उस शाम नदी उल्टी बह रही थी — कम से कम नावों के हिसाब से।
आरव घाट की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर ठिठक गया। नीचे गोधूलि का पानी सुनहरा था, और उस पर दर्जनों काग़ज़ की नावें तैर रही थीं — सबकी सब धारा के ख़िलाफ़, ऊपर की ओर। जैसे नदी ने उनके लिए अपना रास्ता बदल दिया हो।
उनतीस साल का आरव नदियों के नक़्शे बनाता था। सर्वे कंपनी ने उसे इस घाट-कस्बे में भेजा था — नदी हर साल अपना किनारा थोड़ा बदल लेती थी, और उसका काम था वो बदलाव नापकर काग़ज़ पर उतारना। धारा, बहाव, मोड़ — नदियों के बारे में वो सब जानता था। बस ये नहीं जानता था कि काग़ज़ की नाव धारा के ख़िलाफ़ कैसे तैर सकती है।
"पहली बार देख रहे हो?"
आवाज़ नीचे से आई। घाट के किनारे एक लड़की बैठी थी — छब्बीस के आसपास, गहरे फ़िरोज़ी सलवार-सूट में, गोद में काग़ज़ों का ढेर। उसके हाथ तेज़ी से चल रहे थे — मोड़ना, दबाना, किनारे सीधे करना। एक नाव तैयार। उसने उसे हथेली पर रखा, होंठों से कुछ फुसफुसाया, और पानी में छोड़ दिया।
नाव धारा के ख़िलाफ़ चल पड़ी।

"ये... कैसे?" आरव सीढ़ियाँ उतर आया।
लड़की ने नज़र उठाई — और आरव को लगा, शाम का सारा सुनहरा पानी उसकी आँखों में उतर आया है।
"नावें नहीं तैरतीं," उसने कहा। "बातें तैरती हैं। मैं इनाया। तुम?"
"आरव। नदी नापने आया हूँ।"
इनाया हँसी — ऐसी हँसी जिसमें मज़ाक नहीं, पुरानी जानकारी थी। "नदी नापी नहीं जाती, आरव। नदी तो लौटाई जाती है।"
अगली शाम आरव फिर आया। और उसके अगली भी। दिन में सर्वे का काम — नाप, नोट्स, नक़्शे। पर शाम होते ही क़दम घाट की सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ जाते।
उसने देखा — हर नाव किसी न किसी को ढूँढ़ लेती थी।
एक शाम एक नाव तैरती हुई घाट के उस कोने तक पहुँची जहाँ बूढ़े रघु काका रोज़ बैठते थे। नाव शादी के पुराने निमंत्रण-पत्र से बनी थी। काका ने उसे उठाया, पढ़ा — और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। "पचास साल," उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा। "पचास साल से ये दिन भूला बैठा था — जिस दिन वो हाँ कहकर मेरी हो गई थी।"
एक नाव एक बच्चे के पास रुकी — उसकी नानी की लोरी वाले पन्ने से बनी। बच्चा उस रात पहली बार बिना रोए सोया।
"तुम काग़ज़ कहाँ से लाती हो?" एक शाम आरव ने पूछा।
इनाया ने ढेर की तरफ़ इशारा किया — पुरानी चिट्ठियाँ, अधूरे नक़्शे, डायरियों के फटे पन्ने। "भूले हुए काग़ज़," उसने कहा। "चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई, नक़्शा जो कभी काम नहीं आया। मैं उन्हें नाव बनाकर छोड़ देती हूँ — नावें उन्हें वहीं पहुँचा देती हैं जहाँ उन्हें होना चाहिए था।"
"और धारा के ख़िलाफ़?"
"क्योंकि भूली बातें हमेशा उल्टी धारा में लौटती हैं," इनाया ने कहा, उसकी उँगलियाँ एक नई नाव के किनारे सीधे कर रही थीं। "आसान रास्ता तो यादों का होता है — वो तो बह जाती हैं। मुश्किल रास्ता भूल का होता है। उसे लौटना पड़ता है।"
आरव ने नाव बनाना सिखाने को कहा। इनाया पास सरक आई — इतने पास कि उसके बालों की चमेली ख़ुशबू आरव की साँसों में घुल गई। उसने उसके हाथ अपने हाथों में लिए — "ऐसे मोड़ो... हाँ... अब दबाओ।"
नाव बन गई — टेढ़ी-मेढ़ी, बचकानी। इनाया हँस पड़ी। "पहली नाव हमेशा ऐसी ही बनती है।"
"और फिर?"
"फिर उसे छोड़ दो," उसने कहा — "और देखो, वो किसे ढूँढ़ती है।"
आरव ने नाव पानी में छोड़ी। वो डगमगाई, घूमी — और फिर धारा के ख़िलाफ़ चल पड़ी, सीधी इनाया के पैरों की तरफ़। रुक गई।

