पहली बार इशानी ने वो घंटी सुनी, तो हवा बिल्कुल थमी हुई थी।
शाम के सात बजे थे — पहाड़ों पर धुंध उतर रही थी, और मैदान के उस पार अविर की कार्यशाला से काँसे की घंटियों की आवाज़ आ रही थी — साफ़, ठहरी हुई, जैसे कोई धीरे-धीरे उसका नाम ले रहा हो।
अट्ठाईस साल की इशानी मुंबई में वॉइस-ओवर आर्टिस्ट थी — विज्ञापनों की आवाज़, पॉडकास्ट की मेज़बान। तीन हफ़्ते पहले वो इस कुमाऊँनी गाँव में आई थी — पहाड़ों की आवाज़ें रिकॉर्ड करने, एक साउंड-सीरीज़ के लिए, और थोड़ी ख़ामोशी भी।
ख़ामोशी तो पहले ही दिन से मिल गई थी। पर ये घंटियाँ... ये हर शाम ठीक सात बजे बजतीं — हवा हो या न हो।

चौथी शाम वो रिकॉर्डर लेकर मैदान पार कर गई।
कार्यशाला लकड़ी की थी — बाहर तख़्ती: "अविर — काँसे का काम"। अंदर भट्टी की आँच, औज़ारों की खनक, और दीवारों पर टँगी दर्जनों घंटियाँ — छोटी, बड़ी, हर आकार की।
एक कोने में तैंतीस साल का अविर काँसे की एक घंटी को रेगमाल से रगड़ रहा था — बाँहें मज़बूत, आँखें काम में धँसी।
"अविर?"
उसने नज़र उठाई। "कहिए।"
"मैं इशानी — सामने वाले कॉटेज में ठहरी हूँ। आपकी घंटियाँ... हर शाम सात बजे, बिना हवा के — ये कैसे?"
अविर मुस्कुराया। "हवा होती है, आपको दिखती नहीं।"
"मैं साउंड रिकॉर्ड करती हूँ, अविर जी। हवा की आवाज़ मैं पहचानती हूँ। कल शाम पत्ता भी नहीं हिला था — और घंटियाँ बज रही थीं।"
वो हँसा — खुलकर, पहली बार। "तो आप वो हैं — रिकॉर्डर वाली पड़ोसन। गाँव में सब आपको 'मुंबई वाली' कहते हैं।"
"और आपको 'घंटी वाला'।" इशानी ने रिकॉर्डर उठाया। "एक इंटरव्यू? मेरी सीरीज़ के लिए — पहाड़ों की आवाज़ें।"
"आवाज़ें तो बहुत हैं — पर मेरी घंटियों की आवाज़ कैमरे में नहीं, कानों में उतरती है।" फिर उसने भट्टी की तरफ़ इशारा किया। "बैठिए, चाय बनती है।"
चाय के साथ उसने बताया — ये काम उसने अपने उस्ताद से सीखा था — काँसा पिघलाना, साँचे में ढालना, और फिर... सुनना।
"सुनना?"
"हर घंटी की अपनी आवाज़ होती है। मैं घंटी नहीं बनाता — मैं आवाज़ ढूँढता हूँ।" उसने एक छोटी घंटी उठाई, उँगली से छुई — "टन..." — आवाज़ देर तक हवा में तैरी।
इशानी ने रिकॉर्डर ऑन किया। घंटियों की झंकार, भट्टी की साँस, बाहर झींगुर — सब कैद हो गया।
तभी उसकी नज़र कोने में टँगी एक घंटी पर पड़ी — सबसे अलग, धूल में लिपटी, जैसे बरसों से किसी ने छुई न हो।
"वो वाली? वो बजी क्यों नहीं?"
अविर की हँसी थम गई। "वो... बजती नहीं।"
"मतलब?"
"छह साल पहले ढाली थी। तब से एक बार भी नहीं बजी — न हवा में, न हाथ से।" उसने चाय का कप नीचे रखा। "काँसा कभी झूठ नहीं बोलता, इशानी जी। वो किसी आवाज़ का इंतज़ार कर रही है।"
"किसकी आवाज़ का?"
"पता नहीं।" वो खिड़की से बाहर देखने लगा। "छह साल पहले, बारिश में, हल्द्वानी के बस स्टॉप पर मैंने एक आवाज़ सुनी थी — कोई लड़की गुनगुना रही थी। चेहरा नहीं देखा — बस आवाज़। वो धुन मेरे कानों में बस गई। मैंने उसी आवाज़ के लिए ये घंटी ढाली — पर वो आवाज़ फिर कभी नहीं मिली।"
इशानी की साँस थम गई। "हल्द्वानी? छह साल पहले?"
"आपको क्या हुआ?"
"कुछ नहीं — बस..." उसने बात बदल दी। "तो ये घंटी बिकाऊ नहीं है?"
"ये दुकान की नहीं है — ये इंतज़ार की है।"

