
मेन्यू पर दाम नहीं थे — सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी: "यहाँ वही मिलता है, जो ज़ुबान पर नहीं आता।"
इरा ने वो लाइन तीन बार पढ़ी। फिर मोबाइल का नक़्शा खोला — उस गली का नामोनिशान तक नहीं था।
रात के डेढ़ बज रहे थे। अस्पताल से डिनर ब्रेक लेकर निकली थी वो — स्कूटी कीचड़ में फँस गई थी, और बारिश से बचने के लिए वो इस अँधेरी गली में घुस आई थी। गली के आख़िर में, जहाँ स्ट्रीटलाइट की रोशनी दम तोड़ती थी, एक छोटी-सी दुकान जल रही थी — पीली रोशनी, काँच के दरवाज़े पर भाप की चादर। लकड़ी के बोर्ड पर लिखा था: "खुलने का समय — रात 12 से सुबह 4।"
अंदर चार मेज़ें थीं, पीतल के लैंप, और शेल्फ़ों पर काँच के मर्तबान। काउंटर के पीछे एक बूढ़ा चाय छान रहा था, चेहरे पर जानी-पहचानी मुस्कान। इरा ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि बूढ़े ने बिना नज़र उठाए कहा, "बैठो, बिटिया। अदरक वाली बन रही है।"
इरा ठिठक गई। उसने तो अभी ऑर्डर दिया ही नहीं था। और अदरक वाली चाय — शाम से यही ख़्वाहिश उसके मन में घूम रही थी, किसी से कहा नहीं था। कुल्हड़ उसके सामने रखा गया। पहली चुस्की में ही दिन-भर की थकान जैसे धुल गई। "आपको कैसे पता चला?" बूढ़ा मुस्कुराया, "यहाँ पता नहीं लगाया जाता, बिटिया। यहाँ बस परोसा जाता है।"
तभी दरवाज़े की घंटी खनकी। बारिश में भीगा एक लड़का अंदर आया — कंधे पर झोला, आँखों में रात-भर जागने की लाली। वो सीधे कोने वाली मेज़ पर बैठ गया, जैसे अपनी जगह पहले से जानता हो। बूढ़े ने उसके सामने भी बिना पूछे दो चीज़ें रख दीं — कड़क मसाला चाय, कम चीनी, और एक छोटी प्लेट में शक्करपारे। लड़के की आँखें नम हो आईं। "ये... ये तो मेरी दादी बनाती थीं।" "पता है," बूढ़े ने कहा, और पलट गया।
लड़के ने नज़र उठाई। "तुम नई हो।" "पहली बार आई हूँ।" "मैं कबीर। रेडियो पर 'रात के राही' सुनती हो? दस से एक वाला शो?" इरा हँस पड़ी, "नर्स हूँ। रात की ड्यूटी में रेडियो ही साथी है।" "तो तुम मेरी रेगुलर लिसनर हुईं।" दोनों हँस पड़े।

उस रात के बाद इरा हर रात डेढ़ बजे वहाँ जाने लगी। कबीर शो ख़त्म करके डेढ़-दो के बीच आता। धीरे-धीरे कोने वाली मेज़ "उनकी" मेज़ बन गई। बातें होतीं — अस्पताल की रातें, उसके शो के क़िस्से। एक रात लैंप की लौ फड़फड़ाई; आधी रोशनी में उनके कंधे छू गए — कोई हिला नहीं। चाय के कुल्हड़ पर उसकी उँगलियाँ थीं, और कबीर की नज़र उन्हीं उँगलियों पर अटकी रह गई।
एक रात बारिश इतनी तेज़ थी कि बत्ती चली गई — सिर्फ़ पीतल के लैंप जले रहे। कबीर ने उसका भीगा दुपट्टा कुर्सी पर फैलाया, बालों से पानी की बूँदें पोंछीं। उसके हाथ एक पल के लिए उसके गाल पर ठहर गए — गर्म, काँपते हुए। इरा की साँसें तेज़ हो गईं। वो झुका — इतना पास कि चाय की भाप भी शरमा जाए — और तभी काउंटर से बर्तन खनका। दोनों हँसते हुए अलग हो गए — पर कुछ अनकहा दोनों के बीच ठहर गया।
पर हर मीठी रात के साथ एक बोझ भी बढ़ रहा था। घर से फ़ोन आते — "लड़का अमेरिका से आया है, इरा। संडे को मिल ले, बस एक बार।" वो "हाँ" कह देती, पर गले में अटक जाती। और कबीर — उसके शो का आख़िरी हफ़्ता चल रहा था। चैनल नाइट स्लॉट बंद कर रहा था। शुक्रवार को 'रात के राही' का आख़िरी शो था। ये बात उसने अभी तक इरा को बताई नहीं थी। दोनों के अनकहे बोझ हवा में तैरते, और बूढ़ा हर रात वही परोसता जो ज़ुबान पर नहीं आता था।

