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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

बर्फ़ के क़दम

सुबह के पाँच बजे थे, और गुलमर्ग की ताज़ा बर्फ़ पर किसी के क़दमों के निशान थे।

अजीब बात ये थी — वो निशान उसके आगे-आगे चल रहे थे।

आलिया ने अपनी स्की-पोल बर्फ़ में गाड़ दी और साँस रोककर देखा।

रात भर बर्फ़ गिरी थी — चिकनी, कुँवारी, किसी के छुए बिना। उसके अपने बूटों के निशान उसके पीछे थे, साफ़ और अकेले। और उसके ठीक सामने, कोई दस क़दम आगे, एक और जोड़ी निशान बर्फ़ पर बढ़ रही थी — जैसे कोई उससे बस थोड़ा आगे चल रहा हो।

"ये नामुमकिन है," वो बुदबुदाई, और उसकी साँस धुएँ की तरह ठंडी हवा में घुल गई।

अट्ठाईस साल की आलिया दिल्ली की स्की-इंस्ट्रक्टर थी — इस सीज़न गुलमर्ग आई थी, बीस साल बाद। आख़िरी बार आठ साल की बच्ची बनकर पिता के साथ आई थी — वो स्की-पेट्रोल में थे। उसी सर्दी में एक हिमस्खलन उन्हें ले गया था। तब से उसने अफ़रवट की पिछली ढलान की तरफ़ देखा तक नहीं था।

कल रात सीज़न की पहली बर्फ़ गिरी थी, और चाय की दुकान पर बूढ़े ग़ुलाम रसूल ने केतली उठाते हुए कहा था — "पहली बर्फ़ उसी के क़दम दिखाती है, जिसे पहाड़ बुलाता है, बेटी।"

आलिया हँस दी थी। "और जिसे पहाड़ नहीं बुलाता, चाचा?"

"उसे सिर्फ़ बर्फ़ दिखती है," ग़ुलाम रसूल ने आँख मारी थी। "क़दम नहीं।"

अब वो क़दम उसके सामने थे।

उसने पीछे देखा — ख़ाली ढलान, देवदारों की कतार, और दूर नीचे धुंध में डूबा गाँव। कोई नहीं। आगे देखा — निशान बर्फ़ की चादर पर साफ़ थे, एड़ियों के गहरे धब्बे, जैसे चलने वाला भारी बूट पहने हो।

दिमाग़ कह रहा था — वापस चलो। दिल कह रहा था — देखो तो, ये जाते कहाँ हैं।

आलिया ने पोल उठाई और निशानों के पीछे चल पड़ी।

निशान ढलान से उतरकर देवदारों के झुरमुट की तरफ़ गए, फिर एक पुरानी पगडंडी पर चढ़े — जो अफ़रवट की पिछली ढलान की ओर जाती थी। वो जगह, जहाँ जाने की उसने क़सम खाई थी।

उसके हाथ ठंड से नहीं, किसी और वजह से काँप रहे थे।

तभी हवा बदली। पहले हल्की सरसराहट, फिर सीटी, फिर दहाड़। आसमान एक पल में सफ़ेद हो गया — व्हाइटआउट। उसने हुड खींचा और रेडियो निकाला — लेकिन उससे पहले ही नज़र निशानों पर पड़ी।

निशान रुक गए थे।

और जहाँ निशान रुके थे, वहाँ बर्फ़ में कोई आधा दबा पड़ा था — एक आदमी, स्की-जैकेट में, चेहरा बर्फ़ से ढका।

आलिया का दिल गले में आ गया। उसने दस्ताने उतारे बिना नब्ज़ टटोली — चल रही थी, धीमी। "रुको! मैं यहीं हूँ!" उसने रेडियो पर पेट्रोल-फ़्रीक्वेंसी दबा दी। "ये आलिया बोल रही हूँ — अफ़रवट बैक-रिज, पगडंडी के मोड़ पर एक आदमी बर्फ़ में दबा है। साँस चल रही है। जल्दी!"

जवाब में एक जानी-पहचानी आवाज़ आई — गहरी, शांत। "जुनैद बोल रहा हूँ। रस्सी लेकर निकल रहा हूँ। तुम उसे हिलाना मत — मैं पाँच मिनट में पहुँच रहा हूँ।"

जुनैद। बत्तीस साल का एवलांच-रेस्क्यू वॉलंटियर, चरवाहे का पोता, जो अफ़रवट की हर चट्टान को नाम से जानता था। कल शाम पेट्रोल-हट में आलिया की बाइंडिंग कसते हुए उसने कहा था — "डर तुम्हारे बूटों में है, तुम्हारे दिल में नहीं। बूट बदल लो, दिल रहने दो।" आलिया ने उसे घूरा था, और वो हँस दिया था — ऐसी हँसी, जो बर्फ़ पर धूप जैसी लगती है।

पाँच मिनट में जुनैद अपनी टीम के साथ पहुँच गया — रस्सी, स्ट्रेचर, हेडलैम्प। तूफ़ान अब पूरी ताक़त से चीख़ रहा था। उन्होंने दबे हुए आदमी को सावधानी से निकाला — विवेक, छब्बीस साल, मुंबई का टूरिस्ट, जो ऑफ़-पिस्ट जाकर रास्ता भटक गया था।

