मीरा ने उस पतंग को छत पर गिरते हुए देखा — ठीक शाम के सात बजकर तेईस मिनट पर, जब आसमान बैंगनी हो रहा था और लखनऊ की पुरानी हवेलियों पर पहली बत्तियाँ जल रही थीं।
पतंग लाल थी — गहरा, सुर्ख लाल, जैसे किसी ने शाम के आख़िरी सूरज को काग़ज़ पर उतार दिया हो। उसकी दुम सुनहरी थी, डोर कटी हुई थी। फिर भी वह हवा के ख़िलाफ़ उड़कर आई थी, सीधी मीरा की छत पर, ठीक उसी जगह जहाँ हर साल गिरती थी।
छह साल। छह साल से यही हो रहा था।

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हर साल वाली पतंग
पहली बार वह पतंग छह साल पहले गिरी थी — मकर संक्रांति से ठीक एक हफ़्ते पहले, जब मीरा तेईस साल की थी और हवेली की इस छत पर नई-नई आई थी। उसने पतंग को उठाकर उल्टा-पल्टा, तब उसे पहली लाइन मिली — दुम पर मद्धम स्याही में — “तुम्हारी छत से जो हवा आती है, वो मेरे शहर की सबसे अच्छी हवा है।”
नीचे कोई नाम नहीं था, कोई पता नहीं था।
मीरा ने पतंग को अपने कमरे में रख लिया। अगले साल, उसी दिन, उसी वक़्त, उसी जगह — पतंग फिर गिरी, और उसकी दुम पर दूसरी लाइन थी — “मैंने ये पतंग साठ साल पहले बनाई थी, मगर उड़ाई आज है।”
तीसरे साल तीसरी लाइन आई — “मुझे नहीं पता था कि काग़ज़ भी इंतज़ार कर सकता है।”
चौथे साल चौथी — “तुम हर साल इसी वक़्त छत पर क्यों आती हो — क्या तुम भी किसी का इंतज़ार कर रही हो?”
मीरा ने उस सवाल का जवाब किसी को नहीं दिया। ख़ुद को भी नहीं। मगर हर साल वह उसी वक़्त छत पर आती रही, जैसे कोई अदृश्य डोर उसे खींच लाती हो।
पाँचवें साल पाँचवीं लाइन आई — “अगले साल ये ख़त पूरा हो जाएगा।”
और इस छठे साल मीरा ने तय कर लिया — वह पतंग को आते हुए देखेगी, और इस बार उसका पीछा करेगी।
वह दोपहर से छत पर बैठी थी, नज़रें आसमान के एक ही कोने पर टिकाए। ठीक उसी घड़ी वह आई — चौक की तरफ़ से, हवा के बिल्कुल उल्टा। मीरा ने चप्पलें वहीं छोड़ीं और सीढ़ियाँ उतर गई।
पतंग आगे-आगे तैरती रही, मीरा अपनी स्कूटी पर उसके पीछे-पीछे — जब तक पतंग एक तंग गली में मुड़कर एक बंद दुकान के दरवाज़े पर नहीं जा गिरी।
दुकान के ऊपर एक पुराना बोर्ड लटका था — “काशी पतंग भंडार”।
पतंग बनाने वाला
दुकान बंद थी, मगर अंदर से रोशनी आ रही थी। मीरा के खटखटाने पर कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला।
सामने एक आदमी खड़ा था — इकतीस-बत्तीस साल का, आस्तीनें चढ़ी हुईं, हाथों पर काग़ज़ की धूल और गोंद के निशान। उसकी नज़र मीरा से फिसलकर उसके हाथ की लाल पतंग पर ठहरी — और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“ये…” उसकी आवाज़ अटक गई। “ये पतंग… तुम्हारे पास कैसे आई?”
“ये हर साल मेरी छत पर गिरती है,” मीरा ने कहा। “छह साल से। हर साल इसकी दुम पर एक नई लाइन आ जाती है।”
आदमी ने पतंग को ऐसे पकड़ा जैसे कोई सोता हुआ बच्चा हो। “मेरा नाम अर्जुन है। और ये पतंग मेरे दादाजी की है।”

