पूर्णिमा की रात थी। माँ ने थाली रखते हुए कहा था, "आज रात पुराने मैदान की तरफ़ मत जाना।"
रुद्र ने हँसकर टाल दिया था — पंद्रह साल बाद घर लौटे लड़के को माँ की कौन-सी बात याद रहती है? मुंबई की भागदौड़ से थका वो तीन दिन की छुट्टी पर आया था।
खाने के बाद उसने पूछा, "माँ, वो मैदान वाली बात... क्यों?"
माँ ने आसमान की तरफ़ देखा। "आज पूर्णिमा है। आज रात वहाँ चाँदनी बाज़ार लगता है।"
"चाँदनी बाज़ार?"
"पुराने मैदान में। कहते हैं — वहाँ खोई हुई चीज़ें मिलती हैं।" माँ ने गठरी उठाई। "पर मुफ़्त में कुछ नहीं मिलता, बेटा। दाम चुकाना पड़ता है।"
रात के बारह बजे उसकी आँख खुली — शायद चाँद की रोशनी से, शायद किसी अनजान खिंचाव से। गले में कैमरा लटकाया — "फ़ोटोग्राफ़र की आदत," उसने ख़ुद से कहा, "ख़ाली हाथ कहीं नहीं जाता।"

मैदान के किनारे पहुँचते ही उसकी साँस अटक गई। जहाँ शाम को सिर्फ़ सूखी घास और टूटी बेंचें थीं, वहाँ अब बाज़ार था — गहरे नीले, मैरून तंबूओं की क़तारें, हर तंबू के बाहर झिलमिलाती काग़ज़ की लालटेनें, हवा में धुंध और चमेली की ख़ुशबू। चाँद इतना पास लग रहा था जैसे हाथ बढ़ाकर छू ले।
और लोग थे — दर्जनों। सब धीरे-धीरे चल रहे थे, जैसे समय यहाँ थोड़ा ठहरा हुआ हो।
रुद्र ने कैमरा उठाया। क्लिक। स्क्रीन पर सिर्फ़ ख़ाली मैदान था — चाँदनी में डूबा, पर ख़ाली। कोई बाज़ार नहीं।
उसने फिर देखा — बाज़ार वहीं था। उँगलियाँ काँपने लगीं। "ये... ये क्या है?"
"पहली बार आए हो?" आवाज़ उसके ठीक पीछे से आई।
वो पलटा। गहरे हरे सलवार-सूट में एक लड़की खड़ी थी — छब्बीस की, आँखों में वही चाँदनी जो आसमान में थी।
"तुम्हें दिख रहा है?" रुद्र ने पूछा।
"तभी तो आई हूँ," वो मुस्कुराई। "मैं मायरा। और तुम?"
"रुद्र।" उसने कैमरा नीचे किया। "ये कैमरे में क्यों नहीं आ रहा?"
"क्योंकि ये बाज़ार चीज़ों का नहीं, यादों का है," मायरा ने कहा। "और यादें कैमरे में नहीं उतरतीं। तुम कुछ ढूँढ़ने आए हो?"
"नहीं... बस ऐसे ही। तुम?"
उसकी आँखों में चाँदनी धुंधली पड़ी। "मैं अपनी दादी की हरी काँच की चूड़ी ढूँढ़ रही हूँ। बीस साल से।"
वो दोनों साथ चलने लगे। तंबुओं में अजीब चीज़ें थीं — बिना डोरी के तैरता लाल गुब्बारा, एक टूटी घड़ी जिसकी सुइयाँ हमेशा रात के बारह पर ठहरी थीं, नीले रिबन से बँधी चिट्ठियों का गट्ठर, एक पुराना पीतल का कुतुबनुमा...
कुतुबनुमा देखकर रुद्र ठिठक गया। बिल्कुल वैसा ही — जैसा उसकी दादी ने उसे दिया था, जो वो मुंबई की ट्रेन में खो बैठा था।
दुकानदार बूढ़ी थी — आँखों पर सफ़ेद पट्टी, पर चेहरा ऐसा जैसे सब देख रही हो। "पहचान लिया, बेटा? ये तुम्हारा ही है।"
"क़ीमत क्या है?"
बूढ़ी हँसी — सूखे पत्तों जैसी आवाज़। "यहाँ सब बिकता है, बेटा — पर पैसे से नहीं। दाम एक याद है। जो याद तुम दोगे, वो हमेशा के लिए तुम्हारी नहीं रहेगी।"
रुद्र ने सिर हिलाया — "अभी नहीं।"
मायरा उसे आख़िरी तंबू तक ले गई — सबसे छोटा, सबसे धुंधला। मख़मल के डिब्बे में एक हरी काँच की चूड़ी रखी थी — चाँदनी में ऐसे चमकती जैसे उसमें कोई छोटा-सा समंदर क़ैद हो।
मायरा की साँस रुक गई। "यही है... दादी की चूड़ी।" उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। "दादी ने दी थी — 'बड़ी होकर पहनना।' उसी रात हाथ से निकल गई। बीस साल मैंने पूरा घर छान मारा।"
बूढ़ी ने मायरा का हाथ थामा, फिर रुद्र की तरफ़ "देखा"। "इस चूड़ी के मालिक दो हैं, बिटिया।"
"दो?" दोनों एक साथ बोले।
बूढ़ी ने रुद्र की हथेली थाम ली। "तुमने इसे देखा है, बेटा। बहुत पहले। बारिश की एक शाम... एक छोटी-सी लड़की के हाथ से फिसलकर ये घास पर गिरी थी। तुमने उठाया — जेब में रख लिया। 'ख़ज़ाना', तुमने कहा था।"
रुद्र के सीने में जैसे कोई दरवाज़ा खुला। मानसून की शाम — वो आठ साल का, नानी के घर आया हुआ। दो चोटियों वाली लड़की, बारिश, घास पर गिरी हरी चूड़ी। "कल लौटा दूँगा — पक्का वादा।" पर सुबह वो लोग मुंबई लौट गए — चूड़ी "ख़ज़ाना" बनकर जेब में रह गई, और सालों बाद ट्रेन में खो गई।
"तुम..." रुद्र ने मायरा को देखा। "वो लड़की... तुम थीं?"
उसकी आँखों में आँसू थे, होंठों पर हँसी। "तुमने वादा तोड़ दिया, रुद्र।"
"मुझे माफ़ कर दो," उसकी आवाज़ टूट रही थी। "मैं भूल गया था।"
"मैं नहीं भूली। बीस साल से हर पूर्णिमा को मैं यहाँ आती हूँ। इसी चूड़ी के लिए।"
बूढ़ी ने डिब्बा आगे बढ़ाया। "दाम एक याद है। चूड़ी उसी को मिलेगी जो दाम दे।"
मायरा आगे बढ़ी — पर बूढ़ी ने रोक दिया। "तुम्हारी यादों में ये चूड़ी बस एक चूड़ी है, बिटिया। दाम वो दे जिसकी याद में ये चूड़ी... साँस लेती हो।"
सबकी नज़रें रुद्र पर थीं। उसने आँखें बंद कीं — सामने वो शाम थी, उसके बचपन की सबसे सुनहरी याद।
उसने आँखें खोलीं। मायरा उसे देख रही थी — वही आँखें, बस बड़ी हो गई थीं।
"मैं दाम देता हूँ," उसने कहा। "वो शाम... ले लो।"

