(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।)
सीपी आधी रात को ठीक बारह बजे गाने लगी — और अनन्या की आँख उस आवाज़ पर खुली, जो समंदर की आवाज़ नहीं थी, बल्कि किसी आदमी की आवाज़ थी, जो बहुत धीरे से एक पुराना गीत गा रहा था।
वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। कमरे में चाँदनी फैली थी, खिड़की के बाहर लहरों की आवाज़ आ रही थी। गीत मेज़ पर रखी सीपी के अंदर से आ रहा था — गुलाबी और सफ़ेद धारियों वाली वो सीपी, जो शाम को ज्वार के बाद रेत पर उसे मिली थी। सीपी हल्के से चमक रही थी, जैसे उसके अंदर कोई छोटा-सा चाँद कैद हो।
अनन्या अट्ठाईस साल की थी, एक छोटे-से तटीय गाँव के समुद्री संग्रहालय में शोधकर्ता। उसने सैकड़ों सीपियाँ देखी थीं, सैकड़ों बार उन्हें कान से लगाया था। हर सीपी में समंदर की आवाज़ होती थी — लहरों की, हवा की। किसी सीपी में गीत नहीं होता था।
उसने सीपी को फिर कान से लगाया। गीत अब साफ़ सुनाई दे रहा था — एक पुरानी धुन, बिना शब्दों के, सिर्फ़ गुनगुनाहट। वह धुन उसे जानी-पहचानी लगी, जैसे बचपन में किसी ने उसे सुलाने के लिए यही धुन गुनगुनाई हो। पर किसने? उसे याद नहीं आया। वह रात भर सीपी को हाथ में लिए बैठी रही, और जब सुबह हुई तो गीत रुक गया, सीपी की चमक बुझ गई, और वह फिर एक मामूली सीपी बन गई।
लाइटहाउस की रोशनी
दूसरी रात गीत फिर बजा — ठीक बारह बजे। तीसरी रात भी।
पाँचवीं रात वह सीपी लेकर किनारे पर निकल गई। गाँव के ऊपर चट्टान पर पुराना लाइटहाउस खड़ा था, जिसकी रोशनी हर दस सेकंड में घूमकर समंदर पर पड़ती थी। अनन्या ने देखा — जैसे ही लाइटहाउस की रोशनी उसकी तरफ़ घूमी, सीपी की चमक थोड़ी तेज़ हो गई। जैसे ही रोशनी हटी, चमक धीमी पड़ गई।
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वह चट्टान की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी — सौ से ज़्यादा सीढ़ियाँ, हवा में नमक की गंध, नीचे लहरों का शोर। लाइटहाउस के दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था, लालटेन हाथ में लिए। वह इकतीस साल का रहा होगा, लंबा, साँवला, आँखों में समंदर जितनी गहराई।
“आप यहाँ क्या कर रही हैं, इतनी रात को?” उसने पूछा, आवाज़ में हैरानी भी थी और चिंता भी।
“मेरा नाम अनन्या है,” उसने कहा, और सीपी आगे बढ़ा दी। “यह सीपी गाती है। हर रात बारह बजे। और जब आपकी लाइटहाउस की रोशनी घूमती है, तो यह और तेज़ चमकती है।”
आदमी ने सीपी को देखा, फिर अनन्या को। उसके चेहरे पर एक अजीब-सा भाव आया — जैसे उसने कोई पुरानी बात सुन ली हो, जिसे वह भूल चुका था।
“मेरा नाम अर्जुन है,” उसने धीरे से कहा। “मैं इस लाइटहाउस का रखवाला हूँ। और यह धुन…” वह रुक गया। “यह धुन मेरी दादी की थी। वह हर रात मुझे यही धुन गुनगुनाकर सुलाती थीं। उनके जाने के बाद मैं यही धुन अकेले में गुनगुनाता हूँ, जब लाइटहाउस की बत्ती जलती है।”
अनन्या की साँस अटक गई। “तो यह आवाज़… आपकी है?”
अर्जुन ने सिर हिलाया, फिर हँस दिया, थोड़ा शर्माते हुए। “पर यह नामुमकिन है। मेरी आवाज़ किसी सीपी में कैसे कैद हो सकती है?”
