जयपुर की उस शादी में डीजे की धुन पर सब नाच रहे थे, लेकिन उनतीस साल के कबीर की नज़रें भीड़ में किसी एक चेहरे को ढूँढ रही थीं। दस साल। पूरे दस साल हो गए थे कॉलेज छोड़े।
और तभी वो दिखी — गुलाबी लहंगे में, हाथ में मेहंदी, और वही हँसी जो कैंटीन की हर शाम को रोशन कर देती थी। सत्ताईस साल की अनन्या।
"कबीर?" उसकी आँखें फैल गईं। "तुम? यहाँ?"
"दूल्हा मेरा कज़िन है," कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा। "और तुम?"
"दुल्हन मेरी बेस्ट फ्रेंड। लगता है किस्मत को हमारी दोस्ती याद आ गई।"
वो दोनों बगीचे की तरफ निकल आए, जहाँ फेयरी लाइट्स टिमटिमा रही थीं। बातों का सिलसिला शुरू हुआ — कॉलेज के दिन, वो रातभर की पढ़ाई, वो चाय की टपरी, वो अधूरी बातें।
"तुम बदल गए हो," अनन्या ने कहा।
"तुम नहीं बदलीं," कबीर बोला, और दोनों हँस पड़े।
अनन्या अब डॉक्टर थी, कबीर मार्केटिंग में। ज़िंदगी दोनों को अलग-अलग शहरों में ले गई थी, लेकिन उस रात लगा जैसे वक़्त ठहर गया हो।
"याद है," अनन्या ने धीरे से कहा, "फेयरवेल वाले दिन तुम कुछ कहना चाहते थे?"
कबीर का दिल एक धड़कन चूक गया। दस साल पुराना वो लम्हा — जब हिम्मत नहीं हुई थी।
"आज कह दूँ?" उसने पूछा।
अनन्या ने नज़रें झुका लीं, चेहरे पर शर्मीली मुस्कान। "दस साल लेट हो, कबीर।"
"तो?" कबीर ने उसका हाथ थामा — हल्के से, इज़्ज़त से। "कुछ बातें देर से ही सही, कही ज़रूर जानी चाहिए। तुम वो हो जिसे मैं कॉलेज के आखिरी दिन से... आज तक नहीं भूल पाया।"
फेयरी लाइट्स की रोशनी में अनन्या की आँखें चमक उठीं। उसने हाथ नहीं छुड़ाया।
"तो फिर," उसने कहा, "इस बार नंबर एक्सचेंज करके जाना। दस साल और इंतज़ार नहीं करूँगी।"
दूर कहीं शहनाई बजी। और दो दिलों ने दस साल का फासला एक रात में तय कर लिया।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]


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