पुल धुंध से बाहर आया — और सना की साँस रुक गई।
आधी रात थी। चंद्रपुर के घाट पर चाँदनी बिछी थी, नदी का पानी चाँदी जैसा चमक रहा था — और बीच नदी में, जहाँ शाम को सिर्फ़ पानी था, अब पत्थर का एक पुल खड़ा था। पुराना, काई जमी, दोनों किनारों को जोड़ता हुआ। जैसे धुंध ने उसे अपने सीने से निकालकर रख दिया हो।
सना ने कैमरा उठाया — पर उँगलियाँ शटर पर ठिठक गईं।
वो सत्ताईस साल की थी, दिल्ली की डॉक्यूमेंट्री फ़ोटोग्राफ़र। चैनल ने उसे भेजा था — "चंद्रपुर का चाँदनी पुल: किंवदंती या अफ़वाह?" गाँव वाले कहते थे, शरद पूर्णिमा की रात नदी की धुंध से एक पुल उभरता है। पर आज पूर्णिमा नहीं थी। आज तो अष्टमी थी — आधा चाँद।
"फिर ये यहाँ कैसे?" वो बुदबुदाई।
"क्योंकि ये पूनम का मोहताज नहीं है," पीछे से आवाज़ आई।
सना चौंकी। घाट की सीढ़ियों पर एक नौजवान खड़ा था — तीस के आसपास, सादा कुर्ता, कंधे पर गमछा, हाथ में लालटेन। उसकी आँखों में चाँदनी उतर आई थी।
"विहान," उसने कहा। "मल्लाह का पोता। और तुम वो शहर वाली फ़ोटोग्राफ़र हो, जो पुल की तस्वीर लेने आई है।"
"तुम्हें कैसे पता?"
"दादा ने बताया।" विहान ने नदी की ओर देखा। "वो कहते हैं — ये पुल हर किसी को नहीं दिखता। ये उसी को दिखता है, जिसके दिल में कोई अनकही ख़्वाहिश हो। और आज रात... ये हम दोनों को दिखा है।"
सना हँसी — पर उस हँसी में वो यक़ीन नहीं था, जो सुबह था। "तुम्हारी ख़्वाहिश क्या है, विहान?"
उसने जवाब नहीं दिया। बस पुल की ओर देखता रहा। फिर धीरे से बोला, "दादा कहते हैं — इस पर चढ़ने का एक नियम है। पीछे मुड़कर मत देखना। जो मुड़ा, वो भूल गया कि वो किसके साथ था।"
"डरावनी कहानियाँ—"
"1986 में दादा इस पर चढ़े थे। दादी के साथ।" विहान की आवाज़ धीमी हो गई। "दादी बीच पुल में डर गईं — पीछे देखा। सात दिन तक दादा का नाम भूल गई थीं। सातवें दिन याद आया — और उसी दिन उन्होंने दादा से शादी के लिए हाँ कही।"
सना के हाथ में कैमरा भारी लगने लगा।
"चलोगी?" विहान ने हाथ बढ़ाया।
नदी की ठंडी हवा सना के चेहरे को छू रही थी। दिमाग़ कह रहा था — वापस जाओ, ये ख़तरा है। पर दिल... दिल तो कब का पुल पर पहुँच चुका था।
उसने उसका हाथ थाम लिया।
पहला क़दम — पत्थर ठंडा था, पर उसके नीचे कुछ धड़क रहा था। जैसे पुल साँस ले रहा हो। दूसरा क़दम — धुंध उनके पीछे बंद होने लगी। घाट, लालटेन की रोशनी, दुनिया — सब धुंध में डूब गया। अब सिर्फ़ वो दोनों थे, चाँद, और पुल।
"डर लग रहा है?" विहान ने पूछा। उसके हाथ की पकड़ मज़बूत थी।
"थोड़ा," सना ने सच कहा। "पर रुकने का मन नहीं कर रहा।"
बीच पुल में चाँद ठीक सिर के ऊपर था। नदी नीचे चाँदी की चादर जैसी बिछी थी। विहान रुक गया — और सना भी। वो उसके इतना करीब था कि उसकी साँसें उसके चेहरे को छू रही थीं। उसकी आँखों में चाँदनी थी, और चाँदनी के पार कुछ और — कुछ ऐसा, जो सना ने आज तक किसी आँख में नहीं देखा था।
"सना," उसने धीरे से कहा, "तुम्हारी ख़्वाहिश क्या है?"
