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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

अधूरी बारात

वान्या को वही सपना तीसरी बार आया था — बारात, शहनाई, और दुल्हन जो दहलीज़ पर खड़ी इंतज़ार कर रही थी।

अट्ठाईस साल की वान्या लखनऊ के अमीनाबाद में "दुल्हन घर" चलाती थी — पुराने ज़माने के दुल्हन के जोड़ों की दुकान।

दुकान के सबसे अंदर, शीशे के पीछे, एक लहंगा टँगा था — साठ साल पुराना, गहरा लाल, सुनहरी ज़रदोज़ी, और किनारे पर एक फटा हुआ बॉर्डर।

उस रात वान्या ने लहंगे को पहली बार छुआ था — संग्रहालय की शूटिंग के लिए। उसी रात सपना आया।

सपने में वो खुद दुल्हन थी — लाल जोड़ा, घूँघट, हाथों में मेहंदी। शहनाई बज रही थी। वो दहलीज़ पर खड़ी थी।

पर बारात नहीं आई। सिर्फ़ दूर कहीं बादलों की गड़गड़ाहट, और बारिश की बूँदें।

वो चीख़ना चाहती थी — पर आवाज़ नहीं निकली। और तभी आँख खुल गई।

सुबह उसने दादी की पुरानी डायरी खोली। एक पन्ना मुड़ा हुआ था — "बड़ी नानी का जोड़ा। शादी की रात तूफ़ान आया था। पुल बह गया। बारात नदी के उस पार रह गई।"

बड़ी नानी ने फिर कभी शादी नहीं की। वो लहंगा उसी रात से तह करके रखा था — "जिस रात पहना नहीं गया।"

वान्या ने लहंगे को देखा — फटा बॉर्डर, जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में खींचा हो।

उसी हफ़्ते दुकान में एक आदमी आया — इकतीस साल का रेयांश, कपड़ा इतिहासकार। संग्रहालय के लिए अवधी दुल्हन-शिल्प पर प्रदर्शनी तैयार कर रहा था।

"ये लहंगा," उसने शीशे के पास रुककर कहा, "सन् साठ के आसपास का है। ज़रदोज़ी हाथ की है — मशीन की नहीं।"

वान्या ने उसे अंदर आने दिया। रेयांश ने दस्ताने पहने, लहंगे को छुआ — और बॉर्डर के फटे हिस्से पर उँगली रोकी।

"ये फटा नहीं है," उसने कहा। "ये खींचा गया है। जैसे किसी ने पहनते वक़्त..."

"जल्दबाज़ी में," वान्या ने पूरा किया। "शादी की रात।"

रेयांश ने उसे देखा — "आपको कैसे पता?"

वान्या ने सपना बताया। तीन रातों का एक ही सपना — बारात जो कभी नहीं आती।

रेयांश हँसा नहीं। उसने कहा — "कपड़ों में यादें होती हैं, वान्या। बुनकर कहते हैं — जो हाथ सिए, वो हाथ याद रहता है।"

वो रोज़ आने लगा — लहंगे की तस्वीरें, धागों के नमूने, कढ़ाई के नक्शे।

एक शाम उसने पूछा — "बड़ी नानी का नाम क्या था?"

"गुलनार," वान्या ने कहा। "और दूल्हे का?"

वान्या चुप रही। डायरी में नाम नहीं था — सिर्फ़ एक लाइन: "वो नदी के उस पार रह गया।"

रेयांश ने अपने थैले से एक पुरानी तस्वीर निकाली — काले-सफ़ेद, किनारे मुड़े हुए। "मेरे दादाजी।"

तस्वीर में एक जवान आदमी शेरवानी में था — जो कभी पहनी नहीं गई थी, ये रेयांश ने बताया।

"दादाजी ने कभी शादी नहीं की," उसने धीरे से कहा। "कहते थे — 'मेरी दुल्हन नदी के उस पार रह गई।'"

वान्या की साँस रुक गई। "तुम्हारे दादाजी का नाम?"