गुरुवार की रात इरा ने ग़ौर किया — कबीर अकेला बैठा था, पर उसके सामने दो कुल्हड़ रखे थे। "दूसरा किसके लिए?" कबीर ने कंधे उचकाए, "काका रख देते हैं। एक साल से यही हो रहा है।" इरा ने काउंटर की तरफ़ देखा। बूढ़ा पास आया, आँखों में शरारत भरी मुस्कान। "ये लड़का एक साल से बिना माँगे दो कुल्हड़ लेता आया है। दूसरा हमेशा किसी के लिए था — उससे पहले कि तुम यहाँ आतीं, बिटिया।" इरा का दिल ज़ोर से धड़का। कबीर ने नज़रें झुका लीं, "काका!" "सच है तो है," काका ने कहा, "ये कैफ़े सिर्फ़ परोसता नहीं — मिलाता भी है।"
उस रात पौने चार बजे, जब लैंप एक-एक करके बुझ रहे थे, कबीर ने उसका हाथ थाम लिया। बारिश थम चुकी थी; गली में पानी की बूँदें टपक रही थीं। वो बोला, "कल मेरा आख़िरी शो है।" इरा कुछ न बोली — अल्फ़ाज़ गले में अटक गए थे। उसने सिर्फ़ उसका हाथ दबाया।
शुक्रवार की रात कैफ़े में इरा अकेली बैठी थी। दो बज गए, ढाई बज गए — कबीर नहीं आया। तीन बजे काका उसके पास आए, एक कुल्हड़ उसके सामने रखा। "आज वो नहीं आएगा, बिटिया। उसका आख़िरी शो था — अभी स्टूडियो में होगा।" इरा की आँखों में आँसू तैर आए। काका ने धीरे से पूछा, "एक बात बताओ — तुम्हें उससे कुछ कहना था न?" इरा ने सिर हिलाया। "तो जाओ। चार बजने में अभी एक घंटा बाक़ी है।"
इरा बारिश में भीगती हुई रेडियो स्टेशन पहुँची। काँच के उस पार कबीर अपना आख़िरी शो समेट रहा था — "तो दोस्तों, ये था 'रात के राही' का आख़िरी सफ़र..." उसने फ़ोन उठाया, लाइन मिलाई। "हैलो, कौन बोल रहे हैं?" "एक रात की मुसाफ़िर," इरा की आवाज़ काँपी, "कबीर, मैं इरा बोल रही हूँ। वो कैफ़े वाली।" स्टूडियो में सन्नाटा छा गया। "मुझे... मुझे तुमसे कुछ कहना था। संडे को घरवालों ने मुझे एक लड़के से मिलवाना तय किया है। पर मैं... मैं हर रात डेढ़ बजे सिर्फ़ एक ही जगह जाना चाहती हूँ — वहाँ, जहाँ दो कुल्हड़ मेरा इंतज़ार करते हैं।" लाइन के उस पार ख़ामोशी रही, फिर उसकी हँसी आई — भीगी हुई, सबसे ख़ूबसूरत। "शो ख़त्म होने में दस मिनट हैं, इरा। नीचे आ जाओ।"
स्टेशन के गेट पर बारिश में वो खड़ा था। इरा दौड़कर उससे लिपट गई — गीले बाल, तेज़ धड़कन, साँसों की गर्मी। कबीर ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया, और उस रात शहर की सबसे ख़ूबसूरत बारिश में उसके होंठों ने वो कह दिया जो अल्फ़ाज़ कभी नहीं कह पाए थे। बारिश ने दोनों को अपनी चादर में छिपा लिया — आगे की कहानी रात ने अपने पास रख ली।
शनिवार की रात। गली के आख़िर में कैफ़े फिर जल रहा था — वही पीली रोशनी, काँच पर वही भाप। इरा और कबीर साथ अंदर आए। काका ने पहली बार पूछा, "आज क्या लाऊँ?" दोनों एक साथ बोले, "दो अदरक वाली चाय!" काका इतना खुलकर हँसा कि लैंप की लौएँ भी हिल गईं। "आज पहली बार किसी ने माँगा है," उसने कहा, और दो कुल्हड़ मेज़ पर रख दिए। मेन्यू पर वही लाइन लिखी थी — "यहाँ वही मिलता है, जो ज़ुबान पर नहीं आता।" पर उस रात, उस मेज़ पर, सब कुछ ज़ुबान पर आ चुका था।
Comments
Post a Comment