घाट पर दिए जल रहे थे। इनाया ने नाव उठाई, खोली — अंदर ख़ाली था। कोई बात नहीं, कोई नाम नहीं।
"इसका मतलब?" आरव की आवाज़ धीमी थी।
इनाया ने उसकी आँखों में देखा — बहुत देर तक। "इसका मतलब," उसने फुसफुसाकर कहा, "ये नाव अभी अपनी बात ढूँढ़ रही है।"
उस रात आरव देर तक जागता रहा। उसने अपना सर्वे वाला नक़्शा निकाला — इस घाट का सबसे सटीक नक़्शा। और फिर भी, उसने सोचा, इस नक़्शे में वो जगह नहीं थी जहाँ वो इस वक़्त खड़ा था।
एक शाम आँधी आई — इनाया नहीं आई, न कोई नाव। अगले दिन उसकी आँखों में पहली बार उदासी थी। "जिस दिन नदी सुनना बंद कर दे, उस दिन नावें नहीं छोड़तीं," उसने कहा। "कल वो नहीं सुन रही थी।"
उसी शाम — आँधी के बाद की पहली साफ़ शाम — कुछ अजीब हुआ।
आरव घाट की सीढ़ियों पर बैठा था। एक नाव तैरती आई — धारा के ख़िलाफ़, सीधी उसके पैरों तक। उसने उठाई। काग़ज़ पुराना था, किनारे मुड़े हुए। उसने खोला।
एक बच्चे की हैंडराइटिंग में बना नक़्शा था — "दादाजी के घर का नक़्शा"। नदी, पेड़, घर — और नीचे लिखा था: "मैं लौटूँगा, दादाजी।"
आरव के हाथ काँपने लगे। ये उसकी अपनी हैंडराइटिंग थी। बारह साल की उम्र की।
याद वापस आई — दादाजी की मौत वाला दिन। बारह साल के आरव ने चुपके से ये नक़्शा बनाया था, नाव बनाई थी, लिखा था "मैं लौटूँगा, दादाजी" — और घाट पर छोड़ आया था। उसी हफ़्ते परिवार शहर चला गया। नाव भी भूल गया, वादा भी।
"सत्रह साल," इनाया उसके पास आकर बैठ गई थी — पता नहीं कब। "सत्रह साल से ये नाव धारा के ख़िलाफ़ तैर रही थी, आरव। घर लौटने के लिए।"
"पर... ये मुझे कैसे मिली?"
"क्योंकि घर तुम हो," उसने धीरे से कहा। "नावें ठिकानों को नहीं, लोगों को ढूँढ़ती हैं।"
आरव ने नाव को सीने से लगा लिया। सत्रह साल पुराना काग़ज़, सत्रह साल पुराना वादा — और अब, आख़िर, लौटा हुआ।
"अब मैं समझा," उसने कहा, "तुम ये क्यों करती हो।"
"क्यों?"
"क्योंकि कोई तो हो जो भूली बातों को लौटाए।"
इनाया ने उसका हाथ थाम लिया। "और कोई तो हो जो लौटी बातों को थामे।"
उस रात आरव ने अपना सबसे सटीक नक़्शा निकाला — इस घाट का, हर सीढ़ी नापी हुई, हर मोड़ दर्ज। सबसे नीचे, ख़ाली जगह में उसने लिखा: "मैं नक़्शे बनाता हूँ, पर अपना रास्ता भूल गया था। इनाया — क्या तुम मेरा ठिकाना बनोगी?"
उसने नाव बनाई — इस बार सीधी, सुंदर। होंठों से फुसफुसाया — और घाट पर, इनाया के सामने, पानी में छोड़ दिया।
नाव डगमगाई नहीं। वो सीधी धारा के ख़िलाफ़ चली — जैसे नदी उसके लिए झुक गई हो — और इनाया के पैरों पर रुक गई।
इनाया ने उसे उठाया। खोला। पढ़ा।
जब उसने नज़र उठाई, उसकी आँखों में आँसू थे — और होंठों पर वो हँसी जो आरव ने पहली शाम सुनी थी।
"हाँ," उसने कहा।

आरव ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। दिए की रोशनी में उसकी आँखें चमक रही थीं। दोनों की साँसें टकराने लगीं — और फिर उनके होंठ मिल गए।
पानी पर नावें तैरती रहीं — धारा के ख़िलाफ़। पर उस रात पहली बार दो नावें साथ-साथ तैर रही थीं — एक-दूसरे से सटकर, जैसे हाथ थामे हों।
कुछ नदियाँ धारा से नहीं बहतीं। दिल से बहती हैं।
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