"रेयांश..." वो रुका, फिर बोला — "मेरा नाम उन्हीं के नाम पर है। दादाजी का नाम भी रेयांश था।"

उस रात वान्या को सपना फिर आया — पर इस बार कुछ बदला था।

सपने में दूल्हे का चेहरा साफ़ था — और वो चेहरा रेयांश का था।

वो दहलीज़ पर खड़ी थी। वो बारात के साथ नहीं — अकेला, भीगा हुआ, नदी के उस पार से हाथ हिला रहा था।

"मैं आ रहा हूँ," उसके होंठ हिले। "पुल बन रहा है।"

वान्या की आँख खुली — तकिया भीगा हुआ था।

सुबह दुकान में रेयांश पहले से था। वान्या ने सपना बताया — उसका चेहरा, उसका हाथ हिलाना।

रेयांश ने तस्वीर निकाली — दादाजी की शेरवानी वाली। "देखो," उसने कहा, "पीछे।"

तस्वीर के पीछे लिखा था — "गुलनार के लिए। उस रात के लिए, जो आएगी।"

वान्या ने लहंगे को देखा। साठ साल से वो एक रात का इंतज़ार कर रहा था।

"तुम्हें डर नहीं लगता?" वान्या ने पूछा। "कि ये सब... सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़ हो?"

"मुझे डर लगता है," रेयांश ने कहा, "कि ये इत्तेफ़ाक़ न हो।"

उस रात दुकान बंद करके वान्या ने लहंगा शीशे से निकाला — पहली बार, पहनने के लिए नहीं, सीने के लिए।

उसने फटे बॉर्डर पर सुनहरा धागा रखा — दादी की संदूक़ से निकाला हुआ, साठ साल पुराना धागा।

रेयांश उसके पास बैठा था — चुपचाप, जैसे कोई प्रार्थना देख रहा हो।

सुई धागे में पिरोते वक़्त उनके हाथ छू गए — और दोनों में से किसी ने हाथ नहीं हटाया।

लैंप की रोशनी में उसने बॉर्डर सीना शुरू किया — एक टाँका, फिर दूसरा।

"तुम्हें पता है," रेयांश ने धीरे से कहा, "दादाजी हर बरसात में नदी के पुल पर जाते थे। कहते थे — 'देखने, कि पुल अब भी है या नहीं।'"

वान्या की आँखों में आँसू थे — पर हाथ नहीं काँप रहे थे।

आधी रात को आख़िरी टाँका लगा। बॉर्डर जुड़ गया — जैसे साठ साल का कोई ज़ख़्म भर गया हो।

रेयांश ने उसका हाथ थामा। वान्या ने मना नहीं किया।

लैंप की रोशनी में उसने वान्या के चेहरे को देखा — और वान्या ने उसकी आँखों में वो बारात देखी, जो साठ साल से रास्ते में थी।

उनके होंठ मिले — धीरे, जैसे कोई पुराना वादा पूरा हो रहा हो।

बाक़ी रात लैंप की रोशनी ने अपने पास रख ली।

सुबह वान्या की आँख दुकान में खुली — लहंगा मैनिक्विन पर था, बॉर्डर सिला हुआ, सुनहरा धागा चमक रहा था।

रेयांश काउंटर पर सोया था — हाथ में सुई अब भी थी।

उस रात वान्या को सपना फिर आया — आख़िरी बार।

सपने में बारात आई — शहनाई, रोशनी, और दूल्हा दहलीज़ तक पहुँचा। पुल टूटा नहीं था — या शायद साठ साल में कोई नया पुल बन गया था।

दुल्हन ने घूँघट उठाया — और मुस्कुराई। पहली बार, सपने में कोई मुस्कुराया था।

वान्या की आँख खुली — और वो भी मुस्कुरा रही थी।

उसने दुकान की तख़्ती के नीचे एक नई लाइन लिखवाई — "यहाँ अधूरी बारातें पूरी होती हैं।"

और उस साल की बरसात में, जब वान्या ने वही लहंगा पहना — साठ साल बाद, उस लहंगे ने आख़िर अपनी बारात देख ली।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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