आधी रात को कोन ने उसके हाथ पर चेहरा बनाना शुरू किया — और माहिरा सो रही थी।
उसका दायाँ हाथ तकिए के पास हिल रहा था, उँगलियाँ मुड़ी हुईं — जैसे कोई अदृश्य कलम उन पर लकीरें खींच रहा हो। चाँदी की कोन मेज़ पर रखी थी, पर उसकी नोक गीली थी — ताज़ा मेहंदी की खुशबू कमरे में तैर रही थी।
माहिरा की आँख खुली। उसने अपना हाथ देखा — और साँस थम गई।
हथेली के बीचोंबीच, अधूरी-सी एक लकीर — किसी के जबड़े का घुमाव। चेहरा बन रहा था। उसके सोते हुए हाथ पर।

सत्ताईस साल की माहिरा जयपुर की मशहूर मेहंदी आर्टिस्ट थी — पर असली हुनर उसका नहीं, उसकी दादी नफ़ीसा की चाँदी की कोन का था, जो तीन पुश्तों से ख़ानदान में चली आ रही थी।
दादी कहती थीं — "ये कोन झूठ नहीं रचती, माहिरा। जिस दिन ये तेरी हथेली पर किसी का चेहरा बनाएगी, समझना — दिल ने उसे चुन लिया है।"
पर कोन ने कभी माहिरा के हाथ पर चेहरा नहीं बनाया था — जब भी वो ख़ुद पर आज़माती, सिर्फ़ बेल-बूटे बनते। ख़ूबसूरत, पर बेजान।
"शायद मेरा दिल अभी तक किसी को चुना ही नहीं," वो हँसकर कहती थी। उस रात उसकी हँसी ग़ायब थी।
वो एक बड़ी शादी के लिए शहर के बाहर एक हेरिटेज हवेली में आई थी — तीन दिन की शादी। दूल्हा दिल्ली का बिज़नेसमैन, छब्बीस साल की दुल्हन सना — और दूल्हे का छोटा भाई आदिल, इकतीस साल का आर्किटेक्ट, जो सारे इंतज़ाम देख रहा था।
पहली मुलाक़ात मेहंदी वाले दिन हुई थी।
माहिरा दुल्हन के हाथों पर मेहंदी बना रही थी — बारीक जाल, मोर, छिपे अक्षर। आदिल पास ही खड़ा था, हाथ में चाय का कुल्हड़।
"सुना है तुम्हारी कोन भविष्य बताती है," उसने कहा, मुस्कुराते हुए।
"कोन भविष्य नहीं बताती," माहिरा ने नज़रें उठाए बिना कहा। "वो सिर्फ़ सच बताती है।"
"मेरे हाथ पर भी सच बता दो फिर।" उसने अपना दायाँ हाथ बढ़ा दिया।
माहिरा ने कोन उठाई। आदिल की हथेली चौड़ी थी, उँगलियों पर पेंसिल के निशान — आर्किटेक्ट के हाथ। कोन ने लकीरें खींचीं — बेल, पत्ती, एक छोटा-सा मोर। ख़ूबसूरत। पर चेहरा — नहीं।
"देखा?" आदिल ने हाथ दिखाया। "तुम्हारी कोन को मैं पसंद नहीं।"
"कोन को पसंद-नापसंद नहीं होती," माहिरा ने कहा — पर उस पल कोन उसकी उँगलियों में हल्की-सी गर्म हुई थी। पहली बार।
उस रात हथेली की वो अधूरी लकीर सूखकर हल्की भूरी हो चुकी थी। उसने रगड़कर मिटाने की कोशिश की — लकीर फीकी पड़ी, पर मिटी नहीं।
"वहम है," उसने ख़ुद से कहा। "नींद में ख़ुद ही बना लिया होगा।"
दूसरे दिन संगीत था — आँगन गेंदे के फूलों और टिमटिमाती बत्तियों से सजा था, ढोल की थाप पर सहेलियाँ नाच रही थीं। माहिरा एक कोने में मेहमानों के हाथों पर बूटियाँ बना रही थी।