“शायद समंदर के पास अपने तरीके होते हैं,” अनन्या ने कहा, और दोनों हँस पड़े।
अमावस की रात
इसके बाद हर रात अनन्या लाइटहाउस जाती। धीरे-धीरे बातों ने एक नया रास्ता पकड़ लिया — वह रास्ता, जिस पर चलते हुए दोनों की नज़रें ज़्यादा देर तक एक-दूसरे पर ठहरने लगीं, और बातों के बीच ख़ामोशी भी अच्छी लगने लगी।
एक रात अर्जुन ने बालकनी में खड़े होकर वही धुन गुनगुनाई। अनन्या ने सीपी कान से लगाई — सीपी में भी वही धुन बज रही थी, एक साथ, एक सुर में। उसने अर्जुन की तरफ़ देखा। अर्जुन ने गुनगुनाना बंद कर दिया, और सीपी भी चुप हो गई। दोनों की नज़रें मिलीं, और उस पल में हवा भी ठहर गई।
“तुम्हें पता है,” अर्जुन ने धीरे से कहा, “दादी कहती थीं — समंदर कभी-कभी किसी की आवाज़ को सहेजकर रख लेता है, ताकि वह आवाज़ उस इंसान तक पहुँच सके, जिसके लिए वह बनी हो।”
“और अगर वह इंसान मिल जाए, तो?” अनन्या ने पूछा, आवाज़ काँप रही थी।
“तो समंदर का काम पूरा हो जाता है,” अर्जुन ने कहा, और उसका हाथ अनन्या के हाथ के पास आकर रुक गया — छुआ नहीं, बस इतना पास कि दोनों की उँगलियों के बीच की हवा भी गरम लगने लगी।
पर फिर अमावस की रात आई। चाँद आसमान से ग़ायब था, और सीपी पूरी रात ख़ामोश रही। अनन्या ने उसे बार-बार कान से लगाया — कुछ नहीं, सिर्फ़ ख़ालीपन। उसका दिल डूबने लगा। क्या सीपी का काम पूरा हो गया था? क्या अब सब कुछ ख़त्म हो जाएगा — अर्जुन, लाइटहाउस, वे रातें?
वह भागकर लाइटहाउस पहुँची। अर्जुन वहाँ नहीं था — वह ऊपर बत्ती के कमरे में था। उसी वक़्त समंदर पर तूफ़ान उठ आया, हवा ने दरवाज़ा पटक दिया, और लाइटहाउस की बत्ती एक बार टिमटिमाकर बुझने लगी। अनन्या ने सीढ़ियाँ चढ़ीं, अँधेरे में, हाथ से दीवार पकड़कर। ऊपर अर्जुन बत्ती को ठीक करने की कोशिश कर रहा था, उसके हाथ काँप रहे थे।
“मैं यहाँ हूँ,” अनन्या ने कहा, और लालटेन ऊँची करके पकड़ ली। उसकी रोशनी में अर्जुन ने बत्ती का तार जोड़ा, और बत्ती फिर जल उठी — घूमती हुई रोशनी समंदर पर पड़ी, जैसे किसी ने अँधेरे में फिर से रास्ता बना दिया हो।
तूफ़ान की आवाज़ के बीच दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। अर्जुन ने अनन्या का चेहरा अपने हाथों में लिया, और धीरे से उसके माथे को चूम लिया। फिर उसके होंठ अनन्या के होंठों से मिले — एक लंबा, धीमा, सच्चा चुंबन, जिसमें हफ़्तों की चाहत, डर और भरोसा सब घुल गया था। अनन्या ने उसकी कमीज़ को कसकर पकड़ लिया, और उस पल के बाद की रात उन्होंने एक-दूसरे की बाँहों में, लाइटहाउस की गरम रोशनी में बिताई — और कहानी यहाँ रुकती है, जहाँ दो दिलों की धड़कनें एक हो गईं।
आख़िरी गीत
अगली पूर्णिमा की रात अनन्या सीपी लेकर किनारे पर गई, अर्जुन उसके साथ था। दोनों ने सीपी को रेत पर रख दिया। बारह बजे सीपी चमक उठी — पर इस बार उसमें सिर्फ़ अर्जुन की धुन नहीं थी। उसमें अनन्या की हँसी भी थी, उसकी आवाज़ भी थी, दोनों की आवाज़ें एक धुन में घुली हुई थीं, जैसे समंदर ने उनकी कहानी को अपने अंदर लिख लिया हो।
गीत धीरे-धीरे धीमा हुआ, चमक बुझी, और सीपी फिर कभी नहीं गाई। अनन्या ने उसे संग्रहालय की सबसे ख़ास अलमारी में रख दिया, उसके नीचे एक छोटी-सी तख़्ती लगाकर — “वह सीपी, जो सिर्फ़ उसकी आवाज़ सुनाती थी।”
अर्जुन अब भी लाइटहाउस की बत्ती जलाता है, और अनन्या अब भी हर रात उसके पास जाती है। कभी-कभी, जब पूर्णिमा की रात समंदर शांत होता है, तो दोनों को लगता है कि लहरों के बीच से वही पुरानी धुन फिर सुनाई दे रही है — पर अब उन्हें सीपी की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह धुन अब उनके अपने दिलों में बजती है।
(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।)
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