Skip to main content

Ad 468x60 Below Posts

Ad 320x50 Mobile Below Header

Ad Native Banner

Ad 728x90 Below Header

वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

बरसात की रात, अनजानी मुलाकात

मुंबई की बरसात किसी इश्क़ से कम नहीं होती। वो शाम भी ऐसी ही थी — आसमान काला, सड़कें शीशा, और हवा में मिट्टी की वो खुशबू जो दिल को बेचैन कर दे।

अट्ठाईस साल का आरव कैफे के कोने वाली टेबल पर बैठा था, कैमरा गोद में, और सामने ठंडी हो चुकी कॉफी। बाहर बारिश इतनी तेज़ थी कि ऑटो मिलना नामुमकिन था। तभी दरवाज़े की घंटी बजी और वो अंदर आई — भीगी हुई, बालों से पानी टपकता, चेहरे पर झुंझलाहट और होंठों पर हल्की मुस्कान।

"एक सीट मिलेगी? सारी टेबल भरी हैं," उसने कहा।

आरव ने सामने वाली कुर्सी की तरफ इशारा किया। "बिल्कुल। वैसे भी ये कॉफी अकेले पीने का मौसम नहीं है।"

वो हँस पड़ी। नाम मीरा था — छब्बीस साल की, पेशे से आर्किटेक्ट। बारिश में फँसी हुई, ठीक उसकी तरह।

बातें शुरू हुईं — पहले मौसम पर, फिर मुंबई पर, फिर उन सपनों पर जो दोनों ने इस शहर में देखे थे। आरव ने बताया कि वो शादियों की तस्वीरें लेता है। मीरा ने बताया कि वो इमारतें डिज़ाइन करती है — "ऐसी जगहें जहाँ लोग अपनी ज़िंदगी जिएँ।"

घंटा कब बीता, पता ही नहीं चला। बारिश धीमी हुई तो मीरा ने घड़ी देखी। "मुझे चलना चाहिए।"

आरव ने झिझकते हुए कहा, "एक तस्वीर? इस शाम की याद के लिए।"

मीरा खिड़की के पास खड़ी हो गई, पीछे बरसता शहर। क्लिक। तस्वीर में बारिश की बूँदें शीशे पर, और उसके चेहरे पर वो मुस्कान जो आरव भूल नहीं पाया।

"अगर ये तस्वीर अच्छी आई," मीरा ने जाते-जाते कहा, "तो दिखाने ज़रूर आना।"

उसने नैपकिन पर अपना नंबर लिखा और चली गई। आरव देर तक उस नैपकिन को देखता रहा, फिर कैमरे की स्क्रीन पर वो तस्वीर — और मुस्कुरा दिया।

कुछ मुलाकातें बारिश की तरह होती हैं — अचानक, और दिल को भिगो जाने वाली।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

Comments