आदिल आया — कुर्ते की आस्तीन चढ़ी हुई, माथे पर पसीना।
"चाय?" उसने एक कुल्हड़ बढ़ाया।
"तुम्हें तो इंतज़ाम देखने हैं," माहिरा ने कहा।
"इंतज़ाम हो गए।" वो उसकी हथेली की ओर देखने लगा — "कल वाली लकीर — मिटी नहीं?"
माहिरा का दिल धड़क उठा। "तुमने देखी थी?"
"झलक।" उसने उसका हाथ थाम लिया — धीरे, जैसे कोई नाज़ुक चीज़ हो। "यहाँ — जबड़े की लकीर। अजीब है न?"
उसकी छुअन से माहिरा की साँस अटक गई। उसने हाथ खींच लिया। "मेहंदी है। कुछ भी दिख सकता है।"
"या कुछ भी बन सकता है।" उसकी आँखों में शरारत थी — और उसके नीचे कुछ ठहरा हुआ।
उस रात माहिरा ने कोन को तकिए के नीचे नहीं — मेज़ की दराज़ में बंद करके सोने की कोशिश की।
तीन बजे आँख खुली — दराज़ खुली थी, कोन मेज़ पर थी, नोक गीली। और हथेली पर चेहरा आगे बढ़ चुका था — अब एक आँख थी, और होंठों की हल्की मुस्कान वाली लकीर।
उसके हाथ काँपने लगे — उसने अम्मी को फ़ोन लगाया।
"अम्मी... दादी की कोन... वो मेरे हाथ पर चेहरा बना रही है। सोते में।"
दूसरी तरफ़ ख़ामोशी। फिर अम्मी की धीमी आवाज़ — "तो वक़्त आ गया।"
"कैसा वक़्त?"
"तेरी दादी ने एक डायरी छोड़ी थी। उसमें लिखा है — 'कोन चेहरा नहीं बनाती, बेटा। वो सिर्फ़ वो दिखाती है जो दिल पहले ही चुन चुका है। मेरे हाथ पर भी चेहरा बना था — तेरे दादा का। मैंने दस दिन तक उसे रगड़-रगड़कर मिटाया। ग्यारहवें दिन मैंने मिटाना छोड़ दिया।'"
उसकी आँखों में आँसू आ गए — डर के, या किसी और चीज़ के।
"अम्मी... अगर दिल ने ग़लत चुना हो तो?"
"दिल ग़लत नहीं चुनता। डर ग़लत चुनता है।"
तीसरे दिन — शादी की पूर्वसंध्या — हथेली पर चेहरा पूरा हो चुका था।
एक आँख। एक मुस्कान। एक जबड़ा — वो चेहरा जिसे वो तीन दिन से देख रही थी।
आदिल।
उसने रगड़ना छोड़ दिया। कोन मेज़ पर शांत पड़ी थी — जैसे काम पूरा करके सो गई हो।
रात को माहिरा पिछले आँगन में निकली — गेंदे की महक, दूर ढोल की थाप, टिमटिमाती बत्तियाँ। आदिल वहीं था — शेरवानी में, अकेला, आसमान देखता हुआ।
"नींद नहीं आ रही?" उसने पूछा।
"आ रही थी," वो उसके पास जाकर खड़ी हो गई। "पर किसी ने मेरे हाथ पर चेहरा बना दिया।"
आदिल ने उसकी ओर देखा। फिर उसकी हथेली अपने हाथ में ली — इस बार उसने हाथ नहीं खींचा।

बत्तियों की रोशनी में चेहरा साफ़ दिखा — पूरा, मुकम्मल। उसकी उँगली लकीरों पर फिरी — आँख, मुस्कान, जबड़ा।
"ये मैं हूँ," उसने धीरे से कहा।
"ये तुम हो," माहिरा ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तीन रातों से कोन यही बना रही है। मैं मिटाती रही — वो बनाती रही।"
"तो अब?"
"अब मैंने मिटाना छोड़ दिया।"
आदिल ने उसका हाथ अपने होंठों तक उठाया — और उस चेहरे वाली हथेली को चूमा। धीरे, जैसे कोई वादा कर रहा हो।
फिर उसके होंठ उसके होंठों से मिले — गेंदे की महक में, बत्तियों के नीचे, दूर बजते ढोल की थाप पर।
उसके बाद की रात — सिर्फ़ वो आँगन जानता है, जहाँ बत्तियाँ आधी रात के बाद बुझ गई थीं।
सुबह हल्दी की धूम में माहिरा जागी — होंठों पर हल्की मुस्कान, हथेली पर मेहंदी का रंग इतना गाढ़ा कि पंद्रह साल के करियर में कभी नहीं देखा था। कहावत थी — रंग जितना गाढ़ा, प्यार उतना पक्का।
उस दिन उसने सना के हाथों पर आख़िरी मेहंदी लगाई — कोन लकीरों में फूल ही फूल बरसा रही थी। शादी धूमधाम से हुई; विदाई पर सना रोई, माहिरा की आँखें भी नम हुईं — पर हथेली पर वो चेहरा मुस्कुरा रहा था।
एक साल बाद — उसी हवेली में, उसी आँगन में, गेंदे के फूलों के बीच।
इस बार मेहंदी माहिरा के हाथों पर लग रही थी। दुल्हन — वो ख़ुद थी।
चाँदी की कोन उसके हाथ पर चली — और इस बार सिर्फ़ एक चेहरा नहीं, दो चेहरे बने — एक-दूसरे में घुले हुए।
आदिल ने उसकी हथेली अपने हाथ में ली — ठीक वैसे ही, जैसे उस रात ली थी।
"अब कोन क्या कहती है?" उसने पूछा।
माहिरा मुस्कुराई — वही मुस्कान, जो कोन ने उसकी हथेली पर बनाई थी।
"अब कोन कुछ नहीं कहती," उसने कहा। "अब तो बस दिल बोलता है — और कोन सुनती है।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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