उस रात इशानी को नींद नहीं आई — कानों में वही अनबजी घंटी गूँजती रही।
छह साल पहले... हल्द्वानी बस स्टॉप... बारिश... वो खुद कॉलेज जाती थी — बस का इंतज़ार करते हुए गुनगुनाना उसकी आदत थी। क्या...? नहीं, ये मुमकिन नहीं। हज़ारों लड़कियाँ गुनगुनाती हैं।
पर दिल कह रहा था — हज़ारों में से एक ही आवाज़ काँसे में बसती है।
अगले दिन वो फिर कार्यशाला पहुँची — इस बार रिकॉर्डर नहीं, बस एक सवाल लेकर।
"अगर वो आवाज़ मिल जाए, तो घंटी बजेगी?"
"काँसा पहचान लेगा।" अविर ने धूल में लिपटी घंटी को देखा। "पर छह साल हो गए, इशानी जी। अब तो मैंने उम्मीद छोड़ दी है।"
"एक बार कोशिश करने में क्या जाता है?" उसने धीरे से कहा। "मुझे गुनगुनाने दीजिए।"
अविर ने उसे देखा — देर तक। फिर घंटी उतारी, धूल झाड़ी, और उसके सामने रख दी।
इशानी ने आँखें बंद कीं — और वही धुन गुनगुनाई, जो वो कॉलेज के दिनों में बस स्टॉप पर गाती थी — बारिश की शामों वाली।
एक पल सन्नाटा। फिर — "टन..."
घंटी बजी। धीरे, गहरे, जैसे छह साल की नींद से जागी हो — और उसकी गूँज इशानी की आवाज़ से मिलकर एक हो गई।
अविर के हाथ काँप गए। "ये... ये वही आवाज़ है।"
"छह साल पहले हल्द्वानी के बस स्टॉप पर, बारिश में जो लड़की गुनगुना रही थी —" इशानी की आँखें भर आईं, "वो मैं थी, अविर।"
वो देर तक उसे देखता रहा — जैसे किसी सपने को छूने से डर रहा हो। फिर धीरे से बोला, "तो काँसा झूठ नहीं बोलता।"
उस शाम दोनों मैदान के बीचोंबीच बैठे रहे — घंटी उनके बीच, हर थोड़ी देर में हल्के से बजती हुई, बिना हवा के।
"तुमने चेहरा क्यों नहीं देखा था उस दिन?" इशानी ने पूछा।
"बारिश इतनी तेज़ थी — बस आई और तुम चढ़ गईं। मैं सिर्फ़ आवाज़ लेकर रह गया।" वो मुस्कुराया। "पर अब चेहरा भी मिल गया।"
धुंध गहरी हो चली थी। अविर ने घंटी उठाई — "ये तुम्हारी है, इशानी। छह साल से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।"
इशानी ने घंटी थामी — काँसा हल्का गरम था, जैसे इतने सालों की धूप उसमें समाई हो।
"अविर..." उसने उसका हाथ पकड़ लिया। धुंध में दोनों के चेहरे इतने पास आ गए कि साँसें मिल गईं।
जब उनके होठ मिले, तो लगा पहाड़ों ने भी एक पल को साँस रोक ली हो — और घंटी बिना हवा के एक बार फिर बजी, धीरे से, जैसे आशीर्वाद दे रही हो।

उसके बाद की रात सिर्फ़ पहाड़ जानते हैं — और वो घंटी, जो बिना हवा के बजती रही।
सुबह बरामदे की रेलिंग पर दो खाली कप थे — और घंटी हवा के बिना एक बार बजी, जैसे अलविदा नहीं, सुप्रभात कह रही हो।
इशानी ने मुंबई फ़ोन किया — सीरीज़ अधूरी है, उसे यहीं रहना होगा; पहाड़ों की आवाज़ों में वक़्त लगेगा। फिर मुस्कुराकर अविर को देखा।
तीन महीने बाद उसकी साउंड-सीरीज़ का आख़िरी एपिसोड आया — "बिना हवा की घंटी"। आख़िरी तीस सेकंड में सिर्फ़ एक आवाज़ थी — इशानी की गुनगुनाहट, और उसका जवाब देती घंटी।
अब वो घंटी उसके कॉटेज के बरामदे में टँगी है — हर शाम ठीक सात बजे, बिना हवा के, एक बार बजती है।
गाँव वाले कहते हैं — ये घंटी नहीं, किसी की आवाज़ का जवाब है।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
Comments
Post a Comment