जिस रात शानाया ने पहला दिया चाक पर उतारा, उसके भीतर किसी और के हाथ का निशान था — और वो हाथ उसका नहीं था।
खुर्जा की तंग गली में नानाजी की वर्कशॉप छह साल से बंद पड़ी थी। ताले पर ज़ंग, आँगन में धूल, और बीचोंबीच वो चाक — साठ साल पुराना, लकड़ी का, जो एक ही जगह इतने सालों से रखा था जैसे वक़्त को वहीं रोक रखा हो।
सत्ताईस साल की शानाया दिल्ली की डिज़ाइन नौकरी छोड़कर आई थी।
लोगों ने कहा था — पागल हो गई है।
उसने कहा था — मिट्टी बुला रही है।
पहले तीन दिन सिर्फ़ सफ़ाई में गए। मकड़ी के जाले, सूखी मिट्टी के ढेर, नानाजी के औज़ार — हर चीज़ पर छह साल की ख़ामोशी जमी थी। चौथे दिन चौंसठ साल की जानकी आई — नानाजी के ज़माने की ग्लेज़ मिलाने वाली, जो छह साल से हर हफ़्ते आकर दरवाज़े पर दिया जला जाती थी।
"तेरे नानाजी कहते थे," जानकी ने चाक पर हाथ फेरते हुए कहा, "ये चाक जिसके दिल में बस जाए, उसके हाथ मिट्टी में उतार देता है।"
शानाया हँस दी थी। उस वक़्त उसे नहीं पता था कि ये हँसी उसे कितनी महँगी पड़ेगी।
पहली रात उसने चाक चलाया — आधी रात के बाद, जब गली सो चुकी थी।
पहिया घूमा। मिट्टी गीली थी, नरम, ज़िंदा। उसके हाथों ने दिए का आकार लिया — गोल, नाज़ुक, बिल्कुल नानाजी जैसा।
और जब उसने दिया उठाकर देखा, तो साँस रुक गई।
दिए के भीतर — अंदरूनी घुमाव पर — किसी अँगूठे का निशान था। फिर चार उँगलियों के। जैसे किसी ने मिट्टी के भीतर हाथ डालकर उसके हाथों को सहारा दिया हो।
उसने अपने हाथ देखे। उसके निशान छोटे थे, नाज़ुक। ये किसी मर्द के थे — चौड़ी हथेली, लंबा अँगूठा।
"जानकी?" उसने सुबह पूछा। "कल रात तुम आई थीं?"
जानकी ने सिर हिलाया। "मैं रात को नहीं आती, बिटिया।"
शानाया ने वो दिया भट्टी में रखा। आग में निशान मिट जाने चाहिए थे — पर नहीं मिटे। ग्लेज़ में वो और गहरे उतर आए, जैसे कोई परछाईं जो आग से भी नहीं डरती।
दूसरी रात — सुराही। वही हाथ।
तीसरी रात — कटोरा। वही हाथ।
चौथी रात दरवाज़े पर दस्तक हुई।
इकतीस साल का युग खड़ा था — बग़ल वाली वर्कशॉप का भट्टी-मिस्त्री। कंधे चौड़े, हाथों पर राख के निशान, आँखों में नींद से ज़्यादा सवाल।
"बड़ी भट्टी जलाने से पहले चिमनी देखनी पड़ेगी," उसने कहा। "नानाजी के ज़माने से मैं ही देखता आया हूँ।"
शानाया ने उसे अंदर बुलाया। चाय बनी। बातें हुईं — मिट्टी की, आग की, खुर्जा की।
और फिर युग की नज़र उस दिए पर पड़ी।
वो एकदम चुप हो गया।
"ये निशान..." उसने दिया उठाया, रोशनी में घुमाया, "तुमने बनाए?"
"नहीं," शानाया बोली। "ये तो... अपने आप।"
युग ने कुछ नहीं कहा। पर उसकी उँगलियाँ दिए पर काँप रही थीं।
अगले हफ़्ते युग हर शाम आता। बड़ी भट्टी की मरम्मत, चिमनी की सफ़ाई, लकड़ी का इंतज़ाम।
शामें चाय पर कटतीं। युग बताता — कौन-सी मिट्टी कब टूटती है, आग को कैसे "सुनना" चाहिए, भट्टी के मुँह से निकलती लौ का रंग क्या कहता है। शानाया बताती — दिल्ली की नौकरी, टूटी सगाई, वो मंगेतर जो चाहता था कि वो मिट्टी छोड़कर "सेटल" हो जाए।
"तो तुम भागकर आई हो?" युग ने एक शाम पूछा।
"नहीं," शानाया ने कहा, चाय की भाप में देखते हुए। "मैं लौटकर आई हूँ।"
रातों को वो चाक चलाती — और हर बार, मिट्टी में वही हाथ।
उसने नाप-जोख शुरू की। दिए की तस्वीरें, निशानों के स्केच। जानकी के हाथ मिलाए — नहीं मिले। पुराने कारीगरों के — नहीं मिले।
एक दिन उसने वर्कशॉप के पुराने मिट्टी के डिब्बे का ढक्कन उठाया — उस पर नानाजी के हाथ का निशान था, सालों पुराना, धूल में दबा।
मिलाया। नहीं मिला।
"नानाजी के बाद इस चाक को किसी ने नहीं छुआ, बिटिया," जानकी ने कहा था। "छह साल से।"
तो फिर ये हाथ किसके थे? किसी ज़िंदा के? या किसी...?
