उनतीस साल की सारा ने जब मनाली का सोलो ट्रिप प्लान किया था, तो दोस्तों ने कहा था — "अकेले? पहाड़ों में?" उसने बस मुस्कुराकर बैग पैक कर लिया था।
ट्रेक के पहले दिन ही उसकी मुलाकात इकतीस साल के विहान से हुई — लंबा, साँवला, आँखों में पहाड़ों जैसी गहराई। वो इस ट्रेक का गाइड था।
"पहली बार ट्रेकिंग?" विहान ने पूछा।
"पहली बार अकेले," सारा ने कहा। "डर लग रहा है, लेकिन रुकना नहीं है।"
विहान मुस्कुराया। "डर अच्छा है। जो डरता है, वही पहाड़ को इज़्ज़त देता है।"
तीन दिन का ट्रेक था। हर सुबह धुंध, हर शाम बोनफायर। विहान रास्ते में पहाड़ों की कहानियाँ सुनाता। सारा मंत्रमुग्ध सुनती।
दूसरी रात, बोनफायर के पास सब सो गए थे। सारा और विहान जाग रहे थे, आसमान में तारे गिनते हुए।
"तुम शहर क्यों नहीं जाते?" सारा ने पूछा। "इतना ज्ञान, इतनी कहानियाँ..."
"शहर में तारे नहीं दिखते," विहान ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा। "और कहानियाँ... कहानियाँ तो वहीं होती हैं जहाँ सुनने वाला हो।"
सारा ने उसकी तरफ देखा। आग की रोशनी में उसका चेहरा... उसने जल्दी से नज़रें हटा लीं, दिल की धड़कन तेज़ थी।
आखिरी सुबह, चोटी पर पहुँचकर सूरज निकला — सुनहरी रोशनी बर्फ पर। सारा की आँखों में आँसू थे।
"ये लम्हा..." वो बोली।
"ज़िंदगी भर याद रहेगा," विहान ने पूरा किया। फिर जेब से एक छोटा-सा पत्थर निकाला — पहाड़ी क्रिस्टल। "पहाड़ की निशानी। जब भी देखोगी, ये सुबह याद आएगी।"
सारा ने पत्थर मुट्ठी में भींच लिया। "और तुम भी।"
वापसी में दोनों खामोश थे, लेकिन वो खामोशी भी कुछ कह रही थी। मनाली छूट रहा था, लेकिन कुछ साथ जा रहा था — एक सुबह, एक पत्थर, और एक नाम जो अब हर तारे में दिखता था।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]


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