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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

भूली हुई ख़ुशबू

भूली हुई ख़ुशबू

पहली बारिश की रात ताँबे की देग गा रही थी।

भाप की सरसराहट में उठती धीमी, गहरी गूँज — जैसे कोई बूढ़ा गला पुराना गीत गुनगुना रहा हो। अंदर आग पर ताँबे की विशाल देग बैठी थी; बग़ल से बाँस की नली साँप-सी बलखाती हौज़ के ठंडे पानी में उतर रही थी।

"डरिए मत," अँधेरे से एक आवाज़ आई। "वो गाती तभी है जब ख़ुश होती है।"

लालटेन की रोशनी में वो दिखा — बत्तीस के आसपास, आस्तीनें कोहनियों तक चढ़ीं, माथे पर पसीने-भाप की चमक, हाथ में गुलाब की पंखुड़ियों की टोकरी।

"आप ही ज़ैद हैं?" अवनी ने पूछा।

"और आप वो मैडम जो मिटते हुनर ढूँढती हैं।" वो मुस्कुराया। "अंदर आइए — बारिश बाहर, कहानी अंदर।"



ट्ठाईस की अवनी मुंबई की फ्रीलांस राइटर थी — मैगज़ीन के लिए "मिटते हुनर" सीरीज़ लिख रही थी। कन्नौज का नाम लिस्ट में सबसे ऊपर था — इत्र की नगरी, जहाँ कभी तीन सौ भट्टियाँ धुआँ उड़ाती थीं, अब गिनी-चुनी बची हैं।

"नूर इत्र भट्टी" गली के आख़िर में थी — नब्बे साल पुरानी; दीवारों पर कालिख-गुलाब की गंध, आँगन में ताँबे के बर्तनों की क़तार।

"ये रही बूढ़ी देग।" ज़ैद ने देग पर हाथ फेरा, जैसे बुज़ुर्ग के कंधे पर। "परदादा की लगवाई है — नब्बे साल में अंदर कभी माँजा नहीं फेरा।"

"क्यों?"

"अब्बा कहते थे — देग माँजो तो यादें धुल जाती हैं।" उसने आग में लकड़ी डाली। "और इसे बहुत कुछ याद है।"

अवनी ने नोटबुक निकाली। "कैसी यादें?"

ज़ैद ने पंखुड़ियाँ डालीं। भाप का नया बादल उठा। "यहाँ का उसूल है — पहली बारिश की रात जो इत्र इस देग से उतरे, वो बाज़ार का इत्र नहीं होता। वो वो ख़ुशबू देता है जो तुम भूल चुकी हो — पर तुम्हारा दिल अब भी सँभाले है।"

अवनी हँस दी। "ये तो कहानी है।"

"कन्नौज में कहानी और क़ीमत में फ़र्क़ नहीं होता, मैडम।" ज़ैद ने हौज़ के पानी में हाथ डुबोया। "आज़माना चाहेंगी?"

"कैसे?"

"अपनी भूली हुई कोई ख़ुशबू बताइए। देग बाक़ी काम करेगी।"

अवनी की हँसी थम गई। ज़ेहन में एक आँगन उभरा — बाराबंकी में नानी का घर, जहाँ बचपन की हर गर्मी बीतती थी।

"नानी का आँगन," वो बोली। "पहली बौछार के बाद की मिट्टी... मोगरे की बेल... शाम का पीतल का दिया... और —" वो रुकी, "काग़ज़ की नाव। नानी नाली में तैराती थीं।"

ज़ैद ने आँखें बंद करके सुना। "मोगरा, गीली मिट्टी, सरसों का तेल, पुराना काग़ज़... और थोड़ी शरारत।" आँखें खोलीं। "आज रात देग में यही उतरेगा। रुकेंगी?"

"रात भर?"

"इत्र जल्दबाज़ी से नहीं, सब्र से उतरता है।" उसने एक स्टूल उसकी ओर सरकाया। "चाय पिएँगी?"

रात गहराती गई। बारिश छप्पर पर थाप देती रही। ज़ैद आग सँभालता, नली का पानी बदलता, बीच-बीच में देग के मुँह पर कान लगाकर सुनता — जैसे उसकी नब्ज़ देख रहा हो।

"क्या सुन रहे हैं?" अवनी ने पूछा।

"उसकी साँस।" ज़ैद ने मुस्कुराकर देखा। "देग भी साँस लेती है। जब पंखुड़ी अपना राज़ खोलती है, देग की साँस मीठी हो जाती है।"

अवनी ने लिखना छोड़ दिया। कुछ चीज़ें नोटबुक में नहीं, आँखों में उतरती हैं — आग में तमतमाता चेहरा, भाप में भीगते बाल, ताँबे को सितार-सा छूते सधे हाथ।

आधी रात के बाद ज़ैद एक छोटी शीशी लेकर आया — काँच की, इतनी नन्ही कि मुट्ठी में छिप जाए।

"पहली धार," उसने कहा। "उँगली बढ़ाइए।"

