काग़ज़ की नाव उल्टी तैरकर उसके पैरों के पास लौट आई — और अर्णव की साँस रुक गई।
बाँसगाँव के घाट पर आधी रात का सन्नाटा था। अर्णव तीस साल का था — इसी घाट पर पला-बढ़ा, इसी नदी पर नाव चलाने वाला। उसने इस नदी को बाढ़ में उफनते देखा था, सूखे में सिमटते देखा था, मगर आज जो देख रहा था, वह उसने कभी नहीं देखा था।
नाव धारा के ख़िलाफ़ चल रही थी — पानी पहाड़ की ओर बह रहा था। और उस पर एक छोटी-सी काग़ज़ की नाव थी, भीगी हुई, मगर अंदर का काग़ज़ अब भी सलामत। अर्णव ने उसे उठाया और खोला। उस पर उसी की लिखावट थी। पाँच साल पुरानी।

घाट पर अर्णव के हाथों में लौट आई काग़ज़ की नाव। (AI generated illustration)
उल्टी बहती नदी
गाँव के बूढ़े कहते थे — हर पूर्णिमा की रात, यह नदी उल्टी बहती है।
“बेटा,” घाट की बूढ़ी दादी कमला कहा करती थी, “यह नदी उन बातों को लौटाती है, जो कभी कही नहीं गईं। जो आदमी अपनी अधूरी बात काग़ज़ की नाव में रखकर इसमें बहा दे, नदी उसे पूर्णिमा की किसी रात वापस ला देती है — उसी के पास, जिसने उसे बहाया था।”
अर्णव ने यह बात हमेशा हँसी में उड़ा दी थी। नदियाँ उल्टी नहीं बहतीं। नदियाँ काग़ज़ नहीं पढ़तीं। मगर आज पूर्णिमा थी, और नदी सचमुच उल्टी बह रही थी।
अर्णव ने काग़ज़ को फिर से पढ़ा। “मेहर, आज रात जो गाना तुमने गाया, वह मेरे लिए था — यह मैं जानता हूँ। और जो बात मैं तुमसे कह नहीं पाया…” — इसके आगे स्याही फैल गई थी।
पाँच साल पुरानी अधूरी बात
पाँच साल पहले, बाँसगाँव के मेले में एक लोकगायिका आई थी — मेहर। सत्ताईस साल की, आवाज़ में ऐसी मिठास कि पूरा मेला चुप होकर सुनने लगा था। वह शहर से एक रात के कार्यक्रम के लिए आई थी। अर्णव ने उसे घाट तक पहुँचाया था, क्योंकि मेले की भीड़ में उसकी गाड़ी फँस गई थी।
रास्ते में बातें हुईं — छोटी-छोटी, मगर ऐसी कि दोनों को लगा, जैसे वे एक-दूसरे को बरसों से जानते हों। मेहर ने पूछा था, “तुम इस नदी को इतना क्यों चाहते हो?” अर्णव ने कहा था, “क्योंकि यह नदी कभी झूठ नहीं बोलती।”
उस रात, जब सब लोग जा चुके थे, अर्णव घाट पर अकेला बैठा था। उसके हाथ में एक काग़ज़ की नाव थी, और उस नाव में एक अधूरी चिट्ठी। उसने उसे नदी में बहा दिया था — इस उम्मीद में कि नदी उसकी अधूरी बात को कहीं दूर ले जाएगी, जहाँ वह किसी को परेशान न करे।
अगली सुबह मेहर शहर लौट गई थी। अर्णव ने उसे रोका नहीं। मगर पाँच साल में वह एक रात उसके दिल से कभी नहीं गई।
पाँच साल बाद, वही घाट
इस बार मेला फिर लगा था। और इस बार मेहर फिर आई थी।
अर्णव को यह बात गाँव के चायवाले से पता चली — “आज रात मेले में वही गायिका आ रही है, जो पाँच साल पहले आई थी।” अर्णव का हाथ चाय के गिलास पर रुक गया।
शाम को घाट पर उसने देखा — सीढ़ियों पर एक औरत खड़ी थी, हाथ में एक छोटा-सा हारमोनियम, आँखों में वही पुरानी चमक। मेहर।
“तुम अब भी इसी घाट पर हो?” उसने पूछा, मुस्कुराते हुए।
“और तुम अब भी इसी सवाल पर हो?” अर्णव ने कहा। दोनों हँस दिए — मगर उस हँसी के नीचे पाँच साल का फ़ासला भी था, और एक अधूरी बात भी।
मेहर ने बताया कि वह इस बार मेले में तीन दिन रहेगी। “पाँच साल पहले मैं एक रात के लिए आई थी, और एक बात अधूरी छोड़ गई थी।”
उस रात मेले में मेहर ने वही गाना गाया — वही, जो उसने पाँच साल पहले गाया था। अर्णव को लगा, जैसे वह गाना सिर्फ़ उसके लिए गाया गया हो।
पूर्णिमा की रात
पूर्णिमा की रात, गाँव के लोग घाट पर जमा हुए। यह गाँव की पुरानी रस्म थी — हर कोई एक काग़ज़ की नाव बनाता, उसमें अपनी कोई अधूरी बात लिखता, और नदी में बहा देता।
मेहर ने भी एक नाव बनाई और धीरे से पानी में रखी। नाव धारा के साथ नीचे की ओर जाने लगी — और फिर, सबकी आँखों के सामने, रुक गई।
पानी ठहरा, फिर उल्टी दिशा में बहने लगा।
नदी सचमुच उल्टी बह रही थी — पानी पहाड़ की ओर। और न जाने कितनी काग़ज़ की नावें धीरे-धीरे ऊपर की ओर तैरने लगीं।
मेहर की नाव भी लौटकर अर्णव के पैरों के पास आ रुकी। अर्णव ने उसे उठाया, खोला — और पढ़ते ही उसकी आँखें भर आईं।
उस पर लिखा था — “अर्णव, पाँच साल पहले मैं एक बात कहे बिना चली गई थी। जो गाना मैंने उस रात गाया था, वह तुम्हारे लिए था। और जो बात मैं तुमसे कह नहीं पाई, वह यह है कि मैं लौटकर आना चाहती थी — हर पूर्णिमा को, इसी घाट पर।”

