पूर्णिमा की रात सुरंग का मुँह खुला था — और इरा जानती थी कि उसे नहीं खुलना चाहिए था।
पत्थर का वह मेहराब पिछले अड़सठ साल से बंद था। गाँव के लोग कहते थे, उन्नीस सौ बासठ के भूस्खलन ने उसे हमेशा के लिए बंद कर दिया। इरा ने खुद उस मेहराब की तस्वीरें खींची थीं — मलबे से ढका, झाड़ियों में दबा, ऊपर एक मिटा हुआ सा शिलालेख। मगर आज रात मेहराब के अंदर अँधेरा नहीं था। अंदर से चाँदनी आ रही थी, जैसे सुरंग के उस पार कोई और ही आसमान हो।
इरा की उँगलियों में लालटेन काँप रही थी। उसने एक कदम आगे बढ़ाया, और पहाड़ी हवा ने उसका दुपट्टा छूकर जैसे उसे अंदर धकेल दिया।

(AI generated illustration)
बंद सुरंग की चाबी
इरा सत्ताईस साल की थी — विरासत इमारतों की वास्तुकार। लंडौर की पहाड़ी पर बने देवदार कॉटेज की बहाली का काम उसे ही मिला था। कॉटेज का रखवाला बहादुर सिंह अस्सी के करीब था, और पहले ही दिन उसने इरा को एक ही हिदायत दी थी।
“बिटिया, पहाड़ी के पीछे वाली सुरंग के पास रात को मत जाना। वह सुरंग भूस्खलन से नहीं, अपनी मर्ज़ी से बंद हुई थी।”
“अपनी मर्ज़ी से?” इरा हँसी थी। “सुरंग की भी मर्ज़ी होती है?”
बहादुर सिंह ने कोई जवाब नहीं दिया था। बस पुराने नक़्शों की अलमारी की ओर इशारा कर दिया था।
तीन दिन बाद इरा को उस अलमारी में एक नक़्शा मिला — अठारह सौ सत्तानवे का, फटा हुआ, जिस पर सुरंग के पार एक घाटी बनी थी। उस घाटी का नाम किसी नक़्शे पर नहीं था। नक़्शे के कोने पर किसी ने पेंसिल से लिखा था: “यह रास्ता सिर्फ़ पूर्णिमा की रात खुलता है। और सिर्फ़ तब, जब दोनों छोर पर कोई इंतज़ार कर रहा हो।”
इरा ने उस लाइन को हँसकर टाल दिया था।
आज पूर्णिमा थी, और इरा शाम से ही बेचैन थी — जैसे कोई आवाज़ उसे पहाड़ी के पीछे बुला रही हो।
सुरंग के अंदर
सुरंग के अंदर पैर रखते ही इरा को लगा जैसे वह किसी और दुनिया के दरवाज़े पर खड़ी हो। हवा ठंडी नहीं थी — गर्म थी, चमेली की ख़ुशबू वाली। दीवारों पर नक़्क़ाशियाँ थीं, जो लालटेन की रोशनी में धीरे-धीरे जगमगाने लगीं — बेलें, फूल, और दो हाथ, जो एक-दूसरे की ओर बढ़ रहे थे।
इरा ने एक नक़्क़ाशी को छुआ, और बेल उसके हाथ के नीचे हल्की सी हिली। उसका दिल धड़क रहा था — डर से नहीं, किसी और ही एहसास से।
सुरंग लंबी थी। इरा चलती रही, और हर कदम के साथ लालटेन की लौ और सुनहरी होती गई। फिर अचानक सुरंग ख़त्म हो गई।
सामने एक घाटी थी। चाँदनी में नहाई हुई, देवदारों से घिरी, बीच में एक झील — इतनी शांत कि चाँद उसमें दो बार दिख रहा था, एक आसमान में, एक पानी में। झील के किनारे एक छोटा सा कॉटेज था, जिसकी खिड़की में रोशनी जल रही थी।
और झील के किनारे एक आदमी खड़ा था।
“तुम आ गईं।” उसकी आवाज़ में हैरानी नहीं थी — राहत थी, जैसे वह किसी का बहुत दिनों से इंतज़ार कर रहा हो।

