(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।)
पूर्णिमा की रात, जब चाँद पहाड़ी के ठीक ऊपर आकर ठहर गया, गाँव के बाहर पुराने पीपल के नीचे एक सफ़ेद घोड़ा खड़ा था — बिना सवार के, बिना लगाम के। उसकी अयाल में चाँदनी इस तरह अटकी हुई थी, जैसे किसी ने चाँद का एक महीन टुकड़ा उसके बालों में बाँध दिया हो।
नैना ने साँस रोक ली। वह छब्बीस साल की थी, और गाँव के छोटे-से स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी। तीन पूर्णिमाओं से वह यही दृश्य देख रही थी — हर बार घोड़ा उसी पीपल के नीचे, उसी जगह, उसी तरह खड़ा मिलता था, और हर बार भोर होते ही ग़ायब हो जाता था। गाँव के लोग उसकी बात पर हँस देते थे। उसकी दादी, जो अब अस्सी पार कर चुकी थीं, सिर्फ़ इतना कहती थीं, "बेटा, कुछ चीज़ें सिर्फ़ उसी को दिखती हैं, जो उन्हें देखने के लिए रुक जाए।"
चौथी पूर्णिमा की रात नैना रुकी। वह पीपल के नीचे नहीं गई — दूर, पत्थर की मुँडेर पर बैठकर इंतज़ार करती रही। आधी रात के बाद घोड़े ने सिर उठाया, उसकी तरफ़ देखा, और धीरे-धीरे चलकर उसके पास आ गया। उसकी आँखें इतनी शांत थीं कि नैना को डर नहीं लगा। उसने हाथ बढ़ाया, और घोड़े ने अपना गर्म माथा उसकी हथेली से छुआ लिया। उसी पल नैना को लगा, जैसे यह जानवर उसे जानता हो — बहुत पहले से, किसी भूली हुई याद की तरह।
खुरों के निशान पर खिले फूल
अगली सुबह नैना ने देखा कि जहाँ-जहाँ घोड़े के खुर पड़े थे, वहाँ छोटे-छोटे सफ़ेद फूल खिल आए थे — ऐसे फूल, जो गाँव में और कहीं नहीं उगते थे। सूरज चढ़ते ही वे मुरझा गए, जैसे कभी थे ही नहीं।
वह हर रात पीपल के नीचे जाने लगी, हालाँकि घोड़ा सिर्फ़ पूर्णिमा को आता था — उसका इंतज़ार हर रात का हो गया था। पूर्णिमा की रात वह घोड़े से बातें करती थी, जैसे वह कोई पुराना दोस्त हो — स्कूल के बच्चों की शरारतों की, दादी की खाँसी की, पहाड़ों के उस पार की दुनिया की। घोड़ा चुपचाप सुनता था, कभी-कभी गर्दन झुकाकर, जैसे हर बात समझ रहा हो।
पाँचवीं पूर्णिमा की रात, जब नैना पीपल के नीचे खड़ी थी, धुंध के बीच से एक साया उभरा। घोड़े की बगल में एक आदमी खड़ा था — लंबा, शांत, तीस के आसपास की उम्र। उसके कपड़े साधारण थे, पर उसकी चाल में एक अजीब ठहराव था, जैसे वह जल्दी करना भूल गया हो।
"तुम हर पूर्णिमा को आती हो," उसने धीरे से कहा। "घोड़ा तुम्हारा इंतज़ार करता है।"
नैना का दिल तेज़ी से धड़क उठा। "और तुम कौन हो?" उसने पूछा।
"विहान," उसने कहा। "मैं घाटी के उस पार रहता हूँ। घोड़ों को सँभालता हूँ। पर यह घोड़ा मेरा नहीं है — यह सिर्फ़ मेरे साथ चलता है। रास्ता यह खुद चुनता है।"
अजनबी सवार का सच
विहान ने बताया कि नूर — यह नाम उसे अपने दादा से मिला था — दिन की रोशनी में चलने से इनकार कर देता है। सूरज निकलते ही वह ठिठक जाता है, जैसे रोशनी उसे भारी लगती हो। सिर्फ़ चाँदनी में उसके कदम हल्के हो जाते हैं। विहान ने उसे घाटी के उस पार के अस्तबल में पाया था, एक सुबह, बिना किसी निशान के — पर घोड़ा उसे सीधे पहाड़ी दर्रे की तरफ़ ले आया था, जैसे रास्ता उसे पहले से याद हो।
"तुम्हें डर नहीं लगता?" नैना ने पूछा।
विहान मुस्कुराया। "पहले लगता था। फिर मैंने देखा कि वह सिर्फ़ उन्हीं घरों के सामने रुकता है, जहाँ कोई उसका इंतज़ार कर रहा हो।"
उनकी बातें लंबी होती गईं। विहान ने बताया कि वह भी अकेला रहता है, और उसे किताबों से ज़्यादा घोड़ों की ख़ामोशी पसंद है। नैना ने बताया कि वह भी अकेली है — दादी के सिवा उसका कोई नहीं, और गाँव में हर कोई उसकी शादी की चिंता करता है, सिवा उसके।
फिर एक रात विहान ने एक पुरानी बात छेड़ दी। "तुम्हारी दादी ने कभी किसी सफ़ेद घोड़े का ज़िक्र किया है?"
