
आधी रात को शहर के घंटाघर ने बारह बजाए — और फिर एक तेरहवीं घंटी बजी। नायरा ने चौंककर आसमान की ओर देखा, और जो देखा उससे उसकी साँस थम गई: बारिश की बूँदें हवा में ठहर गई थीं।
वो सड़क के बीचों-बीच खड़ी थी। छतरी उसके हाथ से छूटकर नीचे गिरी — पर ज़मीन को छूने से पहले ही रुक गई, हवा में तैरती हुई। सामने गली में एक कुत्ता दौड़ता हुआ जम गया था — एक पैर हवा में उठा, जीभ बाहर। नायरा ने एक बूँद पर उँगली रखी। बूँद ठंडी थी, कठोर — जैसे काँच का मोती।
नायरा उन्तीस की थी — विरासत इमारतों की आर्किटेक्ट। नगर निगम ने उसे इस पुराने शहर के डेढ़ सौ साल पुराने घंटाघर का सर्वे करने भेजा था। मकान-मालिक ने पहले ही दिन चेताया था: "मैडम, आधी रात के बाद घंटाघर के पास मत जाना। वहाँ की घंटियाँ... कुछ अजीब हैं।"
उसने हँसकर टाल दिया था। इंजीनियर लोग ऐसी बातों में नहीं मानते। पर आज रात, होटल की खिड़की से बारहवीं घंटी सुनकर न जाने क्यों वो नीचे उतर आई थी — और अब ये।
तभी उसने उसे देखा।
सड़क के उस छोर से एक आदमी चला आ रहा था — बिल्कुल सामान्य चाल में, जैसे कुछ हुआ ही न हो। बत्तीस के आसपास की उम्र, भीगा हुआ कुर्ता, कंधे पर चमड़े का थैला। वो रुकी हुई बूँदों के बीच से गुज़र रहा था, एक-एक बूँद को छूता हुआ, मुस्कुराता हुआ।
"तुम... तुम हिल रहे हो," नायरा के मुँह से निकला।
आदमी रुक गया। उसकी आँखों में पहले हैरानी आई, फिर कुछ ऐसा जो बरसों से वहाँ नहीं दिखा था — राहत।
"और तुम भी," उसने कहा। "तीन साल में पहली बार।"
"मैं कबीर हूँ। नीचे, घंटाघर के सामने वाली गली में घड़ियों की मरम्मत की दुकान है — दादा के ज़माने की।" उसने हवा में तैरती छतरी उठाई और नायरा के हाथ में थमा दी। "और तुम वो आर्किटेक्ट हो, जो टावर का सर्वे करने आई हो। मैंने तुम्हें कल शाम बाज़ार में देखा था।"
"ये... ये क्या है? बूँदें क्यों रुक गई हैं?"
कबीर ने ऊपर टावर की ओर देखा। "हर आधी रात, बारह घंटियों के बाद एक तेरहवीं घंटी बजती है। और जब वो बजती है, तो दुनिया एक मिनट के लिए रुक जाती है। बारिश, हवा, कुत्ते, लोग — सब। सिवाय उनके, जो जाग रहे हों।"
"जाग रहे हों मतलब?"
