आइने में उसका चेहरा नहीं था।
रात के ग्यारह बज रहे थे। लखनऊ की पुरानी हवेली "गुलनार मंज़िल" के नीले कमरे में उनतीस साल की नेहा एक ऊँचे आइने के सामने खड़ी थी — और आइना उसे नहीं दिखा रहा था।
आइना दिखा रहा था वही कमरा — पर दूसरा। दीवारों पर वही नीला रंग, पर ताज़ा और चमकदार। फ़र्श पर वही फ़ारसी क़ालीन, पर धूल से अछूता। और कोने में — जहाँ इस तरफ़ सिर्फ़ खाली जगह थी — एक ईज़ल खड़ा था। ईज़ल के सामने एक नौजवान, आस्तीनें चढ़ाए, कैनवास पर ब्रश फेर रहा था।
नेहा की साँस थम गई। उसने पलकें झपकाईं। नज़ारा नहीं बदला।
लड़का बत्तीस-तैंतीस का रहा होगा। दीये की रोशनी में उसका चेहरा साफ़ दिख रहा था — गहरी आँखें, माथे पर लट। नेहा ने काँपते हाथ से आइने को छुआ। शीशा ठंडा था। असली।
"ये... ये क्या है?" उसकी आवाज़ कमरे में गूँजी।
और आइने के उस पार — लड़के ने सिर उठाया। सीधे उसकी तरफ़ देखा। मुस्कुराया।
नेहा दो क़दम पीछे हट गई। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि कानों में उसकी आवाज़ आ रही थी।
तीन हफ़्ते पहले उसकी दादी — शबनम बेगम — गुज़री थीं। छियासी साल की उम्र, नींद में, शांति से।
वसीयत में हवेली नेहा के नाम थी। नेहा दिल्ली में हेरिटेज आर्किटेक्ट थी — पुरानी इमारतों को नई साँस देना उसका काम था। दादी की एक ही शर्त थी, वकील ने पढ़कर सुनाई थी — "नीला कमरा कभी मत खोलना।"
नेहा ने पहले ही हफ़्ते खोल दिया था।
कमरे में धूल जमी मेज़ थी, लोहे का बंद संदूक़ था — और दीवार से लगे एक ऊँचे आइने पर चादर पड़ी थी। बेल्जियम का शीशा, दादी कहती थीं। उनकी शादी का तोहफ़ा।
उस रात नेहा ने चादर हटाई थी। पहले तो आइना मामूली था — उसमें उसका अपना अक्स, पीछे धूल भरा कमरा। फिर दीया फड़फड़ाया — और आइने के अंदर का कमरा बदल गया।
अब, हर रात ग्यारह बजे, नेहा कुर्सी डालकर आइने के सामने बैठ जाती। उस पार वो लड़का पेंट करता रहता। कभी-कभी रुककर आइने की तरफ़ देखता — ऐसे, जैसे जानता हो कि कोई देख रहा है।
एक रात सावन की नमी से शीशे पर हल्की भाप जमी थी। नेहा ने उँगली से लिखा — "तुम कौन हो?"
उस पार लड़का ठिठका। उसने लिखा पढ़ा — हैरान हुआ — फिर धीरे से मुस्कुराया। अपनी तरफ़ की भाप पर उसने लिखा — "इशान। और तुम?"
"नेहा।"
"तुम... मुझे देख सकती हो?"
"और तुम मुझे?"
दोनों तरफ़ खामोशी रही। फिर इशान ने लिखा — "तीन महीने से।"
नेहा का हाथ काँपा। "मैं तुम्हें तीन हफ़्ते से देख रही हूँ।"
इशान ने दीवार की तरफ़ इशारा किया। वहाँ एक कैलेंडर टँगा था — "1954"। फिर उसने एक अख़बार उठाया — सुर्ख़ी पर साल साफ़ था।
"मज़ाक मत करो," नेहा ने लिखा। पर उसकी आवाज़ में अब हँसी नहीं थी।
अगले दिन नेहा लखनऊ के पुराने रिकॉर्ड दफ़्तर गई। धूल भरे रजिस्टरों में एक नाम मिला — इशान सक्सेना, चित्रकार। 1953 से 1955 तक — इसी हवेली का नीला कमरा किराए पर लिया था। 1956 के बाद — कोई हिसाब नहीं। जैसे हवा हो गया हो।
उसी शाम उसने दादी का पुराना संदूक़ खोला। डायरियों के बीच एक पन्ना — दादी की लिखावट —
"इशान कहता है — आइने में एक लड़की दिखती है। कहता है वो 2026 की है। मैं हँस देती हूँ। पर आज उसने उसका चेहरा बना दिया — कैनवास पर। लड़की मुझ जैसी नहीं।"
नेहा के हाथ से डायरी छूटते-छूटते बची।
उस रात वो आइने के सामने बैठी — आँखों में सवाल। इशान ने भाप पर लिखा — "क्या हुआ?"
