सुबह पाँच बजे जब अर्जुन ने अपने घर का दरवाज़ा खोला, तो चौखट पर एक अख़बार पड़ा था — और अख़बार पर तारीख़ कल की थी।
उसने अख़बार उठाया, उल्टा-पुल्टा करके देखा। काग़ज़ ताज़ा था, स्याही अभी-अभी सूखी लग रही थी, और पहले पन्ने पर बड़ी सुर्ख़ी थी — "शहर के मशहूर पत्रकार अर्जुन का विवाह इसी महीने, दुल्हन — किताब महल की मीरा।"
अर्जुन के हाथ से अख़बार छूटकर नीचे गिर गया। उनतीस साल का अर्जुन शहर के सबसे पुराने अख़बार में क्राइम रिपोर्टर था — ख़बरें वो लिखता था, ख़बरें उस पर कभी नहीं लिखी जाती थीं। और मीरा? मीरा नाम की किसी लड़की को वो जानता तक नहीं था।
"किसी ने मज़ाक़ किया है," उसने ख़ुद को समझाया। मगर अख़बार को कूड़े में फेंकने से पहले उसकी नज़र कोने पर पड़ी — वहाँ छोटे अक्षरों में लिखा था, "छपा — गली नंबर सात, पुरानी प्रेस।"
गली नंबर सात। वो गली, जिसमें पिछले दस साल से कोई प्रेस नहीं चलती थी।

पुरानी प्रेस की रात
उस रात अर्जुन गली नंबर सात पहुँचा। गली के आख़िर में एक पुराना दरवाज़ा था — "शहर प्रेस" — जिस पर ताला लटका था, और ताले पर इतनी धूल कि लगता था बरसों से किसी ने उसे छुआ नहीं।
मगर दरवाज़े के नीचे से रोशनी आ रही थी। और अंदर से आवाज़ — खट-खट... खट-खट... जैसे कोई मशीन चल रही हो।
अर्जुन ने धक्का दिया। दरवाज़ा ख़ुद-ब-ख़ुद खुल गया।
अंदर एक पुरानी हैंड-प्रेस खड़ी थी — लोहे की विशाल मशीन, जिस पर स्याही के दाग़ थे, और जिसके पहिये धीरे-धीरे घूम रहे थे, बिना किसी के चलाए। प्रेस से एक के बाद एक अख़बार निकल रहे थे — और हर अख़बार पर तारीख़ थी, कल की।
"तो तुम आ ही गए।"
आवाज़ पीछे से आई। अर्जुन पलटा — दरवाज़े पर एक लड़की खड़ी थी, हाथ में लालटेन, आँखों में वही हैरानी, जो अर्जुन की आँखों में थी।
"तुम कौन हो?" अर्जुन ने पूछा।
"मीरा," लड़की ने कहा। "किताब महल चलाती हूँ, इसी गली में। और ये प्रेस... ये मेरे दादाजी की थी। दादाजी कहते थे — ये प्रेस ख़बरें नहीं छापती, ये कल को छापती है।"
अर्जुन ने उसे देखा। सत्ताईस साल की मीरा — सादा सूट, कंधे तक बाल, और आँखों में एक अजीब-सी चमक, जैसे वो किसी कहानी का वो पन्ना हो, जो अभी लिखा ही न गया हो।
"और आज सुबह मेरे दरवाज़े पर जो अख़बार था — वो भी इसी प्रेस का था?"
"शायद," मीरा ने कहा। "प्रेस हर रात बारह बजे ख़ुद चलती है, और एक ही अख़बार छापती है — कल का। मगर वो अख़बार कभी किसी के दरवाज़े तक नहीं जाता था। आज तक।"
मीरा ने उसे प्रेस के बग़ल में रखी एक पुरानी डायरी दिखाई। उसके आख़िरी पन्ने पर दादाजी की लिखावट थी — "प्रेस उसी के दरवाज़े पर अख़बार छोड़ती है, जिसकी कहानी अधूरी है।"
अर्जुन ने डायरी बंद की। "तो मेरी कहानी अधूरी है?"
"हम दोनों की," मीरा ने कहा, और पहली बार मुस्कुराई।
एक अजनबी का नाम
अगली सुबह अर्जुन फिर गली नंबर सात गया — इस बार मीरा की दुकान पर। किताब महल — लकड़ी की अलमारियों में हज़ारों किताबें, और बीच में एक छोटी-सी मेज़, जिस पर चाय के दो कप रखे थे, जैसे मीरा को पता था कि वो आएगा।
"तुम्हें कैसे पता कि मैं आऊँगा?" अर्जुन ने पूछा।
"क्योंकि प्रेस ने बताया," मीरा मुस्कुराई, और एक अख़बार उसकी तरफ़ बढ़ाया। "आज रात का अख़बार। अभी छपा है।"
अख़बार के दूसरे पन्ने पर एक छोटी-सी ख़बर थी — "आज रात किताब महल में आग — शॉर्ट सर्किट से।"
अर्जुन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "ये... ये मज़ाक़ नहीं है, मीरा। अगर ये सच है, तो हमें —"
"तो हमें किताबें बचानी हैं," मीरा ने उसकी बात पूरी की। "और अगर झूठ है, तो हम एक रात साथ बिताएँगे। दोनों में मेरा फ़ायदा है।"
उस रात दोनों दुकान में ही रहे। मीरा किताबों के बीच बैठी थी, अर्जुन दरवाज़े के पास। आधी रात को बिजली की एक तार में चिंगारी उठी — ठीक उसी जगह, जहाँ अख़बार ने लिखा था। अर्जुन ने एक झटके में मेन स्विच बंद किया, मीरा ने पानी की बाल्टी उठा ली। आग बुझ गई — शुरू होने से पहले ही।

