आसमान ने रंग बदलना शुरू किया था — पहले सुनहरा, फिर स्लेटी, और अब गहरा धूसर। उनतीस साल की अदिति हाउसबोट के डेक पर खड़ी थी, रेलिंग थामे, और देख रही थी कि बादल कैसे पानी की ओर झुकते आ रहे हैं। हवा में बारिश की गंध थी — वो गंध जो केरल में मॉनसून से एक घंटे पहले हवा में घुल जाती है, जैसे प्रकृति खुद ऐलान कर रही हो कि अब सब कुछ धुल जाएगा।
"मैडम, अंदर आ जाइए," पीछे से आवाज़ आई। "बारिश पाँच मिनट में यहाँ होगी, और ये छत आपको बचाएगी नहीं।"
अदिति मुड़ी। चौंतीस साल का विक्रम स्टीयरिंग के पास खड़ा था — कद लंबा, चेहरा धूप में तपा हुआ, और आँखों में समंदर जैसा ठहराव। वो इस हाउसबोट का कप्तान था। कोच्चि से आई अदिति ने दो दिन की ये क्रूज़ सिर्फ़ इसलिए बुक की थी क्योंकि उसके इंटीरियर डिज़ाइन स्टूडियो का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट खत्म हुआ था, और छह महीने की थकान उसके कंधों पर ईंटों जैसी बैठी थी। उसे लगा था — दो दिन पानी पर, कोई फ़ोन नहीं, कोई डेडलाइन नहीं।
मगर उसने ये नहीं सोचा था कि बुकिंग में गड़बड़ी से उस क्रूज़ की दूसरी मेहमान — एक जर्मन जोड़ा — कैंसल हो चुका था। नाव पर अब सिर्फ़ तीन लोग थे: अदिति, विक्रम, और रसोइया चंदन।
पहली बूँदें डेक पर गिरीं, तो विक्रम ने नाव को किनारे की ओर मोड़ा। "आगे पुलिया के पास गाँव की जेट्टी है। रात वहीं रुकेंगे। इस बारिश में आगे बढ़ना बेवकूफ़ी होगी।"
अदिति अंदर केबिन में आई। लकड़ी की दीवारों पर पुरानी तस्वीरें थीं — एक में यही नाव नई-नवेली खड़ी थी, और उसके सामने एक बुज़ुर्ग दंपति मुस्कुरा रहा था।
"मेरे माता-पिता," विक्रम ने दरवाज़े से कहा। "ये नाव उन्होंने 1998 में बनवाई थी। नाम रखा — 'मीनाक्षी', माँ के नाम पर।"
"और आप?" अदिति ने पूछा। "आप तो कप्तान लगते नहीं — मर्चेंट नेवी वाले लगते हैं।"
विक्रम हँसा — हल्की, थकी हुई हँसी। "पहचान लिया। बारह साल समंदर पर रहा। फिर पिता बीमार पड़े, और एक दिन फ़ोन आया कि नाव बेची जा रही है। मैंने इस्तीफ़ा दे दिया। लोग कहते हैं मैंने करियर डुबो दिया।" उसने तस्वीर की ओर देखा। "मगर कुछ चीज़ें डूबती नहीं — तैरती हैं।"
शाम को बारिश छत पर ढोल बजा रही थी। चंदन ने अदरक वाली चाय और केले के पकौड़े रखे। दोनों डेक के छज्जे के नीचे बैठे — बारिश की धार बस एक हाथ की दूरी पर।
"आप समंदर छोड़कर नहरों में आ गए," अदिति ने कहा। "अफ़सोस नहीं होता?"
