की साँस थम गई।
"कौन आया है, शिवा?" — अंदर से आवाज़ आई। अस्सी साल की दादी लाठी टेकते हुए आईं — आँखों में वही चमक, जो 1949 से बुझी नहीं थी।
शिवांश ने सब बताया। दादी देर तक हँसती रहीं — फिर प्रिशा का हाथ थाम लिया।
"1949 में मैं भी यही बोली थी — 'नाटक है।' तेरे दादाजी भी ऐसे ही पीले पड़े थे, जैसे आज ये पड़ा है।"
प्रिशा कुछ न बोली — पर उस रात वो घाट पर देर तक बैठी रही।
अगले दिन सेठ जी आए — जिनकी बेटी की शादी में सीज़न का सबसे बड़ा शो होना था। मेज़ पर नोटों की गड्डी रखी — "सुना है तुम्हारे पास जादुई खोल हैं। बारात वाली रात दूल्हा-दुल्हन का नाम आसमान में लिख दो — मुँहमाँगा दाम।"
शिवांश ने गड्डी वापस बढ़ा दी — "खोल ख़त्म, सेठ जी। और जो था, वो बिकाऊ नहीं था।"
सेठ जी के जाते ही प्रिशा बोली — "इतने पैसे ठुकरा दिए — एक 'नाटक' के लिए?"
"नाटक नहीं था," शिवांश ने उसकी आँखों में देखा। "और कुछ चीज़ें पैसों से बड़ी होती हैं।"
उस शाम प्रिशा फिर आई — पर इस बार चेकलिस्ट हाथ में नहीं थी। वो देर तक देखती रही — कैसे वो हर खोल को अपने हाथ से भरता है, जैसे कोई चिट्ठी लिखता हो।

"बारूद को डर नहीं चाहिए," उसने धीरे से कहा, "इज़्ज़त चाहिए। एक ग़लत हरकत — और ये आसमान नहीं, अफ़सोस लिखता है।"
प्रिशा ने पहली बार उसके हाथ देखे — काले, खुरदरे, पर इतने सधे हुए जैसे किसी सर्जन के हों। "तुम्हें डर नहीं लगता?" उसने पूछा।
"लगता है," वो मुस्कुराया। "इसीलिए तो हर खोल से पहले दादाजी का नाम लेता हूँ।"
घाट की सीढ़ियों पर दोनों देर तक बैठे रहे — बीच में लालटेन, ऊपर तारे। "तुम्हारा ट्रांसफ़र कब है?" उसने पूछा।
"सीज़न ख़त्म होते ही," प्रिशा ने कहा — पर उसकी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी, जो पहले दिन थी।
"और अगर सीज़न... बढ़ जाए?"
लालटेन की रोशनी में उसकी आँखों में कुछ ऐसा था, जो चेकलिस्ट में नहीं लिखा था। वो कुछ कहने ही वाली थी — तभी घाट पर शोर हुआ। बारात वाली रात का बड़ा शो शुरू होने वाला था।
वो रात क़स्बे ने पहले कभी नहीं देखी थी — हज़ारों रंग, जैसे आसमान दीवाली मनाने उतरा हो। पर प्रिशा की नज़रें सिर्फ़ एक चेहरे पर थीं — जो हर खोल के साथ आसमान को देखता, जैसे किसी पुराने दोस्त से बात कर रहा हो।
शो ख़त्म हुआ — तालियाँ, शोर, बधाइयाँ। और फिर — सन्नाटा। आसमान खाली। कोई नाम नहीं। कोई सुनहरी इबारत नहीं।
शिवांश उसके पास आया — दोनों घाट की आख़िरी सीढ़ी पर बैठ गए। "जादू ख़त्म," उसने धीरे से कहा। "अब कोई खोल नहीं बचा।"
"अब जादू की ज़रूरत भी नहीं," प्रिशा ने उसका हाथ थाम लिया — पहली बार, बिना किसी वजह के।
वो क़रीब आया — इतना क़रीब कि लालटेन की लौ दोनों के चेहरों पर एक जैसी काँपने लगी। जब उनके होंठ मिले, तो लालटेन की लौ एक पल को झुक गई — जैसे उसने भी नज़रें झुका ली हों।

बाक़ी रात गंगा की लहरों ने अपने पास रख ली — और वो लालटेन, जो आधी रात तक जलती रही।
सुबह उसके स्कूटर के हैंडल पर लाल धागे से बँधा वो जला हुआ खोल टँगा था — जिसने आसमान में उसका नाम लिखा था। उसने उसे उतारा — धीरे से, जैसे कोई चिट्ठी सँभालता है।
जेब में ट्रांसफ़र का काग़ज़ था — उसने उसे मोड़कर वापस रख दिया। "एक सीज़न और," उसने मुस्कुराकर कहा।
शिवांश ने आसमान की ओर देखा — खाली, नीला, शांत। कोई नाम नहीं, कोई सुनहरी इबारत नहीं। और पहली बार प्रिशा को खाली आसमान भी पूरा लगा।
कहते हैं, हर साल उस तारीख़ को घाट पर एक खोल फूटता है — सुनहरे अक्षरों में एक नाम लिखता है। उस खोल को अब कोई जादू नहीं भरता — उसे शिवांश अपने हाथ से भरता है। क्योंकि आसमान ने अपना काम कर दिया था — अब बारी उसकी थी।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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