देवगढ़ पॉइंट की बत्ती हर रात एक ही रास्ता नापती थी — पूर्व से पश्चिम, पश्चिम से पूर्व, जैसे कोई थका हुआ पहरेदार। मगर उस तूफ़ानी रात वो बीच में ही रुक गई, हवा के ख़िलाफ़ मुड़ी, और समंदर के बीचोंबीच एक ही जगह पर ठहर गई। नीचे, चट्टानों के पास, लहरों में कोई डूब रहा था।
मीरा ने रेलिंग को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उसकी उँगलियों के निशान ठंडी लोहे पर रह गए। अट्ठाईस साल की मीरा तीन साल से इस लाइटहाउस की रखवाली कर रही थी — पिता के जाने के बाद बत्ती उसी के हवाले थी। दादी की डायरी के पहले पन्ने पर इस बत्ती का नियम लिखा था: “यह बत्ती उसी की तरफ़ मुड़ती है, जिसका नाम समंदर ने लिखा हो।” मीरा ने कभी इस पर यक़ीन नहीं किया था। आज रात तक।
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दोपहर का अजनबी
उस दिन दोपहर को जब अर्जुन पहली बार लाइटहाउस की सीढ़ियाँ चढ़ा, तो मीरा ने उसे ऊपर से ही रोक दिया था। तीस साल का अर्जुन, कंधे पर कैमरा, आँखों में अधूरी कहानी की बेचैनी।
“मैं समंदर के लाइटहाउस पर एक किताब के लिए तस्वीरें ले रहा हूँ,” उसने कहा था। “बस लैंप-रूम की एक तस्वीर चाहिए।”
“लैंप-रूम नहीं,” मीरा ने साफ़ कहा। “नीचे से तस्वीर ले लीजिए। बत्ती को छूना मना है।”
अर्जुन ने मुस्कुराकर अपनी जेब से एक पुरानी पीतल की चाबी निकाली और हथेली पर रख दी। “मेरी दादी ने मरने से पहले यह दी थी। कहा था — जहाँ यह चाबी खुले, वहीं तेरा घर है। मेरे दादा देवांग इस लाइटहाउस के पहले रखवाले थे। चालीस साल पहले एक तूफ़ानी रात वो समंदर में गए और फिर कभी लौटे नहीं।”
मीरा की साँस अटक गई। वो चाबी — वही घुमावदार सिरा, वही पुराना पीतल — उसने अपनी दादी की डायरी में बने स्केच में देखी थी। उसने चाबी को छुआ तक नहीं। “यहाँ कोई घर नहीं है,” उसने धीरे से कहा, “सिर्फ़ एक बत्ती है, जो किसी का इंतज़ार नहीं करती।”
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तूफ़ान की रात
शाम ढलते-ढलते बादल काले पड़ गए, हवा ने सीटी बजानी शुरू कर दी। मीरा ने मना किया था — “आज रात समंदर में मत उतरना” — मगर अर्जुन को लाइटहाउस की तस्वीर तूफ़ान के बीच से लेनी थी, जहाँ बत्ती की रोशनी पानी पर सोना बिछाती है।
रात के नौ बजे मीरा ने देखा — एक छोटी नाव लहरों में काग़ज़ की कश्ती-सी हिल रही थी। फिर एक लहर आई, और नाव पलट गई।
मीरा चीख़ी नहीं — वो गैलरी से नीचे उतरी, रस्सी उठाई, और चट्टानों की तरफ़ भागी। और तभी उसने देखा — बत्ती, जो चालीस साल से एक ही चाल चलती आई थी, हवा के ख़िलाफ़ मुड़ रही थी। उसकी रोशनी ने समंदर को चीर दिया और ठीक उस जगह पर ठहर गई जहाँ अर्जुन लहरों से लड़ रहा था।
“बत्ती ने उसे ढूँढ लिया,” मीरा बुदबुदाई — डर से ज़्यादा उसमें एक अजीब-सी राहत थी।
रस्सी के सहारे वो चट्टानों तक पहुँची — अर्जुन की उँगलियाँ एक पत्थर से चिपकी थीं, दूसरी मुट्ठी में अब भी पीतल की चाबी कसी थी। मीरा ने उसका ठंडा, काँपता हाथ पकड़ा और उसे ऊपर खींच लिया।
