बारिश की उस रात जब दरवाज़े पर दस्तक हुई, तो नैना ने घड़ी देखी — रात के साढ़े ग्यारह बजे थे, और इस बंगले का दरवाज़ा सात साल से किसी अजनबी के लिए नहीं खुला था।
बाहर तूफ़ान था। देवदारों की शाखाएँ हवा में झुक रही थीं। दरवाज़े पर खड़ा आदमी पूरी तरह भीगा हुआ था — बैग कंधे पर, बालों से पानी टपकता हुआ, आँखों में थकान और एक अजीब-सी पहचान, जैसे वो इस जगह को पहले से जानता हो।
"माफ़ कीजिए," उसने कहा, "गाड़ी नीचे मोड़ पर ख़राब हो गई है। क्या एक रात के लिए…?"
नैना ने लालटेन ऊँची की। अट्ठाईस साल की नैना तीन साल से इस बंगले की रखवाली कर रही थी — शिमला से दो घंटे दूर, देवदारों के बीच बसा एक भूला हुआ डाक बंगला, जिसे काग़ज़ों में "बंद" लिखा जा चुका था। मगर नैना जानती थी, ये बंगला बंद नहीं था — ये बस इंतज़ार कर रहा था।
"अंदर आ जाइए," उसने कहा। "नाम?"
"अर्जुन। अर्जुन मेहरा।"
नैना का हाथ लालटेन पर काँप गया।

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सात साल पुराना नाम
बंगले के बरामदे में एक पुराना रजिस्टर रखा था — मोटा, चमड़े की जिल्द वाला। नैना की दादी, जो तीस साल तक इस बंगले की रखवाली करती रही थीं, एक नियम छोड़ गई थीं — "इस बंगले का दरवाज़ा उसी के लिए खुलता है, जिसका नाम रजिस्टर में ख़ुद लिखा जाए।"
और रजिस्टर में नाम किसी हाथ से नहीं लिखे जाते थे। कभी-कभी सुबह खोलने पर एक नया नाम वहाँ होता — फीकी स्याही में, जैसे किसी ने रात में आकर लिख दिया हो। उन्हीं नामों वाले लोग अगले दिन बंगले तक पहुँचते थे — थके हुए मुसाफ़िर।
मगर सात साल पहले रजिस्टर में एक ऐसा नाम आया था, जो कभी नहीं आया।
"अर्जुन मेहरा," नैना ने धीरे से कहा। "आपका नाम सात साल पहले लिखा गया था। मैंने कमरा नंबर सात आपके लिए तैयार रखा है — हर हफ़्ते चादरें बदलती रही हूँ।"
अर्जुन ठिठक गया। "सात साल पहले?"
"उसी रात, जब मेरी दादी ने आख़िरी साँस ली थी," नैना बोली। "उन्होंने जाते-जाते बस इतना कहा था — ‘रजिस्टर ने जिसका नाम लिखा है, वो आएगा। चाहे कितना भी वक़्त लगे।’"
अर्जुन ने खिड़की से बाहर देखा — बारिश, अँधेरा, देवदार। "मैं इस बंगले को सात साल से सपनों में देख रहा हूँ," उसने कहा, आवाज़ धीमी। "एक ही सपना, बार-बार। देवदारों के बीच एक बंगला, बरामदे में एक लालटेन, और दरवाज़े पर एक औरत, जो मुझे अंदर बुलाती है। मैं समझता था, ये बस सपना है।"
देवदारों वाला कमरा
कमरा नंबर सात बंगले का सबसे बड़ा कमरा था — लकड़ी की फ़र्श, पत्थर की अँगीठी, और एक खिड़की, जिससे देवदारों का पूरा जंगल दिखता था। दीवार पर एक पुरानी तस्वीर टँगी थी — यही बंगला, और बरामदे में एक बूढ़ी औरत, हाथ में लालटेन।
"दादी," नैना ने कहा। "कहती थीं, ये बंगला उन लोगों के लिए है, जो रास्ता भटक गए हों — और कभी-कभी रास्ता नहीं, ज़िंदगी भटक जाती है।"
अर्जुन ने बैग नीचे रखा। "सात साल पहले," उसने कहा, "इसी सड़क पर मेरी गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ था। मैं तीन दिन बेहोश रहा। उन तीन दिनों में मैंने यही बंगला देखा था — यही बरामदा, यही लालटेन, यही खिड़की। जब होश आया, तो मुझे लगा, सपना था। मगर सपना हर महीने आता रहा।"
नैना ने उसकी तरफ़ देखा। सात साल से वो एक ऐसे नाम का इंतज़ार कर रही थी, जिसका चेहरा उसने कभी देखा ही नहीं था। और अब वो चेहरा सामने था — भीगा हुआ, थका हुआ, मगर वही, जो रजिस्टर की स्याही में लिखा था।
"तो रजिस्टर ने सही लिखा था," उसने कहा। "आप बस रास्ता भटक गए थे।"
अर्जुन मुस्कुराया — पहली बार, खुलकर। "या रास्ता मुझे यहाँ ला रहा था, और मैं सात साल से भाग रहा था।"
बाहर बारिश और तेज़ हो गई। नैना ने अँगीठी में लकड़ियाँ रखीं, और दोनों बरामदे में बैठ गए — बीच में एक मेज़, दो कप चाय, और सात साल का इंतज़ार, जो अब एक ही कमरे में था।