"पहले होता था," विक्रम ने चाय का कप थामा। "समंदर बड़ा है — इतना बड़ा कि इंसान उसमें खो जाए। ये बैकवॉटर्स छोटे हैं, मगर इनमें हर मोड़ पर कोई कहानी है। वो देखिए —" उसने किनारे की ओर इशारा किया, जहाँ नारियल के पेड़ों के बीच एक पुराना घर दिख रहा था। "वहाँ मेरी दादी रहती थीं। हर शाम वो दीये जलाती थीं, और हम बच्चे नाव से देखते थे — लगता था पानी पर तारे तैर रहे हैं।"
अदिति चुपचाप सुनती रही। कितने महीनों बाद कोई उससे काम के अलावा कुछ बात कर रहा था।
रात को बारिश और तेज़ हो गई। अदिति को नींद नहीं आई — छत पर गिरती बूँदों की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि लगता था कोई हज़ारों उँगलियों से बजा रहा हो। वो डेक पर आई। विक्रम वहीं था, लालटेन की रोशनी में।
"नींद नहीं आई?" उसने पूछा।
"आवाज़... बहुत सुंदर है। डरावनी भी।"
विक्रम ने लालटेन उठाई और पानी की ओर दिखाया। "डरिए मत। देखिए — बारिश जब पानी पर गिरती है, तो हर बूँद एक छोटा चाँद बनाती है। दादी कहती थीं — जितनी बूँदें, उतने चाँद। आज तो आसमान से ज़्यादा चाँद पानी में हैं।"
अदिति ने देखा — लालटेन की रोशनी में हज़ारों छोटे-छोटे चमकते घेरे, बनते-बिगड़ते। उसने अनजाने में कहा, "काश ये पल रुक जाए।"
विक्रम ने उसकी ओर देखा, फिर नज़रें हटा लीं। "पल रुकते नहीं, अदिति जी। बस यादें रुक जाती हैं।"
उस रात दोनों देर तक बैठे रहे — बारिश, लालटेन, और बीच-बीच में उठती बातें। कोई बड़ा इज़हार नहीं, कोई वादा नहीं। बस दो अजनबी, जो एक ही छत के नीचे बारिश सुन रहे थे।
सुबह अदिति की आँख खुली तो बारिश थम चुकी थी। खिड़की से धूप की एक पतली रेखा अंदर आ रही थी। वो डेक पर आई — पानी शीशे जैसा शांत था, और किनारे पर एक गाँव की औरत नाव से चमेली की लड़ियाँ बेच रही थी।
विक्रम ने दो लड़ियाँ खरीदीं और एक अदिति की ओर बढ़ा दी। "मॉनसून की पहली चमेली। गाँव में मान्यता है — जो इसे पहनता है, उसकी वो इच्छा पूरी होती है जो उसने किसी से कही न हो।"
अदिति ने लड़ी ली। उसके चेहरे पर महीनों बाद पहली बार वो हँसी आई जो आँखों तक पहुँचती है। "मेरी तो कोई इच्छा नहीं है," उसने झूठ कहा, और दोनों हँस पड़े।
"एक जगह दिखाता हूँ," विक्रम ने नाव स्टार्ट की। "सुबह के इस वक़्त वहाँ कोई नहीं जाता।"
दस मिनट बाद नाव एक ऐसी खाड़ी में पहुँची जहाँ पानी इतना शांत था कि आसमान का पूरा अक्स उसमें उतर आया था — बादल, पेड़, और दोनों का चेहरा। अदिति ने पानी में अपना अक्स देखा, और फिर विक्रम का — दोनों पास-पास।
"यहाँ," विक्रम ने धीरे से कहा, "पानी झूठ नहीं बोलता। जो है, वही दिखता है।"
अदिति की आँखें भर आईं। "मैं छह महीने से भाग रही थी, विक्रम। काम, डेडलाइन, शहर... मुझे लगा था रुकना कमज़ोरी है।"
"और अब?"
"अब लगता है — रुकना भी एक कला है। जो आप जानते हैं।"
विक्रम ने कुछ नहीं कहा। उसने बस नाव का इंजन बंद कर दिया, और खाड़ी की ख़ामोशी में दोनों बैठे रहे — दो अक्स, एक पानी में।
दोपहर को क्रूज़ खत्म हुई। जेट्टी पर उतरते वक़्त अदिति ने अपने स्केचबुक से एक पन्ना फाड़ा — उस पर रात को बनाई गई एक डिज़ाइन थी: 'मीनाक्षी' के डेक के लिए नई रेलिंग और लालटेनों की कतार।
"ये... आपके लिए। इंटीरियर डिज़ाइनर हूँ — बिना डिज़ाइन दिए जा नहीं सकती थी।"
विक्रम ने पन्ना ध्यान से देखा, फिर मोड़कर जेब में रखा। "बनवाऊँगा। और जब बनेगी, तो पहली सवारी आपकी — अगले मॉनसून में।"
"वादा?" अदिति ने पूछा।
"वादा," विक्रम ने कहा। "और इस बार बुकिंग में गड़बड़ी नहीं होगी — दो मेहमान ही होंगे।"
नाव धीरे-धीरे ओझल हो गई। अदिति के बालों में चमेली की लड़ी महक रही थी, और दिल में एक अनकही इच्छा — जो उसने किसी से कही नहीं थी, मगर पानी ने देख ली थी।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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