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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

बारह साल का फूल

बारह साल का फूल

भोर के पाँच बजकर चालीस मिनट पर मुन्नार की घाटियाँ नीली जल रही थीं।

नीलकुरिंजी — बारह साल में सिर्फ़ एक बार खिलने वाला फूल — ने वागावुराई की पूरी ढलान को बैंगनी-नीली चादर से ढँक दिया था। नीचे चाय के बागानों की हरी लकीरें थीं, ऊपर तैरता कोहरा, और बीच में वो रंग जो नंदिनी ने आज तक सिर्फ़ तस्वीरों में देखा था।

अट्ठाईस साल की नंदिनी — पुणे की प्लांट जेनेटिसिस्ट — घाटी के किनारे खड़ी कैमरे से ये रंग क़ैद कर रही थी। उसका मिशन साफ़ था: तीन हफ़्तों में ये फूल मुरझा जाएँगे, और उसके पहले उसे इस पीढ़ी के नीलकुरिंजी का जीन-सैंपल इंस्टीट्यूट तक पहुँचाना था।

मगर घाटी के उस पार, जहाँ सबसे घना खिलना था, एक पुराना बोर्ड टँगा था — "वागावुराई एस्टेट — निजी भूमि। बिना अनुमति प्रवेश निषेध।"

और बोर्ड के नीचे खड़ा था अर्जुन।

"चौंतीस साल का हूँ, मैडम। तीसरी पीढ़ी से ये एस्टेट देख रहा हूँ," उसने कहा, जब नंदिनी अनुमति माँगने उसके बंगले पहुँची। "फूलों के तीन हफ़्ते, बाक़ी बारह साल — इस घाटी की बातें घाटी में ही रहती हैं। आप घाटी के इस पार रहिए।"

"साइंस बारह साल इंतज़ार नहीं करती, मिस्टर अर्जुन," नंदिनी ने कहा।

"कुछ चीज़ें साइंस की मोहताज नहीं होतीं, डॉक्टर नंदिनी," उसने जवाब दिया — और दरवाज़ा बंद नहीं किया, पर उसकी आँखों में दरवाज़ा बंद हो चुका था।

तीन दिन नंदिनी ने सरकारी ढलानों से सैंपल लिए। पर रात को अपने टेंट में वो मैप देखती रही — एस्टेट वाली ढलान, जहाँ खिलना सबसे घना था, जहाँ पराग सबसे ताज़ा होगा।

चौथी शाम वो गई।

परमिट की लकीर पार करते हुए उसके हाथ काँप रहे थे — वैज्ञानिक के नहीं, चोर के। ढलान पर चाँदनी उतर रही थी, फूलों पर चाँदी-सी परत। उसने सैंपल किट खोली ही थी कि पीछे से आवाज़ आई —

"रुकिए।"

अर्जुन। हाथ में टॉर्च नहीं थी — चाँदनी काफ़ी थी। वो कुछ क़दम दूर खड़ा था, बाहें बँधीं, चेहरा आधा छाँव में।

"मैं सिर्फ़ तीन सैंपल—"

"तीन सैंपल, तीन सौ सैलानी, तीन हज़ार तस्वीरें — सब यही कहते हैं," उसने कहा। पर आवाज़ में ग़ुस्सा कम, थकान ज़्यादा थी। "आप जानती हैं, इस ढलान पर आख़िरी बार कोई बाहर वाला कब आया था? बारह साल पहले। मेरी दादी के जाने वाले साल।"

नंदिनी ने किट बंद कर दी। "मैं माफ़ी चाहती हूँ।"

वो कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बैठ गया — फूलों के बीच, वहीं ज़मीन पर। "बैठिए। सैंपल मत लीजिए, बस... देखिए।"

वो बैठ गई। कुछ दूरी पर।

"दादी के पास एक टिन का डिब्बा था," अर्जुन ने कहा, चाँदनी की ओर देखते हुए। "उसमें दबा हुआ नीलकुरिंजी और एक पर्ची — 'पूर्णिमा की रात घाटी सपने बुनती है। उस रात जो पराग साँसों में उतरे, वो नींद में किसी और का कल देखता है।'"

"लोककथा," नंदिनी ने हलके से कहा।

"लोककथा," उसने दोहराया। "पर दादी ने वो पर्ची उसी रात लिखी थी जिस रात दादा गुज़रे थे — बारह साल पहले, ठीक इसी खिलने के हफ़्ते में। और कल पूर्णिमा है, डॉक्टर नंदिनी।"

हवा में पराग तैर रहा था — इतना घना कि चाँदनी में चमक रहा था। नंदिनी की आँखें भारी होने लगीं। अर्जुन की आवाज़ दूर से आती सुनाई दी — "उठिए... यहाँ मत सोइए..."