अवनी ने कलाई बढ़ा दी। ज़ैद ने शीशी की डाट खोली — और भट्ठी की सारी गंध एक पल को ठहर गई।

उसने एक बूँद उँगली पर ली और उसकी नब्ज़ पर रखी — धीरे, गोल-गोल।

"इत्र कलाई पर नहीं," उसकी आवाज़ नर्म थी, "नब्ज़ पर लगाते हैं। जहाँ दिल की धड़कन ख़ुशबू को जगाए रखे।"

उँगली नब्ज़ पर थी। धड़कन तेज़ हो गई — या ज़ैद की उँगली की गर्मी थी। चेहरों के बीच बस भाप की एक पतली परत का फ़ासला था।

ज़ैद की नज़र उसकी आँखों में ठहरी। अवनी ने साँस रोकी।

तभी देग ने सीटी बजाई — लंबी, तीखी, जैसे बीच कहानी में ताली बज गई हो।



दोनों हँस पड़े, और वो पल — वो अधूरा, धड़कता पल — भाप में घुल गया।

"देग को जलन होती है," ज़ैद ने नज़रें चुराईं। "उससे ज़्यादा ध्यान किसी और को दो, तो शोर मचाती है।"

सुबह के चार बजे इत्र तैयार था। ज़ैद ने शीशी उसकी हथेली पर रखी। "पहली बारिश मुबारक, अवनी।"

वो मेहमानख़ाने में सो गई — कलाई नाक के पास, जैसे बच्चा खिलौना सीने से लगाकर सोता है।

सपना इतना साफ़ आया कि सुबह गाल पर बारिश की बूँदें महसूस हुईं।

पानी से भरी गली। घुटनों तक पानी। दस-ग्यारह का एक लड़का काग़ज़ की नावें तैरा रहा था, बग़ल में लाल छाता लिए एक लड़की खिलखिला रही थी। लड़के ने नज़र उठाई —

आँख खुल गई। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि नब्ज़ पर लगी ख़ुशबू भी काँप रही थी।

वो लड़का... वो चेहरा... ज़ैद था।

वो भट्ठी में दौड़ी। ज़ैद देग के पास ही सोया था — चटाई पर, हाथ तकिए के नीचे।

"ज़ैद!" उसने उसे झिंझोड़ा। "बीस साल पहले... इस गली में... बाढ़ आई थी?"

ज़ैद ने आँखें मलीं। "हर दस-पंद्रह साल में आती है। क्यों?"

"एक शादी थी। हम बाराबंकी से आए थे। गली में घुटनों तक पानी था — और एक लड़के ने..." अवनी की आवाज़ काँप रही थी, "मेरी काग़ज़ की नावें तैराई थीं। मेरे पास लाल छाता था।"

ज़ैद बैठ गया। उसकी नींद उड़ चुकी थी।

"लाल छाते वाली लड़की," वो बोला। "याद है उसने जाते-जाते क्या कहा था?"

"क्या?"

"'अगली बारिश में फिर आऊँगी।'" उसकी आँखों में बीस साल पुरानी शाम उतर आई। "मैं हर पहली बारिश उस गली में देखता रहा। तुम कभी नहीं आईं।"

आँसू और हँसी एक साथ आए। "मैं भूल गई थी, ज़ैद। बिल्कुल भूल गई थी।"

"तुम भूल गई थीं।" ज़ैद ने नन्ही शीशी की ओर देखा। "पर देग नहीं भूली।"

दोपहर को एडिटर का फ़ोन आया। "स्टोरी कब भेज रही हो?"

अवनी ने आँगन में ज़ैद को देखा — देग ठंडी कर रहा था, बच्चे काग़ज़ की नावें लिए इर्द-गिर्द घूम रहे थे।

"एक हफ़्ता और लगेगा," उसने कहा। "यहाँ की कहानी... मिटते हुनर की नहीं है।"

शाम को ज़ैद गली के मोड़ तक छोड़ने आया। बारिश रुक चुकी थी; हवा में मोगरे-गीली मिट्टी की ख़ुशबू थी — अब उसकी कलाई पर भी।

"ये रखो।" उसने उसके हाथ में एक और नन्ही शीशी रखी। "अगली बारिश को उतरेगा। तुम्हारे नाम का।"

"मेरे नाम की ख़ुशबू कैसी होगी?"

ज़ैद मुस्कुराया — जिसमें बीस साल का इंतज़ार और एक रात की भाप घुली थी। "जो तुम भूल जाओगी... वो सब।"

पीछे से बच्चों की आवाज़ आई — "देग गा रही है! बूढ़ी देग गा रही है!"



भी अपनी कहानी मिल गई।"

अवनी ने शीशी भींच ली। उस शाम हवा में एक नई ख़ुशबू थी — मोगरे की, बारिश की, और उस वादे की जो बीस साल देर से ही सही, पूरा होने आया था।

कहते हैं, कन्नौज की भट्ठी में अब भी पहली बारिश को देग गाती है। और कहते हैं, कुछ ख़ुशबुएँ नाक से नहीं — नसीब से सूँघी जाती हैं।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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