मुंबई की बरसात किसी इश्क़ से कम नहीं होती। वो शाम भी ऐसी ही थी — आसमान काला, सड़कें शीशा, और हवा में मिट्टी की वो खुशबू जो दिल को बेचैन कर दे।
अट्ठाईस साल का आरव कैफे के कोने वाली टेबल पर बैठा था, कैमरा गोद में, और सामने ठंडी हो चुकी कॉफी। बाहर बारिश इतनी तेज़ थी कि ऑटो मिलना नामुमकिन था। तभी दरवाज़े की घंटी बजी और वो अंदर आई — भीगी हुई, बालों से पानी टपकता, चेहरे पर झुंझलाहट और होंठों पर हल्की मुस्कान।
"एक सीट मिलेगी? सारी टेबल भरी हैं," उसने कहा।
आरव ने सामने वाली कुर्सी की तरफ इशारा किया। "बिल्कुल। वैसे भी ये कॉफी अकेले पीने का मौसम नहीं है।"
वो हँस पड़ी। नाम मीरा था — छब्बीस साल की, पेशे से आर्किटेक्ट। बारिश में फँसी हुई, ठीक उसकी तरह।
बातें शुरू हुईं — पहले मौसम पर, फिर मुंबई पर, फिर उन सपनों पर जो दोनों ने इस शहर में देखे थे। आरव ने बताया कि वो शादियों की तस्वीरें लेता है। मीरा ने बताया कि वो इमारतें डिज़ाइन करती है — "ऐसी जगहें जहाँ लोग अपनी ज़िंदगी जिएँ।"
घंटा कब बीता, पता ही नहीं चला। बारिश धीमी हुई तो मीरा ने घड़ी देखी। "मुझे चलना चाहिए।"
आरव ने झिझकते हुए कहा, "एक तस्वीर? इस शाम की याद के लिए।"
मीरा खिड़की के पास खड़ी हो गई, पीछे बरसता शहर। क्लिक। तस्वीर में बारिश की बूँदें शीशे पर, और उसके चेहरे पर वो मुस्कान जो आरव भूल नहीं पाया।
"अगर ये तस्वीर अच्छी आई," मीरा ने जाते-जाते कहा, "तो दिखाने ज़रूर आना।"
उसने नैपकिन पर अपना नंबर लिखा और चली गई। आरव देर तक उस नैपकिन को देखता रहा, फिर कैमरे की स्क्रीन पर वो तस्वीर — और मुस्कुरा दिया।
कुछ मुलाकातें बारिश की तरह होती हैं — अचानक, और दिल को भिगो जाने वाली।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]


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