कॉटेज में, जब अर्जुन की साँसें सँभलीं, तो मीरा ने उसके माथे पर हाथ रखा। अर्जुन ने आँखें खोलीं और उसे ऐसे देखा जैसे समंदर से निकलकर कोई पहली बार किनारा देखता है।
“तुमने मुझे क्यों बचाया?” उसने फुसफुसाया।
“मैंने नहीं बचाया,” मीरा ने कहा। “बत्ती ने बचाया। वो तुम्हारी तरफ़ मुड़ी थी — चालीस साल में पहली बार।”
पीतल की चाबी
आधी रात को मीरा ने दादी की डायरी निकाली — पीले पन्नों पर वही स्केच था, और नीचे लिखा था: “जिस दिन चाबी वाला आए, समझना — बत्ती को नया रखवाला मिल गया।”
अर्जुन ने चाबी मीरा की हथेली पर रख दी — उँगलियाँ छू गईं, किसी ने हाथ पीछे नहीं खींचा। मीरा उसे नीचे वाले भंडार-कक्ष तक ले गई, जो चालीस बरस से बंद था।
चाबी ताले में गई। एक गहरी, पुरानी आवाज़ के साथ ताला खुल गया। अंदर लोहे के बक्से में देवांग का रोजनामचा था — आख़िरी पन्ने पर काँपते अक्षरों में: “बत्ती उसी के लिए मुड़ती है जिसे समंदर ने चुना हो। आज रात वो मुड़ी है। मैं उसके पीछे जा रहा हूँ — एक जहाज़ डूब रहा है। अगर मैं न लौटूँ, तो जानना — बत्ती अब किसी और का इंतज़ार करेगी।”
मीरा ने रोजनामचा सीने से लगा लिया। देवांग ग़ायब नहीं हुए थे — वो बत्ती के पीछे समंदर में उतरे थे, और बत्ती तब से अपनी जगह लेने वाले की राह देख रही थी।
“तो बत्ती मेरा इंतज़ार कर रही थी,” अर्जुन ने कहा। “और तुमने इसे जलाए रखा।”
गैलरी की सीढ़ियों पर, बत्ती की रोशनी में, वो एक-दूसरे के इतने क़रीब थे कि तूफ़ान की आवाज़ भी दूर लग रही थी। अर्जुन ने उसका चेहरा हथेली में लिया, जैसे कोई कीमती चीज़ छू रहा हो। मीरा ने आँखें बंद कर लीं। उसका माथा अर्जुन के माथे से टिका, और उस पल दुनिया में सिर्फ़ दो धड़कनें रह गईं।
उसने उसके माथे को चूमा — लंबा, धीमा, जैसे कोई वादा लिख रहा हो। फिर उनके होंठ मिले, नमकीन हवा और बारिश की ख़ुशबू के बीच, और मीरा को लगा जैसे बरसों से बुझी कोई लौ उसके अंदर फिर जल उठी हो। बाहर तूफ़ान था, अंदर सिर्फ़ बत्ती की सुनहरी रोशनी — और उस रात जो कुछ हुआ, वो समंदर और उस बत्ती के बीच ही रहा।
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वो रोशनी जो रुक गई
सुबह मीरा की आँख खुली तो समंदर शांत था, खिड़की से धूप की पतली लकीर अंदर आ रही थी। अर्जुन गैलरी में उसी जगह खड़ा समंदर को देख रहा था जहाँ रात को बत्ती मुड़ी थी।
“मैं रुकना चाहता हूँ,” उसने बिना पलटे कहा। “बत्ती के साथ। तुम्हारे साथ। अगर तुम चाहो तो।”
मीरा उसके पास जाकर खड़ी हो गई और उसकी उँगलियाँ पकड़ लीं — इस बार गर्म और मज़बूत। “बत्ती ने तुम्हें चुन लिया है,” उसने कहा। “और मैंने भी।”
उस शाम, जब दोनों ने मिलकर बत्ती जलाई, तो वो शांत और स्थिर घूमी — जैसे उसे अब किसी को ढूँढना न हो। मीरा ने अर्जुन की तरफ़ देखा और मुस्कुराई।
“अब इसे किसी की राह नहीं देखनी है,” उसने कहा।
अर्जुन ने उसका हाथ थाम लिया। “क्योंकि जिसे ढूँढना था, वो मिल गया।”
और उस पॉइंट की बत्ती उस रात से हर रात जलती है — अब वो दो लोगों के साथ जलती है — राह देखना छोड़कर।



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