पानी में वो खड़ा था — पर जब रूही ने पलटकर देखा, सीढ़ियाँ ख़ाली थीं।
भोर के साढ़े पाँच बजे थे। पाटन की रानी की वाव में अभी सैलानी नहीं आए थे — सिर्फ़ रूही, उसका कैमरा, और सात मंज़िल नीचे ठहरा हरा-काला पानी। उसने व्यूफ़ाइंडर से आँख हटाई, फिर पानी की तरफ़ देखा। अक्स अब भी वहीं था — एक आदमी, सीढ़ियों पर खड़ा, हाथ में स्केचबुक।
रूही (26) अहमदाबाद की आर्किटेक्चर फ़ोटोग्राफ़र थी। "पानी के मंदिर" नाम की उसकी फ़ोटो-सीरीज़ गुजरात की बावड़ियों पर थी — और रानी की वाव उसका आख़िरी चैप्टर। ख़ास परमिशन लेकर वो तीन सुबहों से भोर में आ रही थी, जब वाव में सिर्फ़ कबूतरों की गुटरगूँ और पानी की हल्की सरसराहट होती है।
पहली सुबह उसने सोचा था — थकान का भ्रम। तीन दिन से वो भोर में उठ रही थी, आँखें धुँधली थीं। पर दूसरी सुबह उसने फ़ोटो खींची। कैमरे की स्क्रीन पर ज़ूम किया — अक्स साफ़ था। चेहरा धुँधला, पर कंधों की रेखा, हाथ में स्केचबुक का कोना — सब साफ़। उसने वो फ़ोटो किसी को नहीं दिखाई। कुछ चीज़ें दिखाने से पहले समझनी पड़ती हैं।
तीसरी सुबह — आज — उसने पलटकर देखा था। सीढ़ियाँ ख़ाली थीं। सिर्फ़ पत्थर, सिर्फ़ सुबह की धूप की पहली धार, जो वाव के मुँह से तिरछी उतर रही थी।
"कौन हो तुम?" उसने पानी से पूछा। पानी ने कोई जवाब नहीं दिया — बस हल्की-सी लहर, और अक्स थोड़ा हिला, जैसे मुस्कुराया हो।
रूही ने कैमरा उठाया और एक के बाद एक तीन शॉट लिए। हर शॉट में अक्स थोड़ा और साफ़ — तीसरे शॉट में तो लगा, जैसे वो आदमी भी उसी की तरफ़ देख रहा हो।
विवान (30) कंज़र्वेशन आर्किटेक्ट था। वाव की बहाली का काम उसी की टीम के पास था — टूटी जालियाँ, घिसे शिल्प, सदियों पुराना पत्थर। वो हर भोर मज़दूरों से पहले साइट पर आता, स्केचबुक लिए — क्योंकि भोर की रोशनी में पत्थर अपना असली चेहरा दिखाता है।
उस सुबह वो चौथी मंज़िल की सीढ़ी पर खड़ा एक टूटी जाली की मरम्मत का स्केच बना रहा था, कि नीचे से क़दमों की आहट आई।
रूही कैमरा लिए उतर रही थी। विवान ने सिर उठाया — और दोनों ठिठक गए।
वो चेहरा। पानी वाला चेहरा।
"तुम..." रूही की उँगलियाँ कैमरे पर काँप गईं।
विवान ने स्केचबुक धीरे से बंद की। "तुमने भी देखा है, है न? पानी में।"
रूही की साँस थम गई। "तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि तीन सुबहों से मैं भी एक अक्स देख रहा हूँ," विवान बोला। "एक लड़की — कैमरा लिए, भोर की रोशनी में, सातवीं मंज़िल की सीढ़ी पर। मैं समझा था... ख़याल है। थकान का।"
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे — सात मंज़िल गहरी वाव में, भोर की नीली रोशनी में, जैसे वक़्त ने साँस रोक ली हो। कहीं ऊपर कबूतरों का एक झुंड वाव के मुँह से निकला, पंखों की फड़फड़ाहट गूँजती हुई नीचे आई।
"मैं रूही," उसने आख़िर कहा।
"विवान।" वो मुस्कुराया। "लगता है, पानी ने हमारा परिचय पहले ही करा दिया था।"
बूढ़े चौकीदार काका ने दोपहर को चाय पिलाते हुए बताया — वाव की पुरानी मान्यता: "ये पानी वो चेहरा दिखाता है, जिसे दिल ढूँढ रहा हो। रानी उदयमती ने इसे प्रेमियों के लिए बनवाया था — कहते हैं, जो सच्चे दिल से देखे, उसे उसका अक्स मिलता है। पर शर्त है — अक्स सिर्फ़ उसे दिखता है, जो अकेला आए। भीड़ में पानी सिर्फ़ पानी रहता है।"
"और अगर दोनों को एक-दूसरे का अक्स दिखे?" रूही ने पूछा।
काका हँस दिए — वो हँसी जिसमें सत्तर साल की धूप थी। "तो बिटिया, पानी ने फ़ैसला सुना दिया। बाक़ी तो बस... मिलने की देर है।"
उस शाम मानसून की पहली ज़ोरदार बारिश आई। रूही और विवान वाव के मंडप में फँस गए — बाहर झमाझम, अंदर पत्थर की ठंडक और पानी की टपटप। वाव के खुले मुँह से बारिश की चादर गिर रही थी, और नीचे पानी पर हज़ारों छींटे नाच रहे थे।
"तुम्हें डर नहीं लगा?" विवान ने पूछा। "एक अजनबी का अक्स पानी में देखकर?"
"डर तो तब लगता, जब अक्स झूठा निकलता," रूही मुस्कुराई। "तुम सच निकले।"
बिजली कड़की — रोशनी की एक धार वाव में उतरी, पानी पर नाची, और रूही के चेहरे पर ठहर गई। विवान ने हाथ बढ़ाया — उसके भीगे बालों से एक लट हटाई। उसकी उँगलियाँ उसके गाल पर ठहर गईं।
रूही ने आँखें बंद कर लीं। बारिश की आवाज़, भीगे पत्थर की ख़ुशबू, और दो धड़कनें — एक लय में। विवान का हाथ उसके गाल से उसकी ठुड्डी तक सरका — धीरे, जैसे पत्थर पर नक़्क़ाशी।
उसके होंठों के बीच बस एक साँस का फ़ासला था — और फिर दुनिया धुँधली हो गई।
[समाप्त]
अगली सुबह पाटन के चाय के ठेले पर दो कुल्हड़ थे। और रूही के कैमरे की स्क्रीन पर — वाव के पानी की नई तस्वीर — दो अक्स थे, एक-दूसरे का हाथ थामे।
विवान ने तस्वीर देखी और हँस दिया। "अब पानी को भी चैन मिल गया।"
"या शायद," रूही बोली, "अब उसे कुछ और दिखाना ही नहीं था।"



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