प्रोजेक्टर रूम का दरवाज़ा खुलते ही धूल का बादल उठा — और तीस साल की राधिका ने मुँह पर हाथ रख लिया।
"यहीं है," नील ने कहा। "पापा ने मरते वक़्त कहा था — इस कमरे का ताला कभी मत तोड़ना।"
कमरा छोटा था — दीवारों पर जाले, कोने में एक पुराना प्रोजेक्टर, और फ़र्श पर टिन के डिब्बे। एक डिब्बे पर हाथ से लिखा था — "संध्या — रील 6 (अंतिम)"।
राधिका भोपाल से आई थी। पुराने हाथ से बने फ़िल्मी पोस्टर रीस्टोर करना उसका काम था — और उज्जैन के अशोका टॉकीज़ के मालिक की बेटी ने उसे बुलाया था। हॉल 1987 से बंद पड़ा था; दीवारों पर लगे पोस्टर अब नीलाम होने वाले थे।
"ये सारे पोस्टर हाथ से बने हैं?" उसने एक फटे पोस्टर को छुआ।
"तब पोस्टर प्रिंट नहीं होते थे," नील हँसा — तैंतीस का, साँवला, आँखों में वो ठहरन जो पुरानी इमारतों में पलता है। हॉल के सामने उसकी चाय की दुकान थी। "कलाकार पेंट करता था — एक-एक चेहरा, एक-एक अक्षर।"
सबसे बड़ा पोस्टर स्टोररूम में था — "संध्या"। 1962 की फ़िल्म। नायिका का चेहरा आधा फटा था।
"ये फ़िल्म तो मैंने कभी सुनी नहीं," राधिका ने कहा।
"क्योंकि ये कभी रिलीज़ ही नहीं हुई," नील ने धीरे से कहा। "आख़िरी हफ़्ते शूटिंग रुक गई। नायिका मालविका एक रात सेट से गायब हो गईं — और कभी नहीं मिलीं।"
राधिका की उँगलियाँ पोस्टर पर रुक गईं। "और निर्देशक?"
"दयाल चंद्र।" नील ने दीवार की ओर देखा। "कहते हैं, उन्होंने अंत की शूटिंग कभी पूरी नहीं की। स्क्रिप्ट में आख़िरी सीन था — नायिका पहाड़ी की चचट्टान से कूद जाती है।"
उस शाम राधिका ने पोस्टर अपने कमरे में फैलाए। मालविका का आधा चेहरा देखकर उसे लगा — जैसे वो कुछ कहना चाहती हो।
रात को नील चाय लेकर आया। "एक बात बताऊँ? पर हँसोगी नहीं।"
"बताओ।"
"हर पूर्णिमा की रात, ये प्रोजेक्टर खुद चल जाता है।" उसने प्रोजेक्टर रूम की ओर इशारा किया। "खाली हॉल में फ़िल्म चलती है — 'संध्या'। पापा देखते थे। अब मैं देखता हूँ।"
राधिका हँसी नहीं। उसने नील की आँखों में देखा — वहाँ डर नहीं था, एक अजीब सी तड़प थी।
"कल पूर्णिमा है," उसने कहा।
"जानता हूँ," नील ने चाय का कप रखा। "रुकना चाहोगी?"