बूढ़ी ने उसका हाथ थामा — एक सर्द लहर हथेली से गुज़री, जैसे कोई पन्ना किताब से निकल गया हो। वो शाम धुंधली पड़ने लगी... और लड़की का चेहरा धुंध में घुल गया।
"हो गया," बूढ़ी ने डिब्बा मायरा की तरफ़ बढ़ाया। "चूड़ी तुम्हारी हुई, बिटिया।"
"तुमने मेरे लिए अपनी सबसे क़ीमती याद दे दी?" मायरा ने उसका हाथ थाम लिया।
"तुम उस याद से ज़्यादा क़ीमती हो," रुद्र ने कहा — और उसे एहसास हुआ कि वो सच कह रहा है, भले ही वो शाम अब उसकी नहीं रही।
बाज़ार सिमटने लगा था — लालटेनें बुझ रही थीं, तंबू धुंध में घुल रहे थे। सुबह होने में कुछ ही पल थे।
मायरा ने चूड़ी कलाई में पहनाई — हरी काँच चाँदनी में दमक उठी। फिर उसने रुद्र का चेहरा अपने हाथों में लिया, और दोनों की साँसें टकराने लगीं।
"मुझे वो शाम याद नहीं," रुद्र ने फुसफुसाया, "पर ये रात... ये मैं कभी नहीं भूलूँगा।"
"और मैं तुम्हें भूलने नहीं दूँगी," मायरा ने कहा — और उनके होंठ मिल गए।
आख़िरी लालटेन बुझी। बाज़ार धुंध में घुल गया। सिर्फ़ चाँद था, मैदान था — और दो धड़कनें, एक-दूसरे में घुलती हुई।

सुबह। मैदान ख़ाली था — सूखी घास, टूटी बेंचें। कोई तंबू नहीं, कोई लालटेन नहीं।
रुद्र ने कैमरा उठाया — हर तसवीर में सिर्फ़ ख़ाली मैदान। सिर्फ़ एक में, कोने में, हरी-सी एक चमक — जैसे चाँदनी में कुछ हँस रहा हो।
मायरा की कलाई में चूड़ी थी — गर्म, असली।
"मुझे कुछ याद नहीं आ रहा," रुद्र ने कहा। "सब धुंधला है।"
मायरा मुस्कुराई — आँखों में आँसू, होंठों पर चाँदनी। "मुझे याद है। सब कुछ।"
जाते हुए बूढ़ी की आवाज़ उसके कानों में गूँजी थी — "जो याद तुमने दी, बेटा... वो अब उसकी है।"
और तब रुद्र समझा — कुछ बाज़ार सिर्फ़ चीज़ें नहीं लौटाते। कुछ यादें भी लौटा देते हैं — बस, किसी और के हाथों में।
उस दिन के बाद हर पूर्णिमा को मायरा उसे वो शाम सुनाती है — वो बारिश, वो हँसी, वो "पक्का वादा"। रुद्र आँखें बंद करके सुनता है — और हर बार वो शाम उसे अपनी लगती है। क्योंकि अब वो उसी की है... उसके ज़रिए।
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