"इसे नीचे ले जाओ," जुनैद ने टीम से कहा। "तूफ़ान बढ़ रहा है।"

"और तुम?" आलिया चिल्लाई।

"तुम्हारे साथ ऊपर — हट तक। इस हवा में नीचे उतरना आत्महत्या है।"

वो दोनों रस्सी से बँधकर पुरानी चरवाहा-हट की तरफ़ बढ़े — ग़ुलाम रसूल के दादा की हट, जो आधी सदी से तूफ़ानों में पनाह देती आई थी। दरवाज़ा अंदर से खोला, बुख़ारी सुलगाई — बाहर तूफ़ान दरवाज़ा थपथपाता रहा।

गर्माहट फैलते ही आलिया की नज़र लकड़ी की शहतीर पर पड़ी — वहाँ कुछ खुदा था। उसने लालटेन पास की।

"पेट्रोल-7।"

उसकी साँस थम गई। ये उसके पिता का पेट्रोल-नंबर था। उसकी उँगलियाँ खुदे हुए अक्षरों पर फिसल गईं।

जुनैद ने दो प्यालों में क़हवा डाला — गुलाबी नमक वाला, बादाम की ख़ुशबू वाला। "तुम्हारे पिता इसी हट में तूफ़ानी रातें गुज़ारते थे," उसने धीरे से कहा। "मेरे दादा उनके दोस्त थे।"

"तुम उन्हें जानते थे?" आलिया की आवाज़ काँप गई।

"मैं दस साल का था, जब वो गए।" जुनैद बुख़ारी के पास बैठ गया, आग की रोशनी उसके चेहरे पर नाच रही थी। "दादा ने मुझे पेट्रोल-लॉग दिखाया था। उस सुबह तुम्हारे पिता ने रेडियो पर कहा था — 'मुझे ऐसे क़दम दिख रहे हैं, जो यहाँ होने नहीं चाहिए। मैं उनके पीछे जा रहा हूँ।'"

आलिया ने प्याला कसकर पकड़ लिया। "फिर?"

"फिर वो एक चरवाहे के लड़के को लेकर लौटे — बर्फ़ में दबा हुआ, ज़िंदा। लड़का बच गया।" जुनैद ने रुककर उसे देखा। "तुम्हारे पिता नहीं लौटे।"

हट में सिर्फ़ बुख़ारी की चटचटाहट सुनाई दे रही थी। बाहर तूफ़ान, अंदर आग।

"दादा कहते थे," जुनैद ने कहा, "पहाड़ क़दम उसी को दिखाता है, जो किसी और के लिए उनके पीछे जाने की हिम्मत रखता है। तुम्हारे पिता ने उस लड़के के लिए क़दमों का पीछा किया था। और आज सुबह —" उसने आलिया की आँखों में देखा — "पहाड़ ने क़दम तुम्हें दिखाए। और तुमने पीछा किया। विवेक ज़िंदा है, आलिया। तुम्हारी वजह से।"

आलिया की आँखों में आँसू थे, पर वो मुस्कुरा रही थी — बीस साल में पहली बार उस ढलान का नाम सुनकर डर नहीं लग रहा था।

"तो ये कोई भूत-प्रेत नहीं था," वो फुसफुसाई। "ये... बुलावा था।"

"पहाड़ भूत नहीं भेजता," जुनैद ने कहा, और थोड़ा पास सरक आया। "पहाड़ सिर्फ़ रास्ता दिखाता है। चलना हमें पड़ता है।"

उनके बीच की दूरी अब इतनी कम थी कि बुख़ारी की गर्माहट से ज़्यादा किसी और चीज़ की गर्माहट महसूस हो रही थी। जुनैद ने उसके गाल पर जमी बर्फ़ की एक बूँद अपनी उँगली से पोंछी — धीरे, पूछती हुई नज़रों से। आलिया ने अपनी आँखें नहीं हटाईं।

और फिर गुलमर्ग की उस रात ने अपनी सफ़ेद चादर तान दी — बाक़ी कहानी बर्फ़ ने अपने पास रख ली।

सुबह जब आलिया की आँख खुली, तूफ़ान थम चुका था। खिड़की के बाहर आसमान गुलाबी था, और बर्फ़ पर सूरज की पहली किरण चाँदी बिखेर रही थी। बुख़ारी के पास दो ख़ाली प्याले थे, और दरवाज़े के बाहर ताज़ा बर्फ़ पर दो जोड़ी क़दम — एक-दूसरे के बिल्कुल पास, एक ही दिशा में जाते हुए।

एक साल बाद, अगले सीज़न की पहली बर्फ़ पर, लोगों ने अफ़रवट की ढलान पर दो स्कीयरों को पहली लकीर खींचते देखा — साथ-साथ, बिल्कुल ताल में।

उस शाम आलिया हट की शहतीर के पास गई, और अपने पिता के "पेट्रोल-7" के ठीक नीचे एक नई लकीर खोदी — "पेट्रोल-8।"

जुनैद ने उसका हाथ थामा। "पहाड़ ने तुम्हें बुलाया था," उसने कहा। "और तुम आ गईं।"

आलिया ने मुस्कुराकर बर्फ़ की ओर देखा, जहाँ उनके क़दम एक-दूसरे में घुल रहे थे। "अब हम दोनों को बुलाता है," उसने कहा।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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