अनन्या ने उस सुबह अपनी हथेलियाँ देखीं, तो साँस अटक गई।
मेहंदी खिली हुई थी — पूरी, गहरी, महकती हुई। हथेली के बीच में एक बड़ा फूल, उँगलियों तक जाती महीन बेलें, और कलाई पर गोल-गोल पैस्ले। दुल्हन की मेहंदी भी इतनी सजी नहीं होती।
और उसने मेहंदी लगाई ही नहीं थी।
अनन्या सत्ताईस साल की थी, जयपुर के जोहरी बाज़ार में उसकी छोटी-सी मेहंदी की दुकान थी। दिन भर वो दूसरों के हाथों पर कहानियाँ लिखती थी — मोर, फूल, दूल्हा-दुल्हन के नाम। रात को वो अपने हाथ धोकर सोती थी, हमेशा। फिर ये मेहंदी आई कहाँ से?
उसने साबुन से रगड़ा, नींबू लगाया। रंग हल्का हुआ, पर मिटा नहीं।
उसने सोचा — थकान है, नींद में कुछ देख लिया होगा। पर अगली सुबह मेहंदी और गहरी थी।

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हथेलियों पर खिली रात
तीसरी रात अनन्या जागकर देखने बैठी — हथेलियाँ गोद में फैलाए, आँखें खुली। आँख कब लगी, पता ही नहीं चला। सुबह उठी तो मेहंदी वहाँ थी — और इस बार उसमें कुछ नया था।
दाईं हथेली के बीच, फूलों के घेरे में, बेलों से बने अक्षर थे — वि… वा… न।
विवान।
किसी का नाम था, जो उसकी ज़िंदगी में था ही नहीं। न कोई दोस्त, न कोई रिश्तेदार, न कोई ग्राहक। अनन्या ने अपनी डायरी पलटी, फ़ोन के कॉन्टैक्ट खंगाले — कोई विवान नहीं।
दादी कमला ने हथेलियाँ देखकर कहा, "बेटा, मेहंदी कभी बिना वजह नहीं खिलती। जिसकी मेहंदी ख़ुद खिल जाए, समझो किसी ने उसका नाम अपनी दुआओं में लिख रखा है।"
"दादी, ये मज़ाक़ नहीं है," अनन्या ने कहा। "मैंने लगाई ही नहीं। ये… ये अपने आप आ रही है।"
दादी ने उसकी हथेली को अपने हाथों में लिया, देर तक देखा, और धीरे से बोलीं, "तो फिर ये किसी और की मेहंदी है, जो तुझ तक पहुँच गई है।"
वो नाम जो किसी का नहीं था
अगले दिन नूर महल हवेली में एक बड़ी शादी की बुकिंग थी। हवेली दो सौ साल पुरानी थी — फ्रेस्को वाली दीवारें, झरोखे, और एक शीश महल, जहाँ दुल्हनें अपनी मेहंदी का रंग देखने आती थीं।
अनन्या सामान लेकर पहुँची, तो आँगन में एक आदमी फ्रेस्को की तस्वीरें खींच रहा था — तीस के आसपास की उम्र, कैमरा कंधे पर। उसने अनन्या को देखा, तो एक पल ठिठक गया।
"आप मेहंदी वाली हैं?" उसने पूछा।
"हाँ," अनन्या ने कहा। "और आप?"
"विवान। हवेली की बहाली का काम देख रहा हूँ।"
अनन्या के हाथ से मेहंदी का कोन गिरते-गिरते बचा। विवान। वही नाम, जो उसकी हथेली पर बेलों में लिखा था।
विवान ने चाय का कुल्हड़ बढ़ाया। उँगलियाँ छूते ही अनन्या की हथेलियों में झुनझुनी दौड़ गई — मेहंदी का रंग आँखों के सामने गहरा हो रहा था, जैसे किसी ने अभी ताज़ा मेहंदी फेर दी हो।
"आपकी मेहंदी…" विवान ने धीरे से कहा, उसकी हथेली की ओर देखते हुए। "ये डिज़ाइन… मैंने कहीं देखा है।"
"कहाँ?" अनन्या की आवाज़ काँप गई।
"मेरी दादी की डायरी में।" विवान ने कहा। "उन्होंने लिखा था — खिलती मेहंदी के बारे में।"
उस शाम अनन्या हवेली से भागती हुई निकली। और उस रात पहली बार कुछ अजीब हुआ — मेहंदी फीकी पड़ गई। सुबह तक वो इतनी हल्की हो चुकी थी कि बस एक धुँधली-सी छाप बची थी।
अनन्या समझ गई। मेहंदी उसके पास नहीं खिलती थी। वो उसके पास खिलती थी, जिसके पास विवान होता था।

