रिया ने साठ साल पुरानी फिल्म को सातवीं बार रिवाइंड किया — और सातवीं बार भी वो चेहरा वहीं था। ठीक उसी फ्रेम में। ठीक उसी तरह कैमरे की ओर देखता हुआ। जैसे साठ साल से वो सिर्फ़ उसी का इंतज़ार कर रहा हो।
रिया मल्होत्रा, अट्ठाईस साल, दिल्ली की सबसे महंगी वेडिंग फिल्ममेकर। दूल्हा-दुल्हन के चेहरों पर कैमरा रखना उसका पेशा था — पर उस रात उसके हाथ काँप रहे थे। दादी के अस्सीवें जन्मदिन का तोहफ़ा तैयार हो रहा था — 1966 की शादी की 16mm फिल्म, जिसे वो फ्रेम-बाय-फ्रेम रीस्टोर कर रही थी। प्रोजेक्टर की रोशनी में धूल के ज़र्रे तैर रहे थे, और स्क्रीन पर हर रील में, हर शॉट में, भीड़ के बीच एक ही चेहरा चमक रहा था।
पहली बार उसने सोचा — संयोग है। फिर उसने माँ की 1994 की VHS कैसेट निकाली। वही चेहरा। वही बाईं भौंह पर हल्का-सा निशान। वही उम्र — तीस के आसपास। फिर चचेरी बहन तन्वी की 2018 की डिजिटल शादी की फुटेज खोली। वही चेहरा। न एक दिन बूढ़ा। न एक शिकन ज़्यादा। रिया ने तीनों तस्वीरें एक साथ स्क्रीन पर रखीं, और उसके दिल की धड़कन उसके कानों में बजने लगी।
"दादी," उसने अगले दिन पुरानी तस्वीर दादी के सामने रखी, "ये आदमी कौन है? आपकी शादी की फिल्म में भी है, मम्मी की शादी में भी, तन्वी की शादी में भी।" दादी ने तस्वीर देखी — और उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "तुम्हें... तुम्हें ये कहाँ से मिली?" उनकी आवाज़ काँप रही थी। "विवान... वो तो उस रात के बाद कभी नहीं दिखा। सबने कहा था वो शहर छोड़कर चला गया।"
"कौन-सी रात, दादी?" रिया ने पूछा। दादी ने खिड़की की ओर देखा, जैसे साठ साल पीछे देख रही हों। "मेरी शादी की रात। कुएँ के पास... तेरे दादाजी ने उसे डूबने से बचाया था। और उसी रात विवान ने कहा था — 'इस एहसान का बदला मैं वक़्त से भी बड़ा दूँगा।'" दादी की आँखों में आँसू थे। "हम सब हँस दिए थे। कौन जानता था... वो सच कह रहा था।"
तीन हफ़्ते बाद। जयपुर। रिया की सबसे अच्छी दोस्त सना की शादी। रिया कैमरे के पीछे थी — बारात महल के दरवाज़े पर पहुँच रही थी, ढोल की थाप पर हवा काँप रही थी, हज़ारों दीयों की रोशनी में सब कुछ सुनहरा लग रहा था। और तभी — व्यूफ़ाइंडर में — वो चेहरा। ज़िंदा। साँस लेता हुआ। भीड़ से थोड़ा अलग खड़ा। सीधे उसी की ओर देखता हुआ। रिया का कैमरा हाथ से छूटते-छूटते बचा।
वो भीड़ चीरती हुई उसकी ओर बढ़ी। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा ढोल की थाप भी उसके दिल की आवाज़ है। "तुम..." उसकी आवाज़ टूट गई। "तुम कौन हो?" वो मुस्कुराया — वही मुस्कान जो उसने साठ साल पुरानी फिल्म में देखी थी। "तुमने मुझे देख लिया, रिया," उसने कहा। "साठ साल में पहली बार किसी ने मुझे देखा है।" उसके रोंगटे खड़े हो गए। "मेरा नाम... तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?"