"तीन साल पहले आँधी वाली रात मैं टावर के अंदर मशीन ठीक कर रहा था। बिजली गिरी — और जब मैंने आँखें खोलीं, तो वक़्त थमा हुआ था। तब से हर रात, यही एक मिनट मेरा है।" वो एक पल रुका। "मैंने तीन साल में एक हज़ार से ज़्यादा रातें इस एक मिनट में अकेले जी हैं, नायरा। तुम्हारा नाम मैंने होटल के रजिस्टर में देखा था।"
नायरा ने चारों ओर देखा। जमी हुई दुनिया में सिर्फ़ दो लोग साँस ले रहे थे। अचानक उसे अपनी धड़कन बहुत तेज़ सुनाई दी — या शायद वो कबीर की थी, जो इतना क़रीब खड़ा था कि उसके भीगे कुर्ते की खुशबू आ रही थी।

उस रात के बाद सिलसिला बन गया। हर रात पौने बारह बजे नायरा घंटाघर के सामने वाली गली में पहुँच जाती। बारह घंटियाँ बजतीं — एक, दो... बारह — और फिर वो तेरहवीं घंटी, धीमी, गहरी, जैसे धरती के सीने से उठी हो। दुनिया थम जाती। और कबीर आता — कभी दो समोसे लिए हुए, जो ठहरे वक़्त में भी गर्म रहते, कभी पुरानी घड़ी का कोई पुर्ज़ा दिखाने।
वो जमी हुई बारिश में टहलते। कबीर उसे बताता कि रुके वक़्त में आवाज़ नहीं गूँजती — इसलिए वो फुसफुसाकर बातें करते, चेहरा चेहरे के क़रीब। नायरा बताती कि उसका सर्वे लगभग पूरा हो चुका है — रिपोर्ट में सिर्फ़ एक लाइन बाकी है।
"कौन सी लाइन?" कबीर ने पूछा।
नायरा ने नज़रें झुका लीं। "नगर निगम का आदेश है — टावर के ठोक-तंत्र की मरम्मत करवानी है, ताकि वो सिर्फ़ बारह बजाए। तेरहवीं घंटी एक यांत्रिक खराबी है। मुझे उसे ठीक करना है।"
खामोशी छा गई। ठहरी बूँदों के बीच सिर्फ़ दो धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
"तो," कबीर ने धीरे से कहा, "अगर तुम अपना काम करोगी, तो ये एक मिनट हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा।"
"और अगर न करूँ, तो मेरा काम अधूरा रहेगा।" नायरा की आवाज़ काँप गई। "कबीर, मैं उलझ गई हूँ।"
कबीर ने उसका हाथ थामा। उसका हाथ गर्म था — ठिठुरी हुई रात में एकमात्र गर्म चीज़। "मैंने तीन साल इस एक मिनट में अकेले बिताए हैं। तुम आईं, तो लगा जैसे किसी ने मेरी घड़ी में चाबी भर दी हो।" उसने उसकी आँखों में देखा। "पर मैं तुमसे ये नहीं माँगूँगा कि अपना काम छोड़ दो। फ़ैसला तुम्हारा है, नायरा।"
आख़िरी रात थी — सर्वे की मियाद ख़त्म होने वाली थी। नायरा टावर के ऊपर चढ़ी, कबीर के साथ। नीचे शहर सो रहा था। मशीन-घर में पुराने गियर धीरे-धीरे घूम रहे थे। कबीर ने तेरहवीं घंटी का हथौड़ा दिखाया — एक छोटा-सा अतिरिक्त पुर्ज़ा, जो बारह के बाद एक बार और टकराता था।
"बस इसे हटाना होगा," कबीर ने कहा। "एक पेंच।"
नायरा के हाथ में पेचकश था। आधी रात होने में दो मिनट बाकी थे। उसने पुर्ज़े को देखा, फिर कबीर को — उसकी आँखों में तीन साल का अकेलापन था, और पिछले दस दिनों की वो दस रातें, जो उसकी ज़िंदगी की सबसे ज़िंदा रातें थीं।
बारह बजने में एक मिनट बाकी था।
नायरा ने पेचकश नीचे रख दिया।
"रिपोर्ट में मैं लिखूँगी," उसने कहा, "कि घंटाघर की मशीन बिल्कुल सही है। और तेरहवीं घंटी..." वो मुस्कुराई, "शायद ये शहर की धड़कन है। धड़कन को कौन ठीक करता है?"
तभी पहली घंटी बजी। एक... दो... दोनों टावर की सीढ़ियों पर बैठ गए, कंधे से कंधा मिलाए। बारहवीं घंटी की गूँज थमी — और फिर आई वो तेरहवीं घंटी, धीमी और गहरी।

दुनिया थम गई। बारिश की बूँदें हवा में ठहर गईं। नीचे गली में एक बिल्ली छलाँग के बीच में जम गई।
कबीर ने नायरा का चेहरा अपने हाथों में लिया। उसकी उँगलियाँ उसके गालों पर थीं — गर्म, काँपती हुई। नायरा ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ मिले — धीमे, ठहरे हुए वक़्त में भी धड़कते हुए। बाकी की रात तेरहवीं घंटी ने अपने अंदर छिपा ली।
सुबह नायरा ने रिपोर्ट भेज दी। फिर उसने होटल का कमरा एक महीने और बढ़ा दिया।
अब हर रात पौने बारह बजे, घंटाघर के सामने वाली गली में दो लोग मिलते हैं। दुनिया के लिए वो सिर्फ़ एक मिनट है — पर उस एक मिनट में, उनके पास पूरी उम्र है।
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