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हवेली का आईना और पुरानी डायरी
अगली सुबह अनन्या ख़ुद नूर महल लौट आई। विवान शीश महल में था, पुराने आईनों की सफ़ाई देख रहा था। उसने बिना भूमिका के एक पुरानी, कपड़े में लिपटी डायरी निकाली।
"ये मेरी दादी शांति की डायरी है," विवान ने कहा। "उन्नीस सौ छियालीस में वो इस हवेली की दुल्हन बनकर आई थीं। उनकी मेहंदी के बारे में हवेली में आज भी बात होती है — कि वो मेहंदी कभी मिटी ही नहीं।"
उसने डायरी का एक पन्ना खोला। पुरानी स्याही में लिखा था — "जिस दिन मेरी मेहंदी किसी और की हथेली पर खिलेगी, समझना मेरा आशीर्वाद अपनी मंज़िल तक पहुँच गया।"
अनन्या ने अपनी हथेली विवान के सामने फैला दी। रात भर की फीकी मेहंदी, उसके हवेली में क़दम रखते ही, फिर से गहरी होने लगी थी। विवान ने अपनी कलाई आगे बढ़ाई। उसकी कलाई पर एक छोटा-सा जन्म का निशान था — एक पैस्ले के आकार का। बिल्कुल वैसा ही पैस्ले, जो अनन्या की हथेली के बीच बने फूल के ठीक नीचे खिला था।
"ये…" अनन्या की आवाज़ नहीं निकली।
"मैं हफ़्तों से तुम्हारे हाथों के सपने देख रहा हूँ," विवान ने धीरे से कहा। "ऐसी हथेलियाँ, जिन पर मेहंदी ख़ुद खिलती है। मुझे लगा, काम की थकान है। फिर तुम आ गईं।"
शीश महल के आईने में, एक पल के लिए, अनन्या को लगा जैसे उनके पीछे एक दुल्हन खड़ी है — लाल जोड़े में, हाथों में मेहंदी। उसने पलक झपकाई, और आईने में सिर्फ़ वो दोनों रह गए।
उस शाम, हवेली के आँगन में, लालटेनों की रोशनी में, विवान ने अनन्या का हाथ अपने हाथों में लिया। उसने उस हथेली को देखा, जिस पर उसका नाम लिखा था, और धीरे से उस जगह को चूम लिया जहाँ 'विवान' की बेलें थीं। अनन्या की साँसें तेज़ हो गईं। दोनों के बीच की दूरी साँसों जितनी रह गई, और उसकी हथेलियों की मेहंदी उस पल ऐसी चमकी, जैसे दीयों की लौ ने उसे छू लिया हो।
"मेरी मेहंदी ने तुम्हें तब चुना, जब मैं तुम्हें जानती भी नहीं थी," अनन्या ने फुसफुसाकर कहा।
"और मेरे दिल ने तुम्हें तब," विवान ने कहा, "जब मैंने तुम्हें देखा भी नहीं था।"
जब मेहंदी ने नाम पूरा किया
करवा चौथ की शाम थी। नूर महल में शादी की रौनक़ थी — दुल्हन की मेहंदी का काम अनन्या ने ही किया था। चाँद निकलने में देर थी। अनन्या छत पर चली गई, अकेली।
उसने अपनी हथेलियाँ फैलाईं।
मेहंदी पूरी खिल चुकी थी — फूल, बेलें, पैस्ले, और बीच में, फूलों के घेरे में, पूरा नाम — विवान। साफ़, गहरा, जैसे किसी ने अभी-अभी कोन से लिखा हो। और इस बार, नाम के चारों ओर छोटी-छोटी कलियाँ थीं, जो पहले कभी नहीं थीं।
सीढ़ियों पर आहट हुई। विवान था।
"दादी की डायरी का आख़िरी पन्ना," उसने कहा, "उसमें लिखा है — मेहंदी का नाम तब पूरा होता है, जब दोनों एक-दूसरे को चुन लें।"
अनन्या ने उसकी ओर देखा, हथेलियाँ उसकी ओर फैलाए। "मेरी मेहंदी ने तुम्हारा नाम पहले ही चुन लिया था, विवान।"
"और मैंने तुम्हें," विवान ने कहा, और उसका हाथ थाम लिया। "उस दिन से, जब से मैंने तुम्हारे हाथों के सपने देखने शुरू किए थे।"
चाँद ऊपर आ गया था। विवान ने अनन्या को अपने क़रीब खींचा, उसके माथे को चूमा, फिर उसके होंठों को — धीरे, गहरे, जैसे बरसों की प्यास बुझ रही हो। अनन्या ने उसकी गर्दन में बाँहें डाल दीं, और दोनों उस चाँदनी रात में एक-दूसरे में खो गए।
अगली सुबह, अनन्या ने अपनी हथेलियाँ देखीं। मेहंदी वहाँ थी — नर्म, गहरी, सुंदर। पर वो अब अपने आप नहीं खिलती थी।
क्योंकि उसे अपनी मंज़िल मिल गई थी।
और दादी कमला ने जब ये सुना, तो हँसकर बोलीं — "मैंने कहा था न, मेहंदी कभी बिना वजह नहीं खिलती।"

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यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।
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