"मैं तुम्हारी हर शादी में था," विवान बोला, और उसकी आँखों में साठ साल का इंतज़ार तैर रहा था। "तुम्हारी दादी की शादी में। तुम्हारी माँ की शादी में। तन्वी की शादी में। मैं हर बारात में था, हर मंडप के पीछे खड़ा था। और तुम... तुम पहली हो जिसने पलटकर देखा।"
उस रात, महल की छत पर, चाँदनी में, दूर बजती शहनाई की धुन पर, विवान ने उसे सब बताया। 1966। वो दूल्हे का सबसे अच्छा दोस्त था — विवान, अट्ठाईस साल। शादी की रात कुएँ के पास दूल्हे ने उसे डूबने से बचाया था। और विवान ने उसी रात, उसी कुएँ के पानी को साक्षी मानकर, एक प्रण लिया था — "जब तक इस खानदान की शादियों को मेरी रखवाली की ज़रूरत है, मैं वक़्त के बाहर रहूँगा। मैं न बूढ़ा होऊँगा, न मरूँगा। मैं हर शादी में खड़ा रहूँगा — अनदेखा, अनजान। और जिस दिन इस खानदान का कोई मुझे देखकर मेरा नाम पूछेगा... उस दिन मेरा इंतज़ार खत्म होगा।"
"साठ साल," रिया की आँखों में आँसू थे। "साठ साल तुम अकेले...?" "अकेला नहीं," विवान ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया — उसके हाथ काँप रहे थे, और रिया ने पहली बार किसी के स्पर्श में साठ साल की तन्हाई महसूस की। "मैं इंतज़ार में था। तुम्हारे इंतज़ार में।"
चाँदनी में, हवा में तैरती गुलाब की पंखुड़ियों के बीच, रिया ने उसके कंधों पर हाथ रखे। उसकी साँसें उसके चेहरे को छू रही थीं। विवान का चेहरा उसके इतना करीब आया कि दोनों की धड़कनें एक हो गईं — पहले उसने उसके माथे को चूमा, फिर धीरे से उसके होंठों ने उसके होंठ छू लिए। साठ साल का इंतज़ार एक पल में पिघल गया, और उस पल में दुनिया की हर आवाज़ खामोश हो गई — सिर्फ़ दो दिलों की धड़कन बची। आगे क्या हुआ, ये सिर्फ़ चाँदनी जानती है — और वो कभी किसी को नहीं बताती।
"अब क्या होगा?" रिया ने उसकी छाती पर सिर रखकर पूछा। विवान ने गहरी साँस ली। "प्रण कहता है — जिस दिन कोई मुझे देख ले, वक़्त मेरे लिए फिर से चलने लगेगा। मैं बूढ़ा होऊँगा। और मुझे... जाना होगा। सुबह की पहली किरण के साथ।" रिया का दिल रुक गया। "नहीं—" "सुनो," उसने उसके होंठों पर उँगली रखी। "प्रण में एक आख़िरी पंक्ति है। अगर जिसने मुझे देखा है, वो मुझे रुकने को कहे — न रखवाले के तौर पर, बल्कि एक इंसान के तौर पर — तो मैं रुक सकता हूँ। साठ साल में किसी ने वो पंक्ति पढ़ी ही नहीं... क्योंकि किसी ने मुझे देखा ही नहीं।"
रिया ने उसकी आँखों में देखा — उन आँखों में साठ साल की हर शादी, हर मुस्कान, हर आँसू तैर रहे थे। "विवान," उसने कहा, और पहली बार उसका नाम किसी के मुँह से इतना अपना लगा, "रुको। मेरे लिए रुको।"
अगले साल, खानदान की अगली शादी में, रिया फिर कैमरे के पीछे थी। मंडप सजा था, शहनाई बज रही थी। और जब उसने व्यूफ़ाइंडर में देखा — तो फ्रेम में, दूल्हे की जगह, विवान खड़ा था। हँसता हुआ। ज़िंदा। उसकी आँखों के कोनों में पहली बार हल्की-सी झुर्रियाँ थीं — और रिया ने उन्हें देखकर मुस्कुराया, क्योंकि ये झुर्रियाँ इस बात का सबूत थीं कि वक़्त अब उसके लिए भी चल रहा है। साठ साल तक वो हर फिल्म में मेहमान था। इस बार वो दूल्हा था — और कैमरे के पीछे खड़ी दुल्हन मुस्कुरा रही थी।



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