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लालटेन की रोशनी में अर्जुन ने उसे सब बताया। उसके दादाजी काशी ने यह पतंग 1964 में बनाई थी — उस लड़की के लिए जो इसी हवेली में रहती थी। उसका नाम सावित्री था। संक्रांति से कुछ दिन पहले उसका परिवार दिल्ली चला गया, और काशी की पतंग कभी उड़ ही नहीं पाई। काशी ने कभी शादी नहीं की। पतंग साठ साल एक संदूक में पड़ी रही।
“छह साल पहले मुझे वो संदूक मिला। मैंने पतंग उड़ाई, और वह मेरे हाथ से छूटकर सीधी तुम्हारी छत पर चली गई। तब से हर साल उसी तारीख़ को वह मेरी दुकान से निकल जाती है — मैंने उसे ताले में रखा, वज़न बाँधा, एक साल उड़ाया ही नहीं — फिर भी वह चली जाती है।”
“और ये लाइनें?” मीरा ने दुम की ओर इशारा किया।
“ये लाइनें मैं नहीं लिखता।” अर्जुन ने एक पुरानी डायरी निकाल लाई। “ये दादाजी की डायरी की लाइनें हैं — शब्द-शब्द उन्हीं के हाथ की लिखावट में। पतंग उनका अधूरा ख़त पूरा कर रही है।”
मीरा ने डायरी के पन्ने पल्टे — हर लाइन वहाँ थी, वही स्याही, वही झुकाव। और आख़िरी पन्ना… ख़ाली था।
“इस साल की लाइन अभी बाक़ी है,” अर्जुन ने कहा।
तभी मेज़ पर रखी पतंग काँपी।
मीरा ने साँस रोक ली। उनकी आँखों के सामने, पतंग की दुम पर ताज़ी स्याही उभरने लगी — जैसे कोई अदृश्य क़लम लिख रही हो। आख़िरी लाइन — “अगर ये पतंग फिर लौटे, तो समझना — इश्क़ ने हार नहीं मानी।”
“ये लाइन दादाजी की डायरी में नहीं है।” अर्जुन की नज़रें मीरा पर थीं। “ये लाइन… मेरी है।”
“तुम्हारी?”
“हर साल मैं भी पतंग के पीछे आता था। गली के मोड़ पर खड़ा होकर देखता था कि छत पर खड़ी लड़की उसे उठाती है, पढ़ती है, मुस्कुराती है। तीन साल से ये लाइन मेरे दिल में थी। आज पतंग ने उसे स्याही में लिख दिया।”
मीरा की आँखों में ग़ुस्सा और हँसी एक साथ आ गए। “तो तुम तीन साल से उस मोड़ पर खड़े थे — और दरवाज़ा खटखटाना तुम्हें नहीं सूझा?”
“पतंग का काम ख़त पहुँचाना था, मेरा नहीं। और मुझे डर था — अगर मैं आ गया, तो पतंग आना बंद कर देगी।”
वह एक क़दम आगे बढ़ा — इतना करीब कि मीरा को उसकी साँसों की गरमी महसूस होने लगी। उसका हाथ मेज़ पर पड़ी पतंग से फिसलकर मीरा के हाथ के पास आ ठहरा — छुआ नहीं, बस ठहरा रहा, जैसे पूछ रहा हो। मीरा ने हाथ नहीं हटाया।
“तो अब?” उसने फुसफुसाकर पूछा।
“अब ख़त पूरा हो गया।” अर्जुन की आवाज़ में बरसों का इंतज़ार घुला हुआ था। “अब पतंग को आराम चाहिए। और मुझे…”
उसने मीरा का चेहरा अपने हाथों में लिया — धीरे से, जैसे वह काग़ज़ की बनी हो — और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। बाहर गली में संक्रांति की पहली पतंगें आसमान में उठ रही थीं, और अंदर, उस पीली रोशनी में, दुनिया कुछ देर के लिए थम गई।
आख़िरी उड़ान
अगली सुबह मकर संक्रांति थी। पूरा शहर छतों पर था — डोर, मांझा, “वो काटा!” की आवाज़ें, आसमान में हज़ारों पतंगें।
मीरा और अर्जुन लाल पतंग लेकर उसी छत पर आए। उन्होंने मिलकर नई सुनहरी दुम बाँधी, अर्जुन ने पतंग हवा में उठाई, मीरा ने डोर पकड़ी।
पतंग ऊपर उठी — धीरे-धीरे, मज़बूती से, जैसे कोई बूढ़ा मुसाफ़िर आख़िरी बार आसमान देख रहा हो। फिर वह चमकने लगी — पहले हल्की-सी, फिर तेज़ — और सुनहरी रोशनी की लकीर बनकर ऊपर जाती गई, जब तक वह चिंगारियों में बिखरकर पूरे शहर पर बरस नहीं गई।
मीरा हँस रही थी और रो रही थी, एक साथ।
“दादाजी का ख़त पहुँच गया।” अर्जुन ने मीरा का हाथ थाम लिया।

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अगले साल
अगले साल, ठीक उसी घड़ी — एक पतंग फिर छत पर गिरी।
मगर इस बार वह पुरानी पतंग नहीं थी — ताज़ा लाल काग़ज़, नई सुनहरी दुम, दो हाथों की बनी। उसकी दुम पर एक ही लाइन थी — “इस बार पतंग अकेली नहीं उड़ी।”
मीरा ने मुस्कुराकर पतंग उठाई और पीछे मुड़ी — जहाँ अर्जुन दो कप चाय लेकर खड़ा था।
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