उस रात चाँद दो थे — और मेहर ने दोनों को अपनी आँखों से गिना था।
वो चंद्रशिला पहाड़ी की सबसे ऊँची चट्टान पर खड़ी थी, कंधे पर कैमरे का बैग और गोद में वो मोटा रजिस्टर, जिस पर धूल की दो पीढ़ियाँ जमी थीं। नीचे घाटी में दीयों की रोशनियाँ बुझ चुकी थीं; ऊपर, आसमान के बीचोंबीच, एक चाँद पुराना था — सफ़ेद, परिचित, थोड़ा बूढ़ा। और उससे ठीक दो उँगली की दूरी पर दूसरा — हल्का नीलाभ, नया, जैसे किसी ने आसमान में अभी-अभी एक और चाँद टाँग दिया हो।
सत्ताईस साल की मेहर अभिलेखागार की नौकरी करती थी — पुराने काग़ज़, पुरानी इमारतें, पुरानी भूलें। शहर के संग्रहालय ने उसे ये काम सौंपा था: चंद्रशिला की वेधशाला का दस्तावेज़ीकरण, एक रिपोर्ट, कुछ तस्वीरें, और वापसी। वेधशाला पिछले तैंतीस सालों से बंद थी। उसके आख़िरी रखवाले की डायरी में एक पंक्ति थी, जिसे पढ़कर मेहर हँसी थी — और फिर तीन बार पढ़ी थी।
"दो चाँद की रात — दूरबीन उस चाँद की ओर करना, जो छोटा है। जो दिखे, उसे काग़ज़ पर मत उतारना। कुछ चीज़ें सिर्फ़ देखने के लिए होती हैं।"
डायरी के अनुसार वो रात आज थी।
"तुम्हें भी उसी पंक्ति ने यहाँ खींचा?"
आवाज़ गुंबद के अंदर से आई। मेहर की उँगलियाँ रजिस्टर पर कस गईं।
लालटेन की रोशनी में एक आदमी बाहर निकला — अट्ठाईस के आसपास, कंधों पर धूल, हाथों में पीतल की दूरबीन का एक टूटा हुआ पुर्ज़ा। उसकी आँखें पहले दूरबीन पर थीं, फिर मेहर पर। और मेहर को लगा, जैसे उसके सीने में कोई पुराना स्विच ऑन हो गया हो — ऐसा धड़कना, जो अजनबियों के लिए नहीं होता।
"मैं देव," उसने कहा। "इस वेधशाला के आख़िरी रखवाले का पोता। दादाजी की डायरी... मेरी जेब में है।" उसने जेब से वही डायरी निकाली — वही पंक्ति, वही स्याही। "तुम?"
"मेहर। संग्रहालय से।" उसने रजिस्टर उठाया, जैसे ये कोई ढाल हो। "मैं सिर्फ़ तस्वीरें लेने आई हूँ।"
"सिर्फ़," देव मुस्कराया, और उस मुस्कराहट में कुछ ऐसा था जो लालटेन की लौ से भी गर्म था। "इस पहाड़ी पर 'सिर्फ़' कुछ नहीं होता, मेहर।"

उन्होंने मिलकर गुंबद का शटर खोला। तैंतीस साल की जंग ने लोहे को ज़िद्दी बना दिया था; देव का कंधा मेहर के कंधे से टकराया, और दोनों ने एक ही पल में साँस रोकी — जैसे हवा में कुछ छू गया हो। दूरबीन, पुरानी पीतल की, अभी भी मज़बूत थी। देव ने उसे ठीक किया, पुर्ज़ा लगाया, और उसे छोटे चाँद की ओर घुमाया।
"देखो," उसने फुसफुसाया।
मेहर ने आँख लगाई।
और साँस भूल गई।
दूरबीन में चाँद नहीं था। दूरबीन में — एक और रात थी। वही पहाड़ी, वही वेधशाला — पर सब कुछ थोड़ा अलग। वहाँ घाटी में रोशनियाँ थीं, जो इस दुनिया में बुझ चुकी थीं। और वेधशाला की सीढ़ियों पर... एक आदमी खड़ा था। जवान। उसके हाथ में भी एक दूरबीन थी — और वो दूरबीन इसी तरफ़ तनी थी।
मेहर ने पलक झपकाई। दूसरी तरफ़ वाला आदमी भी पलक झपका।
"वो... वो मुझे देख रहा है," मेहर की आवाज़ काँप गई।
देव ने दूरबीन में झाँका। उसकी साँस रुक गई। "ये मैं हूँ," उसने कहा, धीरे से। "पर... बड़ा। जैसे मैं दस साल बाद हूँ। और वो..."
"वो तुम्हें देख रहा है," मेहर ने कहा। "वो हम दोनों को देख रहा है।"
डायरी का अगला पन्ना देव ने लालटेन की रोशनी में पढ़ा, और उसकी आवाज़ धीमी होती गई: "दो चाँद दो संसार हैं, जो साल में एक रात एक-दूसरे के सामने आते हैं। जो इस रात एक-दूसरे को देख लें — वो या तो अगले साल तक एक-दूसरे को भूल जाएँगे... या हमेशा के लिए मिल जाएँगे। बीच का कोई रास्ता नहीं।"