पर वो उठ नहीं पाई।

जब नंदिनी की आँख खुली, चाँदनी वैसी ही थी — पर घाटी बदल चुकी थी।

चाय की क़तारें छोटी थीं, बंगले की छत नई, हवा में ताज़ा पेंट और गीली मिट्टी की गंध। और ढलान के नीचे से कोई आ रहा था — लंबा क़द, वही चेहरा, पर आँखों में बारह साल कम।

अर्जुन। जवान अर्जुन।

"तुम... यहाँ कैसे?" उसने पूछा — और फिर रुक गया, जैसे जवाब ख़ुद समझ गया हो। "पराग। पूर्णिमा। दादी सही कहती थीं।"

"ये सपना है?" नंदिनी ने पूछा।

"या घाटी की याद," उसने कहा। "बारह साल पहले की इसी रात। चलो — दादी कहती थीं, इस रात घाटी अपना सबसे ख़ूबसूरत पल दोहराती है।"

वो साथ चले। फूलों के बीच से, चाँदनी में। नीचे पुराने जंगली नाशपाती के पेड़ के नीचे — जो असलियत में अब नहीं रहा — दो परछाइयाँ बैठी थीं। एक बूढ़ा जोड़ा। दादा-दादी। जवान, हँसते हुए।

अर्जुन की आँखें भर आईं। "उस रात दादा ने दादी से कहा था — 'फूल बारह साल में खिलते हैं, पर हम हर साल खिलेंगे।' अगले ही हफ़्ते वो चले गए।"

नंदिनी ने उसका हाथ थामा। उसने हाथ नहीं छुड़ाया।

बूढ़े जोड़े की परछाइयाँ धुंध में घुल गईं। चाँदनी और घनी हो गई। पराग चमक रहा था। अर्जुन ने नंदिनी की ओर देखा — इतने क़रीब कि उसकी साँसों की गर्मी उसके चेहरे पर थी।

"अगर ये सपना है," उसने फुसफुसाकर कहा, "तो मैं जागना नहीं चाहता।"

"तो मत जागो," नंदिनी ने कहा।

उसके होंठ उसके होंठों से एक साँस की दूरी पर ठहर गए — पराग, चाँदनी और बारह साल के इंतज़ार की ख़ुशबू लिए।

और चाँदनी ने वहीं पर्दा गिरा दिया।

सुबह नंदिनी की आँख खुली तो वो असली ढलान पर थी — शॉल ओस से भीगी, बदन में फूलों की ख़ुशबू। उसकी मुट्ठी बँधी थी। उसने खोली।

अंदर एक ताज़ा दबा हुआ नीलकुरिंजी था — जो उसने कभी तोड़ा ही नहीं था।

क़दमों की आहट। अर्जुन आ रहा था — हाथ में वही टिन का डिब्बा। चेहरा उतरा हुआ, आँखें लाल।

"मैंने भी तुम्हें देखा था," उसने कहा, बिना भूमिका के। "उसी घाटी में। बारह साल पहले वाली।" उसने डिब्बा खोला — दबा फूल, और एक पर्ची, दादी की लिखावट में, तारीख़ बारह साल पुरानी:

"जिसे ये फूल सपने में मिले, वो अकेला नहीं जागता।"

नंदिनी ने अपनी मुट्ठी का फूल उसके डिब्बे के फूल के पास रखा — दोनों एक जैसे, दोनों ताज़ा।

"तो अब?" उसने पूछा।

अर्जुन ने ढलान की ओर देखा — फूलों के आख़िरी दिन गिने जा रहे थे। "बारह साल बाद आओगी? अगले खिलने पर?"

नंदिनी मुस्कुराई — वो मुस्कान जो सिर्फ़ भोर की धूप में खिलती है। "बारह साल? इस बार का फूल अभी खिला है, अर्जुन।"

उसने उसका हाथ थामा — इस बार सपने में नहीं, जागती घाटी में।

कुछ फूल बारह साल में खिलते हैं — और कुछ लोग एक ही रात में।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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