(AI generated illustration)
वो घाटी जो नक़्शे पर नहीं थी
“मैं रोहन हूँ,” उसने कहा। “तीस साल का, भूविज्ञानी। एक महीने पहले मैं इसी सुरंग से इस घाटी में आया था — नक़्शे के लिए, चट्टानों के नमूने लेने।”
“एक महीने पहले? मगर सुरंग तो—”
“सुरंग मेरे पीछे बंद हो गई।” रोहन ने धीरे से कहा। “मैंने हर रोज़ कोशिश की। यहाँ वक़्त अलग चलता है, इरा — एक महीना एक हफ़्ते जैसा लगता है।”
“सुरंग सिर्फ़ तब खुलती है,” इरा ने नक़्शे की लाइन याद करते हुए कहा, “जब दोनों छोर पर कोई इंतज़ार कर रहा हो।”
रोहन ने उसकी ओर देखा। “तो इसका मतलब है…”
“इसका मतलब है कि मैं भी इंतज़ार कर रही थी,” इरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी। “मुझे नहीं पता था किसका। बस इतना पता था कि कोई आवाज़ मुझे बुला रही है।”
वो दोनों झील के किनारे बैठ गए। रोहन ने बताया — कॉटेज की डायरी में लिखा था कि यह घाटी भटके हुओं के लिए है, और सुरंग उन्हें उन्हीं से मिलाती है जिनकी उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
“और तुम्हें किसकी ज़रूरत थी?” इरा ने पूछा।
रोहन ने जवाब नहीं दिया। उसने बस इरा का हाथ थाम लिया — धीरे से, जैसे पूछ रहा हो कि क्या यह ठीक है। इरा ने हाथ नहीं छुड़ाया। उसने अपनी उँगलियाँ रोहन की उँगलियों में उलझा दीं।
चाँद ऊपर चढ़ आया था, और पानी में दोनों की परछाइयाँ एक-दूसरे के क़रीब सरक आईं।
“इरा,” रोहन ने धीरे से कहा, “भोर होने से पहले हमें लौटना होगा। अगर सूरज उग गया, तो सुरंग फिर एक महीने के लिए बंद हो जाएगी।”
“तो फिर?”
“तो फिर मैं यहाँ अकेला रह जाऊँगा। और तुम…” उसने इरा के चेहरे की ओर हाथ बढ़ाया — और रुक गया, उसकी उँगलियाँ इरा के गाल से बस एक साँस की दूरी पर ठहरी रहीं।
इरा ने उसका हाथ अपने गाल पर रख लिया।
“मैं अकेली नहीं लौटूँगी,” उसने कहा।
रोहन ने उसे अपनी ओर खींचा — धीरे से, जैसे वह चाँदनी से बनी हो। उनके चेहरे इतने क़रीब आ गए कि एक-दूसरे की धड़कन सुनाई देने लगी। फिर रोहन ने इरा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए — एक ऐसे चुंबन में, जिसमें एक महीने का इंतज़ार, एक अधूरी घाटी और दो भटके हुए रास्ते एक साथ घुल गए।
उसके बाद जो हुआ, वह सिर्फ़ चाँदनी जानती है।

(AI generated illustration)
भोर से पहले
जब इरा की आँख खुली, तो वह रोहन के कंधे पर सिर रखे थी, और आसमान के किनारे पर हल्की सी रोशनी उभर रही थी।
“भोर हो रही है!” वह उठ बैठी। “सुरंग—”
दोनों भागे — झील के किनारे से, घाटी की ढलान से होते हुए सुरंग के मुँह तक। पीछे घाटी धीरे-धीरे धुँधली हो रही थी, जैसे कोई सपना मिटता हो। मेहराब अभी खुला था।
इरा ने रोहन का हाथ कसकर पकड़ा, और दोनों एक साथ सुरंग में दाख़िल हो गए।
अंदर की नक़्क़ाशियाँ और तेज़ जगमगा रही थीं — जैसे घाटी उन्हें विदा कह रही हो।
“रुको,” उसने कहा। “एक वादा करो।”
“क्या?”
“अगली पूर्णिमा को हम फिर आएँगे। साथ।”
रोहन मुस्कुराया। “और उसके बाद वाली पूर्णिमा को भी।”
वो दोनों सुरंग से बाहर निकले — लंडौर की पहाड़ी पर, जहाँ भोर की पहली किरण उतर रही थी। पीछे मेहराब फिर पत्थर बन चुका था। बहादुर सिंह दूर खड़ा था, हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए, जैसे उसे सब पता हो।
“सुरंग खुली थी, बिटिया?” उसने पूछा।
इरा ने रोहन की ओर देखा, फिर मुस्कुरा दी। “खुली थी, बाबा। और इस बार वह अकेली नहीं खुली थी।”
अगली पूर्णिमा को, जब चाँद पूरा हुआ, तो पहाड़ी के पीछे वाली सुरंग फिर खुली — और इस बार दो लोग, हाथ में हाथ डाले, एक साथ उसके अंदर गए।
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।
Comments
Post a Comment