नदी के किनारे, चाँदनी में एक-दूसरे के क़रीब अर्णव और मेहर। (AI generated illustration)
जो कहा नहीं गया
अर्णव ने अपनी जेब से वह पुरानी नाव निकाली — वही, जो नदी ने उसे कुछ देर पहले लौटाई थी — और मेहर की ओर बढ़ाई। मेहर ने उसे खोला। स्याही से फैले हुए शब्दों के बीच उसे अर्णव की अधूरी बात समझ आ गई।
“तो तुमने भी…” मेहर की आवाज़ भर्रा गई।
“मैंने भी,” अर्णव ने कहा। “हर पूर्णिमा को मैं इसी घाट पर आता था। सोचता था, शायद इस बार तुम लौट आओ।”
“और मैं हर पूर्णिमा को सोचती थी — काश, उस रात मैंने कह दिया होता।”
उस पल घाट पर सिर्फ़ चाँदनी थी, नदी की आवाज़ थी, और दो लोग थे, जो पाँच साल की ख़ामोशी के बाद आमने-सामने खड़े थे। अर्णव ने मेहर का हाथ थाम लिया।
“अब कह दो,” मेहर ने धीरे से कहा। “जो पाँच साल से नहीं कहा, वह अब कह दो। नदी सुन रही है।”
अर्णव ने गहरी साँस ली। “मेहर, मैं तुम्हें उस रात से ही चाहता हूँ। और हर पूर्णिमा को मैंने इसी घाट पर तुम्हारा इंतज़ार किया है। अगर तुम चाहो, तो यह इंतज़ार आज ख़त्म हो सकता है।”
मेहर की आँखों से आँसू बह निकले। उसने अर्णव के हाथ को और कसकर पकड़ लिया। “और मैं हर पूर्णिमा को तुम्हारे बारे में सोचती रही,” उसने कहा। “मुझे लगा था, एक रात की मुलाक़ात को इतना बड़ा क्यों बनाना? मगर वह एक रात मेरी सबसे बड़ी सच्चाई बन गई।”
दोनों की साँसें एक-दूसरे के क़रीब आ गईं। चाँदनी में, नदी के किनारे, अर्णव ने मेहर के चेहरे को अपने हाथों में लिया। मेहर ने अपनी आँखें बंद कर लीं, और अर्णव ने उसके माथे को चूम लिया। फिर दोनों एक-दूसरे की बाँहों में समा गए, जैसे पाँच साल का फ़ासला एक ही पल में मिट गया हो।
और तभी, नदी ने करवट ली। पानी फिर से अपनी दिशा में बहने लगा — नीचे की ओर। अर्णव और मेहर की दोनों नावें साथ-साथ तैर रही थीं — एक-दूसरे से सटी हुई।
घाट पर खड़ी बूढ़ी दादी कमला मुस्कुरा दी। “नदी ने अपना क़र्ज़ चुका दिया। जब अधूरी बात पूरी हो जाती है, तो नदी फिर से सीधी बहने लगती है।”

उल्टी बहती नदी पर तैरती रोशन काग़ज़ की नावें। (AI generated illustration)
उस रात के बाद, घाट पर हर पूर्णिमा की रात दो लोग अब भी एक साथ बैठते हैं — हाथ में हाथ, नदी के किनारे। अर्णव अब भी नाव चलाता है। मेहर अब भी गाती है। मगर अब उनके गाने में कोई अधूरी बात नहीं होती।
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