तीसरी सुबह सफ़ेद घोड़ा दो खाने आगे बढ़ चुका था।
हम्ज़ा ने उसे हिलते हुए नहीं देखा था — पर अब वो देखना चाहता था।
भोपाल के चौक की डेढ़ सौ साल पुरानी हवेली उसकी ज़िम्मेदारी थी — बत्तीस साल का हम्ज़ा, हेरिटेज रेस्टोरेशन आर्किटेक्ट, दो महीनों से उसकी दीवारों और धूल खाए आँगन को नई ज़िंदगी दे रहा था।
आँगन के बीचोंबीच, शहतूत के नीचे, सफ़ेद मार्बल की शतरंज-मेज़ थी — हाथीदाँत के मोहरे, और उन पर एक अधूरी बाज़ी बिछी थी, जैसे कोई उठकर गया हो और लौटना भूल गया हो।

पहली सुबह हम्ज़ा ने सोचा — मज़दूरों में से किसी ने छेड़ा होगा।
दूसरी सुबह उसने मेज़ की तस्वीर खींच ली — रात को सोने से पहले। सुबह तस्वीर से मिलाया। सफ़ेद ऊँट दो खाने दाएँ खिसक चुका था।
तीसरी सुबह — घोड़ा।
"रहमत मियाँ," हम्ज़ा ने चौकीदार से पूछा — अड़सठ साल का बूढ़ा, जो हवेली की एक कोठरी में ही रहता था — "रात को आँगन में कौन आता है?"
रहमत मियाँ ने मेज़ को देखा, फिर हम्ज़ा को — और धीरे से मुस्कुराया। "मेज़ पुरानी है, साहब। नवाबों के ज़माने की। कहते हैं — जो इस मेज़ पर बाज़ी पूरी करे, उसे ज़िंदगी की वो एक चाल मिल जाती है जो वो कभी चल नहीं पाया।"
"और मोहरे कौन हिलाता है?"
"मेज़ उसी के साथ खेलती है," रहमत मियाँ बोला, "जिसे खेलना आता हो... और जिसे खेलने की ज़रूरत हो।"
उस रात हम्ज़ा ने काले मोहरों की तरफ़ से पहली चाल चली।
ये उसका बचपन का खेल था — अब्बा के साथ, छत पर, लालटेन की रोशनी में। अब्बा कहते थे — "शतरंज में जल्दबाज़ी करने वाला, ज़िंदगी में भी जल्दबाज़ी करता है।"
अगली सुबह — सफ़ेद प्यादा आगे।
बाज़ी शुरू हो चुकी थी।
दिन में वो दीवारों की दरारें नापता — शाम ढलते ही मेज़ के सामने। हर रात एक चाल, हर सुबह एक जवाब। सफ़ेद मोहरे उस्तादों जैसे खेलते थे। सातवीं रात उसने डायरी में लिखा — "सफ़ेद वाला मुझसे बेहतर खेलता है।"
दसवीं सुबह सफ़ेद वज़ीर ग़ायब था। घबराकर उसने आँगन छान मारा — वज़ीर शहतूत की जड़ के पास घास पर रखा था, जैसे कोई सोच में डूबा उसे वहाँ रख गया हो।
उस शाम उसने वज़ीर लौटाया और काले घोड़े से हिम्मती चाल चली। अगली सुबह सफ़ेद हाथी ने घोड़ा काट दिया — और मिट्टी पर उँगली से खिंची एक टेढ़ी लकीर थी, जैसे कोई मुस्कुराकर कह रहा हो, "पकड़े गए।"
हम्ज़ा अकेले आँगन में ज़ोर से हँस पड़ा।
"तुम हँसते हुए अच्छे लगते हो।"
वो चौंका — दरवाज़े पर करीब उन्तीस साल की एक लड़की थी, हल्के नीले सूट में, हाथ में शतरंज की किताब।
"मैं शायरा हूँ — और तुम वो हो जो मेरे काले मोहरे चला रहा है।"
"तुम्हारे? सफ़ेद तो तुम—"
"मैं सफ़ेद चलाती हूँ," शायरा आँगन में आई। "एक साल से। हर भोर, काम पर जाने से पहले।"
"और काले?"
शायरा ने मेज़ को देखा। "काले... मेज़ खुद चलाती थी। जब तक तुम नहीं आए।"
रहमत मियाँ की लाइन हम्ज़ा के कानों में गूँजी — मेज़ उसी के साथ खेलती है जिसे खेलने की ज़रूरत हो।
"तुम शतरंज की कोच हो?" उसने किताब देखकर पूछा।
"भोपाल चेस अकादमी में। बच्चों को सिखाती हूँ।" शायरा मेज़ के सामने बैठ गई। "उन्नीस सौ बासठ में इसी मेज़ पर नवाब साहब के एक मेहमान की बाज़ी अधूरी रह गई थी — आख़िरी चाल से पहले उन्हें दिल्ली से तार आया। अब्बा कहते थे, इस मेज़ की अधूरी बाज़ी किसी न किसी को पूरी करनी होती है। वो पिछले साल गुज़रे — ये उनकी आख़िरी ख़्वाहिश थी।"
"तो तुम एक साल से..."
"मैं सफ़ेद चलाती हूँ। मेज़ काले चलाती थी।" शायरा ने उसकी आँखों में देखा। "पर मेज़ को कोई अपना चाहिए था।"
"तो अब काले मेरे," हम्ज़ा ने काली रानी को छुआ।
"शर्त एक — बाज़ी शुरू से," शायरा मुस्कुराई। "नई बाज़ी — हम दोनों की।"
उस भोर उन्होंने मोहरे समेटे — और नई बाज़ी बिछाई।
फिर जो दिन आए — वो हम्ज़ा की ज़िंदगी के सबसे हसीन दिन थे।
हर भोर, पाँच बजे, आँगन में। शहतूत के नीचे। चाय का कुल्हड़ — रहमत मियाँ चुपचाप रख जाता। और चौंसठ खानों पर दो दिमाग़ों की जंग।
हम्ज़ा ने सीखा — शायरा कुर्बानी से पहले अपनी बाली छूती है। जीतती हुई चाल से पहले हल्के से गुनगुनाती है। और हारती हुई बाज़ी में भी उसकी आँखों में वही चमक रहती है।
शायरा ने सीखा — हम्ज़ा सोचता बहुत है, चलता कम है। पर जब चलता है — तो दिल से।
एक भोर, दोनों ने एक साथ सफ़ेद वज़ीर की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
उँगलियाँ छू गईं।
कोई पीछे नहीं हटा।
शायरा ने धीरे से कहा — "तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।"
"तुम्हारे भी," हम्ज़ा बोला।
वज़ीर वहीं रहा — अनछुआ। उस भोर कोई चाल नहीं चली।