राधिका ने पोस्टर की ओर देखा — मालविका का आधा चेहरा। "हाँ।"
अगली रात हॉल का मुख्य दरवाज़ा खोला गया। धूल भरी सीटें, बड़ी स्क्रीन — नील ने पहली पंक्ति की दो सीटें साफ़ कीं।
"बैठो। शुरू होने वाला है।"
ठीक नौ बजे — प्रोजेक्टर की घरघराहट। कोई नहीं था वहाँ, फिर भी रील घूम रही थी। स्क्रीन पर रोशनी फूटी — सफ़ेद-काली तस्वीरें, 1962 की दुनिया।
"संध्या" — एक गाँव की लड़की की कहानी, जो शहर के एक चित्रकार से प्यार करती है। मालविका स्क्रीन पर जीवंत थीं — हँसतीं, रोतीं, गातीं।
राधिका साँस रोके देख रही थी। नील का हाथ उसकी हथेली के पास था — छूता नहीं, पर दूर भी नहीं।
ट्टान। समंदर। हवा में उड़ता दुपट्टा। नायिका किनारे पर खड़ी थी — स्क्रिप्ट के मुताबिक़ अब उसे कूदना था।
राधिका की साँस अटक गई। नील ने उसकी हथेली थाम ली।
और तभी — नायिका रुकी। वो कैमरे की ओर मुड़ी। और मुस्कुराई।
स्क्रीन पर एक ऐसा फ्रेम आया, जो फ़िल्म में हो ही नहीं सकता था — दयाल चंद्र और मालविका, शादी के जोड़े में, एक-दूसरे का हाथ थामे।
फिर स्क्रीन सफ़ेद हो गई। प्रोजेक्टर रुक गया। हॉल में सन्नाटा — सिर्फ़ दो धड़कते दिलों की आवाज़।
"ये… ये अंत फ़िल्म में नहीं था," राधिका फुसफुसाई।
"कभी नहीं होता," नील ने कहा। "सिर्फ़ पूर्णिमा की रात। पापा कहते थे — दयाल चंद्र ने ये अंत सिर्फ़ इस प्रोजेक्टर रूम में अकेले बनाया था। असल ज़िंदगी में वो मालविका से शादी नहीं कर पाए — तो उन्होंने फ़िल्म में उन्हें वो अंत दिया, जो क़िस्मत ने नहीं दिया।"
"तो मालविका गायब नहीं हुईं थीं?"
"हुईं थीं — सबसे। सिवाय उनके, जिनसे वो प्यार करती थीं।" नील ने स्क्रीन की ओर देखा। "कहते हैं, वो दोनों इसी शहर में कहीं रहे — नाम बदलकर।"
राधिका की आँखों में आँसू थे। "एक आदमी ने अपनी मोहब्बत को अमर करने के लिए पूरी फ़िल्म ही छिपा दी।"
"मोहब्बत ऐसी ही होती है, राधिका।" पहली बार नील ने उसका नाम लिया। "जो दुनिया को नहीं मिलती, वो किसी अँधेरे हॉल में ज़िंदा रहती है।"
वो दोनों हॉल से बाहर आए। आसमान में पूरा चाँद था, और अशोका टॉकीज़ की पुरानी मार्की पर बल्बों की एक क़तार अब भी जलती थी — नील रोज़ शाम को जलाता था।
हल्की बारिश शुरू हो गई थी। राधिका मार्की के नीचे खड़ी हो गई; नील उसके पास आया — इतना पास कि बारिश की बूंदें दोनों के बीच की हवा में ठहर गईं।
"तुम यहाँ क्यों रुकीं, राधिका?" उसने पूछा। "पोस्टर तो कल भी रीस्टोर हो सकते थे।"
"शायद मैं भी किसी अधूरी कहानी का अंत देखने आई थी," उसने कहा। "अपनी।"
नील ने उसके गाल पर आई बारिश की बूंद पोंछी — और फिर उसके होंठ उसके होंठों से मिले। धीरे, गहरे — जैसे कोई पुरानी रील पहली बार सही गति पर चले।
मार्की के बल्बों की रोशनी में दोनों की परछाइयाँ एक हो गईं। रात का बाक़ी हिस्सा अशोका टॉकीज़ की दीवारों के बीच रह गया — और सुबह तक किसी ने उसे नहीं छेड़ा।
सुबह राधिका प्रोजेक्टर रूम गई — टिन का डिब्बा खाली था। "संध्या — रील 6 (अंतिम)" गायब थी।
डिब्बे के नीचे एक पुराना काग़ज़ दबा था, हाथ की लिखावट में — "कहानी अधूरी नहीं रहती। जो देख लेता है, वो उसे पूरा कर देता है। — द.च."
राधिका ने काग़ज़ सीने से लगाया। नील दरवाज़े पर खड़ा था।
"तुम्हें पता था ये गायब हो जाएगी?" उसने पूछा।
"पापा कहते थे — रील उसी को दिखती है, जिसे अंत देखना होता है।" नील मुस्कुराया। "अब ये किसी और पूर्णिमा का इंतज़ार करेगी।"
राधिका ने पोस्टरों की ओर देखा — मालविका का चेहरा अब पूरा हो चुका था, उसकी कलम के नीचे। "मैं यहीं रुक रही हूँ, नील।"
"और हॉल?" उसने पूछा।
"हॉल खुलेगा," राधिका ने उसका हाथ थामा। "हेरिटेज सिंगल-स्क्रीन के तौर पर। और पहली फ़िल्म जो चलेगी — 'संध्या'। उसका असली अंत, जो अब तक सिर्फ़ दो लोगों ने देखा था।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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