संगीत-बक्सा आधी रात को ठीक बारह बजकर तैंतीस मिनट पर बज उठा — और सानवी की आँख उसी धुन पर खुली, जो उसने अपनी ज़िंदगी में कभी सुनी ही नहीं थी।
वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। कमरे में घुप्प अँधेरा था, खिड़की के बाहर धूपछाँव की पहाड़ियाँ चाँदनी में नहाई हुई थीं। धुन बक्से के अंदर से आ रही थी — शीशम की लकड़ी का वो पुराना बक्सा, जो दोपहर को उसने दादी की अलमारी के सबसे नीचे वाले खाने से निकाला था। ढक्कन खुला था, और उसके ऊपर सोने की दो छोटी-छोटी मूर्तियाँ — एक नाचता हुआ जोड़ा — धीरे-धीरे घूम रही थीं।
सानवी अट्ठाईस साल की थी, मुंबई में वेडिंग फोटोग्राफर। दादी के गुज़रने के तीन महीने बाद वह पहली बार धूपछाँव आई थी — पुराना घर समेटने, कागज़ात निपटाने, और घर बेचने। बक्से पर दादी की लिखावट में एक पर्ची चिपकी थी: "इसे कभी बेचना मत। ये किसी का इंतज़ार कर रहा है।"
धुन तीन मिनट तैंतीस सेकंड चली — सानवी ने मोबाइल में टाइमर लगाया था — और फिर ठीक एक अधूरी-सी जगह पर रुक गई, जैसे कोई वाक्य बीच में ही तोड़ दिया गया हो। बक्से की चाबी तो मुड़ी हुई थी। बिना चाबी घुमाए वो बज कैसे रहा था?
आधी रात की धुन
अगली रात सानवी ने बक्सा अपने तकिए के पास रखा। बारह बजकर तैंतीस मिनट — धुन फिर बजी। इस बार उसने मोबाइल में रिकॉर्डिंग ऑन की। सुबह जब उसने रिकॉर्डिंग सुनी, तो उसमें सिर्फ़ सन्नाटा था। खिड़की की सरसराहट थी, उसकी अपनी साँसों की आवाज़ थी — धुन नहीं थी। जैसे वो धुन किसी ऐसी दुनिया से आ रही हो, जो रिकॉर्ड नहीं होती।
और हर रात वही सपना। एक बड़ा-सा शीशमहल-जैसा हॉल, झूमरों की रोशनी, और बीचोंबीच एक नाचता हुआ जोड़ा। एक आदमी — चेहरा धुंधला — अपना हाथ बढ़ाता, और सानवी जैसे ही उसका हाथ थामने को होती, आँख खुल जाती। ठीक तीन बजकर तैंतीस मिनट पर।
एक दोपहर उसने बक्से की चाबी घुमाकर देखा। दिन में वो एक मामूली-सी धुन बजाता — वही धुन, लेकिन उसी अधूरे मोड़ पर रुककर। फर्क सिर्फ़ इतना था कि दिन में चाबी घुमानी पड़ती थी; रात को वो ख़ुद बज उठता था।
अधूरी धुन का राज़
बाज़ार में "रेयान क्लॉक एंड म्यूज़िक हाउस" की दुकान पर जब सानवी ने बक्सा काउंटर पर रखा, तो इकतीस साल के रेयान के हाथ एक पल को ठिठक गए।
"ये... ये तो बड़ी ठकुराइन वाला बक्सा है," उसने धीरे से कहा। "मेरे दादाजी ने इसकी मरम्मत की थी, चालीस साल पहले।"
रेयान ने जो कहानी सुनाई, वो धूपछाँव की सबसे पुरानी प्रेम कहानी थी। बड़ी ठकुराइन रत्ना देवी और एक ग़रीब नौजवान वायलिन-वादक मुरली। मुरली ने ये बक्सा अपने हाथों से बनाया था — शीशम की लकड़ी, अंदर सोने का नाचता जोड़ा, और एक धुन जो उसने रत्ना के लिए ही रची थी। दोनों ने तय किया था कि शहर के स्थापना-दिवस वाले समारोह की रात वो इस धुन पर सबके सामने नाचेंगे — और फिर उसी रात शहर छोड़कर चले जाएँगे।
"लेकिन उस रात हवेली के फाटक बंद कर दिए गए," रेयान ने कहा। "मुरली बारिश में फाटक के बाहर खड़ा रहा — सुबह तक। रत्ना कभी बाहर नहीं आई। वो शहर छोड़कर चला गया। और ये बक्सा... तब से हर आधी रात को ख़ुद बजता है। उसी अधूरे मोड़ पर थमकर। जैसे वो नाच आज भी पूरा होने का इंतज़ार कर रहा हो।"