दोनों एक-दूसरे को देखकर हँस पड़े। फिर चुप हो गए। दुकान में किताबों की ख़ुशबू थी, बाहर बारिश की आवाज़, और बीच में एक सन्नाटा, जिसमें दोनों की धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
मीरा ने धीरे से कहा, "तुम जानते हो, अर्जुन? दादाजी कहते थे — ये प्रेस किसी की किस्मत नहीं लिखती। ये सिर्फ़ वो दिखाती है, जो दिल पहले से जानता है।"
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा। लालटेन की रोशनी में वो सब कुछ, जो अख़बार ने लिखा था — अचानक सच लगने लगा।
"और अगर अख़बार ने लिखा होता कि हम कभी नहीं मिलेंगे?" उसने पूछा।
"तो मैं अख़बार फाड़ देती," मीरा ने कहा। "कुछ ख़बरें छपने के लिए नहीं, फाड़ने के लिए होती हैं।"
वो एक क़दम आगे बढ़ा। मीरा पीछे नहीं हटी। दोनों के बीच बस एक साँस का फ़ासला रह गया था — और फिर किताब महल की बत्तियाँ देर तक जलती रहीं, और गली ने उस रात की कोई ख़बर नहीं छापी।
जो ख़बर नहीं छपी
अगली रात प्रेस फिर चली — मगर इस बार अख़बार का पहला पन्ना ख़ाली था। सिर्फ़ एक लाइन थी — "कल की ख़बर आज कोई नहीं लिखेगा। ये पन्ना तुम्हारा है।"
मीरा ने अख़बार अर्जुन की तरफ़ बढ़ाया। "देखो। प्रेस ने लिखना बंद कर दिया।"
"क्यों?" अर्जुन ने पूछा।
"क्योंकि अब लिखने को कुछ नहीं बचा," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो नरमी थी, जो सिर्फ़ सच बोलते वक़्त आती है। "प्रेस उन्हीं की ख़बर छापती है, जो अपनी कहानी से भाग रहे होते हैं। हम भागना बंद कर चुके हैं।"
अर्जुन ने वो ख़ाली पन्ना हाथ में लिया। फिर मीरा की तरफ़ देखा — और मुस्कुराया। "तो फिर... अपनी कहानी हम ख़ुद लिखेंगे?"
"एक शर्त पर," मीरा ने कहा। "हर रात, एक पन्ना। और पहला पन्ना — आज।"
आज की ख़बर
एक महीने बाद गली नंबर सात में कुछ बदला हुआ था। किताब महल के बग़ल वाला पुराना दरवाज़ा अब खुला रहता था, और उसके अंदर प्रेस के पास एक छोटी-सी मेज़ लगी थी — जिस पर दो कप चाय, और एक ख़ाली अख़बार का पन्ना हमेशा रखा रहता था।

उस रात प्रेस ने एक आख़िरी बार ख़ुद-ब-ख़ुद एक लाइन छापी — "आज की ख़बर: दो दिलों ने अपना अख़बार ख़ुद छाप लिया।"
मीरा ने वो लाइन पढ़ी, और हँसते हुए अर्जुन के कंधे पर सिर रख दिया। अर्जुन ने उसे अपनी बाहों में ले लिया — धीरे से, जैसे कोई पुरानी किताब संभालता है।
बाहर गली में बारिश फिर शुरू हो गई थी। अंदर, दो दिलों की धड़कनें एक ही ताल पर थीं — और ख़ाली पन्ने पर, दो नाम लिखे थे।
अर्जुन। मीरा।
और नीचे, छोटी-सी लाइन में — "कहानी जारी है।"
Comments
Post a Comment