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बिना लकड़ी की आग
सुबह अर्जुन को जाना था। मगर ख़बर आई — रात के तूफ़ान में नीचे की सड़क पर मलबा आ गिरा है, रास्ता दो दिन के लिए बंद है।
"तो आप फँस गए," नैना ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ख़ुशी थी, जिसे वो छिपा नहीं पाई।
"लगता है, बंगले ने मुझे जाने नहीं दिया," अर्जुन ने कहा।
दो दिन, दो रातें। दिन में अर्जुन बंगले की टूटी खिड़कियाँ ठीक करता, शाम को दोनों अँगीठी के पास बैठते, और बातें चलतीं — बचपन की, सपनों की, उन बेहोशी वाले दिनों की।
दूसरी रात, जब नैना अँगीठी में लकड़ी डालने गई, तो अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"रुकिए," उसने कहा। "देखिए।"
अँगीठी में आग जल रही थी — बिना लकड़ी के। लौ ऊँची उठ रही थी, जैसे किसी ने उसे अभी-अभी सुलगाया हो, मगर अंदर एक भी लकड़ी नहीं थी। नैना को दादी की एक और बात याद आई — "जिस रात बंगले का मेहमान आ जाए, उस रात अँगीठी बिना लकड़ी के जलती है। ये बंगला ख़ुश होता है, तो ऐसे ही बताता है।"
"ये… ये कैसे?" अर्जुन ने पूछा।
"ये बंगला ऐसे ही है," नैना बोली। "जिसका इंतज़ार ख़त्म होता है, उसके लिए ये रास्ता बनाता है।"
आग की रोशनी में दोनों एक-दूसरे के क़रीब बैठे थे — इतने क़रीब कि साँसें टकराने लगीं। अर्जुन ने नैना का हाथ अपने हाथ में लिया, धीरे से। नैना ने हाथ नहीं हटाया। उसकी आँखों में वो सब था, जो सात साल से एक नाम में बंद था — इंतज़ार, पहचान, और एक ख़्वाहिश, जो अब नाम से बढ़कर चेहरा बन चुकी थी।
अर्जुन झुका, नैना ने आँखें बंद कर लीं — और फिर, जैसे बंगले ने ही परदा गिरा दिया हो, वो पल वहीं ठहर गया। आग की लौ, बारिश की आवाज़, और दो दिलों की धड़कन — बाक़ी सब अँधेरे में घुल गया।

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सुबह का रजिस्टर
तीसरी सुबह रास्ता खुल गया। अर्जुन का बैग बरामदे में था, गाड़ी नीचे मोड़ पर ठीक हो चुकी थी।
मगर जाने से पहले नैना ने रजिस्टर खोला — और ठहर गई।
रजिस्टर के आख़िरी पन्ने पर, "अर्जुन मेहरा" के ठीक नीचे, एक नया नाम लिखा था — फीकी स्याही में, उसी हाथ से।
"नैना।"
उसके नीचे दोनों नाम एक ही लाइन में लिखे थे — जैसे रजिस्टर ने ख़ुद ही फ़ैसला सुना दिया हो।
नैना ने रजिस्टर अर्जुन की तरफ़ बढ़ाया। अर्जुन ने पढ़ा, फिर मुस्कुराया, और बैग बरामदे में ही रख दिया।
"लगता है," उसने कहा, "रजिस्टर ने मेरा नाम इसलिए लिखा था, ताकि मैं उसे आपके नाम के साथ जोड़ सकूँ।"
उस दिन दोनों ने मिलकर एक फ़ैसला लिया — बंगला फिर से खुलेगा। उन्हीं लोगों के लिए, जिनके नाम रजिस्टर लिखता है — थके हुए मुसाफ़िरों के लिए, भटके हुए दिलों के लिए, एक रात की छत के लिए। कमरा नंबर सात अब हर उस मेहमान का है, जिसका नाम स्याही में लिखा जाता है।
और रात को, जब नैना बरामदे में लालटेन जलाती है, तो अर्जुन उसके पास खड़ा होता है। अँगीठी में अब लकड़ी डालनी पड़ती है — आग अब रोज़ की तरह जलती है, क्योंकि बंगले का इंतज़ार ख़त्म हो चुका है। मगर कभी-कभी, जब बारिश तेज़ होती है, तो नैना को लगता है — जैसे बंगला अब भी मुस्कुरा रहा हो।
क्योंकि कुछ बंगले बंद नहीं होते। वो बस एक मेहमान का इंतज़ार करते हैं — और जब वो आ जाता है, तो बंगला घर बन जाता है।
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