बाज़ी आगे बढ़ी — साँसों की तरह, धड़कनों की तरह। हम्ज़ा जीतने लगा था। आख़िरी हफ़्ते में उसके मोहरे शायरा के बादशाह को घेर चुके थे। बस दो चाल — और शह-मात।
"कल आख़िरी दिन," शायरा ने कहा। "फिर बाज़ी पूरी।"
उस रात हम्ज़ा सो नहीं पाया — बाज़ी पूरी होगी तो क्या ये भोरें भी पूरी हो जाएँगी? आधी रात को वो छत पर गया; नीचे झील चाँदनी में चमक रही थी। उसने आसमान से कहा — "एक भोर और दे दो। बस एक।" आसमान ने जवाब नहीं दिया।
अगली भोर — आख़िरी बाज़ी।
शायरा आई — आज उसने गहरे हरे रंग का सूट पहना था। आँखों में नींद नहीं थी — जैसे वो भी रात भर जागी हो।
चालें चलीं। तेज़, साफ़, बेरहम। हम्ज़ा का हमला — शायरा का बचाव। और फिर वो लम्हा आया —
शायरा की रानी, हम्ज़ा के बादशाह से एक चाल दूर। शह-मात तय था।
शायरा ने रानी उठाई।
हम्ज़ा ने साँस रोक ली।
और शायरा ने रानी को बादशाह के बग़ल वाले खाने में रख दिया — शह नहीं, मात नहीं — बराबरी की पेशकश।
"ये क्या किया?" हम्ज़ा फुसफुसाया।
"रानी की चाल," शायरा बोली — और उसकी आँखें चमक रही थीं। "जीतने से ज़्यादा ज़रूरी — साथ रहना है।"
तभी — खट।
मेज़ के पहलू में एक दराज़ खुल गई। अपने आप।
दोनों की साँस थम गई।
दराज़ में — दो सोने के छल्ले। और एक पीला पर्चा — उन्नीस सौ बासठ की स्याही में :
"बाज़ी वो जीता जिसने जीतना छोड़ दिया।"
नीचे — दो नाम, और एक तारीख़।

रहमत मियाँ दूर खड़ा देख रहा था — आँखों में आँसू। "नवाब साहब के वो मेहमान... मेरे अब्बा थे," उसने धीरे से कहा। "बासठ साल से इस दराज़ के खुलने का इंतज़ार कर रहा था।"
उस भोर, शहतूत के नीचे, हम्ज़ा ने शायरा का हाथ थामा — और छोड़ा नहीं।
उसके बाद की रात — सिर्फ़ भोपाल की झील की लहरें जानती हैं।
सुबह, रहमत मियाँ ने आँगन में दो कुल्हड़ रखे — और मुस्कुराते हुए चला गया।
एक साल बाद — उसी मेज़ पर, उसी भोर।
हम्ज़ा और शायरा की अपनी बाज़ी चल रही है। और हर बाज़ी के आख़िर में — शायरा की रानी, हम्ज़ा के बादशाह के बग़ल वाले खाने में आकर ठहर जाती है।
दराज़ में अब तीन चीज़ें हैं — दो छल्ले, एक पर्चा... और उनकी शादी की तस्वीर।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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