मेहर ने दूरबीन से आँख हटाई। उसके गाल गीले थे; उसे पता भी नहीं चला था कब। "ये... ये सच नहीं हो सकता।"
"सच," देव ने कहा, और वो उसके इतना क़रीब आ गया था कि लालटेन की लौ दोनों के चेहरों पर एक ही रोशनी डाल रही थी, "इस पहाड़ी पर हमेशा थोड़ा टेढ़ा रहा है।"
उस पल में, दो चाँदों की रोशनी में, मेहर ने देव की आँखों में वो देखा जो उसने दूरबीन में देखा था — वही इंतज़ार, वही पहचान। देव का हाथ उसके गाल तक आया, रुका, और फिर — बहुत धीरे से — उसकी उँगलियों ने उसके चेहरे की रेखा छुई। मेहर की साँसें तेज़ हो गईं; उसके दिल की धड़कन इतनी ज़ोर से बज रही थी कि उसे लगा देव भी सुन रहा होगा।
देव झुका। उनके चेहरे इतने क़रीब आ गए कि साँसें मिल गईं — गर्म, काँपती हुई। मेहर ने आँखें बंद कर लीं। एक पल — बस एक पल — जहाँ दुनिया के दोनों चाँद, दोनों संसार, दोनों इंतज़ार एक ही साँस में सिमट आए।
और फिर देव रुक गया।
"अगर डायरी सच है," उसने फुसफुसाया, उसके होंठ उसके होंठों से बस एक साँस की दूरी पर, "तो ये रात हमें एक चुनाव दे रही है। भूल जाना... या हमेशा के लिए मिल जाना।"
मेहर ने आँखें खोलीं। "तुम क्या चाहते हो?"
"मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहता," देव ने कहा। "चाहे दूसरी तरफ़ का मैं जो भी हो।"
मेहर ने उसका हाथ पकड़ा — मज़बूती से, जैसे कोई रस्सी पकड़ता है। "तो फिर हम चुनाव नहीं करेंगे। हम इस रात को ही बदल देंगे।"
उन्होंने दूरबीन को — उस पुरानी पीतल की दूरबीन को — दोनों ने मिलकर छोटे चाँद से हटा दिया। देव ने उसे बड़े चाँद की ओर घुमाया — उस परिचित, बूढ़े, अपने चाँद की ओर। "दूसरी तरफ़ का मैं इंतज़ार कर रहा है," देव ने कहा। "पर इस तरफ़ का मैं — अब और इंतज़ार नहीं करेगा।"
भोर होने से पहले, दूसरा चाँद धीरे-धीरे फीका पड़ने लगा — जैसे कोई दीया बुझ रहा हो। मेहर ने आख़िरी बार दूरबीन में झाँका। दूसरी तरफ़ वाली रात में, वो दूसरा देव अब मुस्करा रहा था। उसने हाथ उठाया — विदा में, या आशीर्वाद में — और फिर वो रात धुँधली हो गई।

सुबह जब सूरज निकला, तो आसमान में एक ही चाँद था — बूढ़ा, सफ़ेद, परिचित। वेधशाला का गुंबद फिर से बंद था। डायरी का वो पन्ना — "भूल जाएँगे या मिल जाएँगे" वाला — देव की जेब में था, और मेहर के रजिस्टर में उस रात की कोई तस्वीर नहीं थी। उसने एक भी तस्वीर नहीं ली थी।
"रिपोर्ट में क्या लिखोगी?" देव ने पूछा। वो दोनों सीढ़ियों पर बैठे थे; उसका हाथ अभी भी उसके हाथ में था।
मेहर मुस्कराई। "लिखूँगी कि वेधशाला बंद है, दूरबीन टूटी है, और कुछ नहीं मिला।" उसने उसकी ओर देखा। "पर हर पूर्णिमा को मैं यहाँ आऊँगी — ये देखने कि चाँद कितने हैं।"
"और अगर दो हुए?"
"तो इस बार," मेहर ने कहा, उसके चेहरे पर वो शरारत जो सिर्फ़ प्रेम में होती है, "दूरबीन की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"
देव हँसा — वो हँसी जो पहाड़ी की हवा में घुल गई। और जब वो दोनों नीचे उतरे, तो घाटी के लोगों ने देखा: एक लड़का और एक लड़की, हाथ में हाथ, और उनके चेहरों पर ऐसी रोशनी, जैसे उन्होंने रात भर दो चाँद देखे हों।
कुछ रातें साल में सिर्फ़ एक बार आती हैं — दो चाँद लेकर — ताकि दो अजनबी हमेशा के लिए अजनबी न रहें।
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