नैना चौंकी। दादी ने बचपन में एक कहानी सुनाई थी — एक ऐसे सवार की, जो हर पूर्णिमा को पहाड़ी दर्रा पार करके आता था, और एक लड़की से मिलकर लौट जाता था। नैना ने उसे बचपन की कल्पना समझकर भुला दिया था।
अगली पूर्णिमा को नैना विहान को अपने घर ले गई। दादी ने नूर को देखा, और उनके हाथ काँपने लगे। उन्होंने घोड़े के माथे पर हाथ फेरा — वहाँ एक छोटा-सा तारे जैसा निशान था। दादी की आँखों में आँसू आ गए।
"नूर," दादी ने धीरे से कहा। "तुम लौट आए।"
दादी ने बताया — धीरे-धीरे, रुक-रुककर — कि पचास साल पहले एक सफ़ेद घोड़ा इसी आँगन में आता था। उस पर सवार होकर नैना के दादा आते थे, जो तब घाटी के उस पार रहते थे। हर पूर्णिमा को वह दर्रा पार करते थे, दादी से मिलते थे, और भोर से पहले लौट जाते थे। फिर एक सर्दी में दादा बीमार पड़े, और घोड़ा आना बंद हो गया।
"पर तुम..." दादी ने विहान की तरफ़ देखा। "तुम किसके बेटे हो?"
विहान ने धीरे से कहा, "दादा के सबसे अच्छे दोस्त के पोते का। दादा ने जाते-जाते उनसे कहा था कि अगर नूर कभी लौटे, तो उसे उसी आँगन तक पहुँचा देना, जहाँ उसकी कहानी शुरू हुई थी।"
नैना की आँखें भर आईं। घोड़ा दादी की अधूरी कहानी को पूरा करने आया था — और रास्ते में वह खुद नैना की कहानी बन गया था।
जब भोर ने नियम तोड़ दिया
उसी रात विहान ने एक बात और बताई, जो उसने अब तक छिपा रखी थी। "नूर सिर्फ़ एक नियम मानता है," उसने कहा। "वह भोर से पहले लौट जाता है। अगर कोई सवार भोर तक उसके साथ रहा, तो वह फिर कभी नहीं लौटेगा। इसलिए मैं हर बार अकेला लौटता हूँ।"
नैना समझ गई कि यह उनकी आख़िरी पूर्णिमा हो सकती है — या पहली। विहान के जाने का वक़्त क़रीब था, और चाँद धीरे-धीरे पहाड़ी के पीछे उतर रहा था।
पीपल के नीचे, चाँदनी में, विहान ने नैना का चेहरा अपने हाथों में लिया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, और नैना की साँसें तेज़ थीं। वह उसे देखती रही — उस आदमी को, जो चाँदनी के साथ आया था, और जिसके बिना अब चाँदनी अधूरी लगती थी। फिर उनके होंठ मिले — धीरे, गहरे, और इतने सच्चे कि नैना को लगा, जैसे उसके दिल की हर धड़कन का जवाब उसे मिल गया हो। उस रात की कहानी वहीं, चाँदनी में ही रह गई।
भोर की पहली किरण फूटी, तो विहान ने नूर की लगाम थामी। नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया — और नहीं छोड़ा। "मैं भी चलूँगी," उसने कहा। "अगर नियम टूटता है, तो टूटे।"
विहान ने उसे घोड़े पर बैठने में मदद की, और खुद उसके पीछे बैठ गया। नूर ने आसमान की तरफ़ देखा — फिर दर्रे की तरफ़ कदम बढ़ा दिए। सूरज निकल आया, पर नूर ग़ायब नहीं हुआ। उसके खुरों के निशान पर खिले सफ़ेद फूल इस बार मुरझाए नहीं — वे धूप में भी खिले रहे, पूरे रास्ते, गाँव से दर्रे तक।
दादी आँगन में खड़ी मुस्कुरा रही थीं। कुछ प्रेम कहानियाँ पचास साल बाद भी पूरी हो सकती हैं — कभी दादी की, कभी पोती की।
(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।)
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