उसके होंठ उसके होंठों से बस एक साँस की दूरी पर ठहर गए। सना की धड़कन इतनी तेज़ थी कि उसे लगा, पुल भी उसे सुन रहा है। उसका हाथ अनजाने में उसके गाल की ओर बढ़ा — उँगलियों ने उसके चेहरे को छुआ, और वो काँप गई।
"तुम," उसने फुसफुसाया। "मेरी ख़्वाहिश... तुम हो।"
और फिर वक़्त ठहर गया। उसके होंठ उसके होंठों से मिले — चाँदनी, धुंध, नदी की आवाज़ — सब एक पल में पिघल गया। उसके हाथ उसकी कमर पर थे, उसके हाथ उसके बालों में — और आगे क्या हुआ, ये सिर्फ़ उस रात की चाँदनी जानती है। वो कभी किसी को नहीं बताती।
तभी पुल काँपा।
सना की आँखें खुलीं। नीचे पत्थर धुंध में घुलने लगे थे — पुल ग़ायब हो रहा था! "विहान!"
"कैमरा!" विहान चिल्लाया। "तुम्हारे हाथ में अब भी कैमरा है — पुल को शक हो गया है!"
सना ने अपने हाथों को देखा — कैमरा अब भी उसकी उँगलियों में था, उँगली शटर पर। वो यहाँ तस्वीर लेने आई थी। सबूत। चैनल की स्टोरी। करियर।
पुल और तेज़ी से घुल रहा था। नीचे नदी का पानी दिखने लगा था।
और सना ने फ़ैसला किया।
उसने कैमरे को देखा — अपना सबसे क़ीमती कैमरा, जिसके बिना वो कहीं नहीं जाती थी — और फिर उसे विहान के हाथों में थमा दिया। "पकड़ो इसे," उसने कहा। "आज रात कोई तस्वीर नहीं। आज रात सिर्फ़... हम।"
विहान ने कैमरा लिया — और दूसरे हाथ से उसका हाथ और मज़बूती से पकड़ लिया। "पीछे मत देखना," उसने कहा। "बस आगे देखो। मेरी तरफ़।"
वो दौड़े। पुल के पत्थर उनके क़दमों के नीचे धुंध बन रहे थे — पर जहाँ-जहाँ उनके पैर पड़ते, वहाँ पुल एक पल के लिए फिर ठोस हो जाता। जैसे पुल कह रहा हो — शक मिटा, तो मैं हूँ।
और फिर — दूसरा किनारा।
वो दोनों हाँफते हुए रेत पर गिरे। पीछे देखा — नदी थी, चाँद था, धुंध थी। पुल नहीं था। जैसे कभी था ही नहीं।
"हम... पहुँच गए?" सना ने पूछा।
"पहुँच गए," विहान मुस्कुराया। फिर उसने कैमरा उसे लौटाया। "एक बात बताऊँ? दादा कहते हैं — ये पुल नदी पार नहीं कराता, सना। ये दो दिलों के बीच की दूरी पार कराता है।"
सुबह घाट पर दादा मिले — अस्सी साल के रघु मल्लाह, आँखों में शरारत। "तो चढ़ ही गए पुल पर," उन्होंने कहा। "और कैमरे वाली बिटिया — तस्वीर मिली?"
सना ने कैमरा खोला। मेमोरी कार्ड में उस रात की एक भी तस्वीर नहीं थी — उसने एक भी फ्रेम नहीं खींचा था।
सिवाय एक के।
आख़िरी फ्रेम में — जो उसने कभी नहीं खींचा था — बीच नदी में धुंध के बीचोंबीच पुल था, और उस पर दो लोग, हाथों में हाथ डाले। चेहरों पर चाँदनी।
"पुल ने अपनी तस्वीर ख़ुद खींच ली," दादा हँसे। "जो दिल से देखता है, उसे सबूत की ज़रूरत नहीं पड़ती, बिटिया।"
सना ने वो फ्रेम चैनल को नहीं भेजा। उसने उसे अपने कमरे की दीवार पर लगाया — और उसके नीचे लिखा: "चंद्रपुर, वो रात — जब पीछे मुड़कर नहीं देखा।"
आज भी, जब चाँदनी रात में नदी पर धुंध उतरती है, घाट वाले कहते हैं — पुल आता है। पर अब वो सिर्फ़ उन्हीं को दिखता है, जो हाथ थामकर चढ़ते हैं... और पीछे मुड़कर नहीं देखते।



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