"तुमने मेरा चेहरा बनाया था? 1954 में?"
इशान ने सिर झुकाया। "बनाया था।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुम हर रात यहाँ आती थीं," उसने लिखा। "मुझे लगा — शायद तुम भी मुझे ढूँढ रही हो।"
बारिश वाली रात शीशा खुद-ब-खुद धुँधला गया। नेहा ने हथेली शीशे पर रखी। उस पार — इशान ने भी अपनी हथेली उठाई।
दो हथेलियाँ। एक शीशे के इस पार। एक उस पार। बीच में सिर्फ़ ठंडा काँच — और सत्तर साल।
"इतनी दूर," नेहा फुसफुसाई, "और इतने पास।"
इशान के होंठ हिले — आवाज़ नहीं आई, पर नेहा ने पढ़ लिया — "पास ही रहोगी न?"
उस रात के बाद नेहा ने डायरी में सिर्फ़ एक लाइन लिखी — "आज मैंने किसी को छुआ — बिना छुए।"
सुबह उसकी खिड़की पर एक सूखा गेंदा रखा था — वही, जो उसने आइने के फ्रेम में खोंसा था।
अगली रात आइना खाली था। ईज़ल था, दीये थे — इशान नहीं था।
नेहा ने घबराकर शीशा थपथपाया। "इशान?"
कोई जवाब नहीं। सिर्फ़ उसका अपना अक्स — पहली बार, तीन हफ़्तों में पहली बार, आइने में वो खुद दिखी। और वो रो पड़ी।
तभी उसकी नज़र संदूक़ के पीछे गई — एक ईंट हिली हुई थी। ईंट के पीछे — टिन का डिब्बा।
अंदर बीस ख़त थे। "आइने वाली को।" कभी भेजे नहीं गए।
नेहा ने एक-एक करके पढ़े। हर ख़त में वही लड़की — जो रात को आती है, जो सवाल लिखती है, जो हथेली शीशे पर रखती है।
आख़िरी ख़त पर तारीख़ थी — 1956।
"तुम आ गईं, नेहा। मैंने तुम्हें तीन महीने देखा — 2026 की एक लड़की, जो मेरे कमरे में आकर बैठती है। मैं ये कमरा छोड़ रहा हूँ — पर आइना छोड़ रहा हूँ। ये उन्हीं को दिखाता है, जिनका इंतज़ार किया जाए। अब ये तुम्हारा। तुम्हारा इशान।"
डिब्बे के तले में दादी की एक पर्ची थी — "इशान 1956 में चला गया। कह गया — 'वो आएगी। आइना उसे पहचान लेगा।' मैंने नीला कमरा बंद कर दिया — ताकि आइना सिर्फ़ उसी का इंतज़ार करे।"
नेहा ने हवेली बेची नहीं।
नीले कमरे को उसने "इशान का स्टूडियो" बना दिया — ईज़ल, रंग, ब्रश, दीये। दीवार पर — इशान के ख़तों की नक़लें, फ्रेम में।
दिल्ली की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। लखनऊ में हेरिटेज स्टूडियो खोल लिया।
अब हर रात ग्यारह बजे वो आइने के सामने बैठती है। कभी आइना खाली होता है — कभी उस पार दीये जलते हैं, और ईज़ल के सामने कोई खड़ा होता है, ब्रश फेरता हुआ।
कल रात उसने दीये जलाए, आइने के सामने खड़ी हुई — और मुस्कुराई।
आइने में उसका अक्स था। और एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — उसके अक्स के पीछे एक हाथ दिखा। उसके कंधे पर।
नेहा ने आँखें बंद कीं। "मिल गए," वो फुसफुसाई।
कहते हैं — कुछ कहानियाँ आइने में ही पूरी होती हैं।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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