उस रात वो सो नहीं पाई। चाक अँधेरे में खड़ा था — ख़ामोश, पर जैसे कुछ कह रहा हो।
अगली शाम, मिट्टी गूँथते वक़्त युग ने एक तकनीक दिखाने के लिए गीली स्लैब पर हाथ रखा।
शानाया की नज़र उसके हाथ पर टिकी रह गई।
चौड़ी हथेली। लंबा अँगूठा।
उसने मज़ाक में उसका हाथ पकड़कर स्लैब पर दबा दिया — "रुको, एक टेस्ट।"
और फिर उसकी साँस रुक गई।
स्लैब पर उभरा निशान — हूबहू वही, जो हर रात मिट्टी में उतरता था। एक-एक रेखा, एक-एक घुमाव।
ख़ामोशी। सिर्फ़ चाक की घरघराहट।
"युग..." उसकी आवाज़ काँप गई। "ये हाथ... हर रात मेरी मिट्टी में होते हैं।"
युग ने दिया उठाया। अपने हाथ से मिलाया।
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "ये... मेरे हाथ हैं?"
उसी रात जानकी आई। शानाया ने सब बताया — निशान, स्लैब, युग के हाथ।
जानकी देर तक चुप रही। फिर धीरे से बोली —
"जिस साल तेरे नानाजी को तेरी नानी से इश्क़ हुआ था, उस साल इस चाक पर हफ़्तों तक किसी औरत के हाथों के निशान उतरते रहे। नानाजी ने किसी को नहीं बताया था — पर चाक ने बता दिया था।"
"मतलब?"
"मतलब ये, बिटिया — पहिया हाथ नहीं देखता। पहिया दिल देखता है।"
शानाया के सीने में कुछ धड़का।
पहली रात से — पहली ही रात से — ये हाथ मिट्टी में थे। तब तो युग से उसकी ठीक से बात भी नहीं हुई थी।
चाक को उससे पहले पता था। उससे पहले — वो खुद जानती।
उस रात भट्टी जल रही थी। नारंगी रोशनी में युग का चेहरा — राख, पसीना, और आँखों में वही सवाल जो अब सवाल नहीं रहा था।
"तुम्हें कब पता चला?" शानाया ने फुसफुसाते हुए पूछा।
"जिस शाम तुमने चिमनी के पास खड़े होकर कहा था — 'मैं लौटकर आई हूँ,'" युग बोला। "उस शाम।"
वो एक क़दम आगे बढ़ा। उसके हाथ — मिट्टी से सने, उन्हीं हाथों — ने उसका चेहरा थाम लिया।
उनकी साँसें मिलीं — मिट्टी, आग, और रात की ख़ुशबू। जब उनके होठ मिले, तो लगा भट्टी की आग ने भी एक पल को साँस रोक ली हो।
आगे जो हुआ, वो सिर्फ़ उनका था — आग धीरे-धीरे सुलगती रही, और सुबह तक सिर्फ़ मिट्टी की ख़ुशबू बची।
सुबह भट्टी खोली — सारे बर्तन साबुत। बीच में दो सुराहियाँ, कंधे से कंधा मिलाए, जैसे रात भर एक-दूसरे को थामे रही हों।
जानकी ने देखा, मुस्कुराई, और कुछ नहीं कहा।
एक साल बाद।
खुर्जा की उसी गली में अब दो नामों की तख़्ती है। हर आधी रात को बनने वाले बर्तनों में दो जोड़ी हाथों के निशान होते हैं — एक जोड़ी शानाया की, एक युग की।
ग्राहक इसे "जोड़े का निशान" कहते हैं। दाम दोगुना मिलता है।
और वो चाक... अब उस पर कोई अनजान निशान नहीं उतरता।
क्योंकि अब चाक ख़ामोश है — इंतज़ार ख़त्म हो गया।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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