"तुम्हारे दादाजी को पूरी धुन आती थी?" सानवी ने पूछा।
रेयान मुस्कुराया — एक उदास-सी मुस्कान। "आधी। बाक़ी आधी वो भी नहीं जानते थे। कहते थे — बाक़ी आधी उस बारिश वाली रात के साथ चली गई।"
चालीस साल पुराना इंतज़ार
उस शाम सानवी ने दादी की पुरानी डायरी खोली। एक पन्ने पर लिखा था: "रत्ना दीदी ने कहा था — बक्सा उसी को देना जो नाच पूरा कर सके।"
सानवी का दिल धड़का। दादी रत्ना देवी की सहेली थीं — बक्सा दादी के पास ऐसे ही नहीं आया था।
अगले दो दिन सानवी और रेयान बक्से के चक्कर में बार-बार मिले। वो दुकान पर बक्से का अटका हुआ पुर्ज़ा ठीक करता, और सानवी देखती रह जाती — उसके हाथों की सफ़ाई, उसके माथे पर आया पसीना, धुन के बारे में बात करते हुए उसकी आँखों की चमक। एक बार पुर्ज़ा पकड़ाते हुए उनकी उँगलियाँ छू गईं, और दोनों ने जल्दी से हाथ खींच लिए — लेकिन उस छुअन की गर्मी देर तक बनी रही।
रात को सपने में वो धुंधला चेहरा अब साफ़ होने लगा था। वो मुरली नहीं था। वो... रेयान था।
उस रात सानवी ने रेयान से कहा, "मेरे पास तीन दिन हैं। परसों घर का सौदा पक्का हो जाएगा, और मैं मुंबई लौट जाऊँगी।"
रेयान ने बक्से को देखा, फिर उसे। "तो फिर हमारे पास सिर्फ़ तीन आधी रातें हैं।"
आख़िरी धुन, पहला नाच
आख़िरी रात। दादी के घर का आँगन चाँदनी में डूबा था। सानवी ने बक्सा पत्थर की चौकी पर रखा। रेयान अपने दादाजी का पुराना वायलिन लाया था — वही वायलिन, जिस पर मुरली ने कभी वो आधी धुन बजाई थी।
बारह बजकर तैंतीस मिनट। बक्सा ख़ुद बज उठा।
और जैसे ही धुन उस अधूरे मोड़ पर पहुँची — जहाँ चालीस साल से हर रात वो थम जाती थी — रेयान ने वायलिन उठाया। उसके दादाजी की सुनाई आधी धुन, उसकी अपनी कल्पना से जुड़ी बाक़ी आधी — वो बजाता चला गया। धुन पूरी हुई। पहली बार, चालीस साल में पहली बार, वो धुन पूरी हुई।
बक्से के ऊपर सोने का नाचता जोड़ा अपना आख़िरी घुमाव पूरा करके रुक गया — जैसे उसने भी अपना इंतज़ार पूरा कर लिया हो। आँगन में चाँदनी नाचने लगी, हवा में न जाने कहाँ से फूलों की पंखुड़ियाँ उड़ने लगीं।
रेयान ने अपना हाथ बढ़ाया। सानवी ने थाम लिया।
वो नाचे — उस धुन पर जो चालीस साल से अधूरी थी। उसका हाथ उसकी कमर पर था, उसकी साँसें उसके गालों को छू रही थीं। नाचते-नाचते वो रुके, आँखों में आँखें डालीं। उस पल में चालीस साल का इंतज़ार, तीन रातों के सपने, और दो दिलों की धड़कनें — सब एक हो गए।
उसने उसके माथे को चूमा। फिर उसके होंठों को। और चाँदनी ने अपनी चादर उन दोनों पर डाल दी।
सुबह जब सानवी की आँख खुली, तो बक्सा ख़ामोश था। उसने चाबी घुमाई — दिन वाली मामूली धुन बजी, पूरी। लेकिन आधी रात वाली वो ख़ुद-ब-ख़ुद बजने वाली धुन — वो फिर कभी नहीं बजी। क्योंकि अब उसे किसी का इंतज़ार नहीं था।
सानवी ने घर बेचने का इरादा रद्द कर दिया। और "रेयान क्लॉक एंड म्यूज़िक हाउस" के बोर्ड पर एक नई लाइन जुड़ गई: "अधूरी धुनें यहाँ पूरी की जाती हैं।"
(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।)
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