बारिश की पहली बूंद आँगन की धूल पर गिरी, और उसी पल हवेली के पुराने नीम के नीचे एक मोर उतरा — इतना बड़ा, इतना नीला, जैसे आसमान का कोई टुकड़ा ज़मीन पर आ गिरा हो।
मेहर की साँस रुक गई।
वो रात जब आँगन में आसमान उतर आया
जयपुर की चांदपोल वाली हवेली में मेहर तीन साल बाद लौटी थी — बेचने के काग़ज़ पर दस्तख़त करने। अट्ठाईस साल की मेहर लघु-चित्रों की पुनर्स्थापना का काम करती थी; पुरानी चीज़ों को सँवारना उसका पेशा था, पर अपनी जड़ों को सँवारने की हिम्मत उसमें कभी नहीं हुई थी।
उस शाम बादल इतने नीचे थे कि लगता था हवेली की छत को छू लेंगे। भानू काका — सत्तर साल के पुराने रखवाले — ने आँगन में दो दिए जला दिए थे। "पहली बारिश की रात है बिटिया," उन्होंने कहा, "आज रात आँगन में कोई मेहमान आएगा।"
मेहर हँसी थी। "बारिश में कौन आएगा, काका?"
और तभी वो उतरा।
मोर ने अपने पंख फैलाए, और मेहर ने देखा — पंखों की हर आँख में दीये की लौ झिलमिला रही थी। पर एक आँख में कुछ और था। मेहर आगे झुकी। पंख की उस आँख में — जैसे पानी की सतह पर — एक चेहरा था। किसी अजनबी का चेहरा। एक युवक, बारिश में भीगा हुआ, जिसकी आँखों में वही हैरानी थी जो इस वक़्त मेहर की आँखों में थी।
मेहर का दिल धड़क उठा। उसने पलक झपकी — चेहरा ग़ायब। मोर ने पंख समेटे, एक बार उसकी ओर देखा, और नीम की डाल पर जा बैठा। सुबह तक उसका कोई निशान नहीं था — सिवाय आँगन में पड़े एक मोर-पंख के।

भानू काका की कहानी
मेहर ने पंख उठाया। उसकी डंडी पर कुछ लिखा था — पुरानी स्याही से, किसी औरत के हाथ की लिखावट में: "जो पहली बारिश में आए, वो आख़िरी सावन तक रहे।"
"ये किसने लिखा है, काका?"
भानू काका की आँखें नम हो आईं। "तुम्हारी दादी ने। सन् बासठ में।"
उन्होंने बताया — इस हवेली में हर साल पहली बारिश की रात एक मोर आता है। वही मोर, या उसकी औलाद — कोई नहीं जानता। वो अपने पंखों में उसका चेहरा दिखाता है जो आने वाला होता है। "तुम्हारी दादी ने भी उसी मोर के पंखों में तुम्हारे दादा का चेहरा देखा था। उसी रात वो इस हवेली के दरवाज़े पर आए थे — बारिश में भीगे, रास्ता भटके हुए।"
मेहर के हाथ काँपने लगे। "और फिर?"
"फिर? फिर उन्होंने ये हवेली कभी नहीं छोड़ी।"
उस रात मेहर ने दादी की पुरानी डायरी खोली — बासठ की सावन की एंट्री: "आज मोर ने पंख फैलाए। उसकी आँखों में मैंने उसे देखा। भगवान करे वो सच में आए।" अगले पन्ने पर, दूसरे दिन की तारीख़ के नीचे सिर्फ़ एक लाइन थी: "वो आए।"
जो पहली बारिश में आए
अगली सुबह दरवाज़े पर दस्तक हुई। मेहर ने खोला — और उसकी साँस थम गई।
दरवाज़े पर एक युवक खड़ा था। इकतीस-बत्तीस का, बारिश की रात की धूल-मिट्टी से सना, कंधे पर कैमरे का बैग। वही चेहरा — पंख की आँख वाला चेहरा।
"माफ़ कीजिएगा," उसने कहा, "मेरा नाम अर्जुन है। मैं वन्यजीव फ़ोटोग्राफ़र हूँ। कल रात तूफ़ान में मेरी जीप पास की गली में फँस गई। एक वनरक्षक ने बताया था कि इस हवेली में पहली बारिश की रात कोई ख़ास मोर आता है... मैं बस एक झलक देखना चाहता था।"
मेहर के होंठों से निकला, "आप कल रात आए थे... मेरे पंखों में।"
अर्जुन चौंका। "जी?"
मेहर ने उसे अंदर बुलाया, चाय बनाई, और सब बता दिया — मोर, पंखों की आँख, दादी की डायरी, डंडी पर लिखी लाइन।
अर्जुन चुपचाप सुनता रहा। फिर उसने अपने बैग से एक पुराना फ़ोटो निकाला — एक मोर का, पंख फैलाए, बारिश में। "तीन साल से मैं इस मोर के पीछे हूँ," उसने धीमी आवाज़ में कहा। "हर सावन, हर पहली बारिश। ये कभी एक ही जगह दोबारा नहीं दिखा... सिवाय इस हवेली के।"

उनकी आँखें मिलीं, और आँगन में हवा ठहर सी गई। अर्जुन की उँगलियाँ चाय के प्याले पर थीं; मेहर की नज़र उन उँगलियों पर टिक गई, फिर उसकी आँखों पर। कुछ अनकहा, कुछ अनसुना — दोनों के बीच एक डोर खिंच गई, जो बारिश की बूंदों से भी पतली और लोहे से भी मज़बूत थी।
"आप रुकेंगे?" मेहर ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो कँपकँपी थी जो सिर्फ़ सच बोलते वक़्त आती है।
"अगर आप कहें तो," अर्जुन ने कहा, "मैं इस सावन को कहीं नहीं जाऊँगा।"
आख़िरी सावन तक
शाम को बादल फिर घिर आए। भानू काका ने आँगन में दिए जलाए — इस बार चार।
बारिश शुरू हुई, और नीम की डाल से वो उतरा। मोर ने पंख फैलाए — और इस बार पंखों की आँखों में एक नहीं, दो चेहरे थे। मेहर और अर्जुन — साथ।
अर्जुन ने मेहर का हाथ थामा। बारिश की बूंदें उनके चेहरों पर थीं, दीयों की लौ उनकी आँखों में। मोर नाचा — पंखों की झंकार में सावन की पूरी कहानी थी।
"तुम्हारी दादी ने सही लिखा था," अर्जुन ने फुसफुसाते हुए कहा।
"क्या?" मेहर की साँस तेज़ थी।
"जो पहली बारिश में आए..." उसने मेहर के चेहरे को अपने हाथों में लिया, "...वो आख़िरी सावन तक रहे।"
उनके होंठ मिले — बारिश, दीये, मोर-पंख और सावन की ख़ुशबू के बीच। फिर दुनिया धुंधली हो गई, और कहानी पर्दे के पीछे चली गई।

अगली सुबह मेहर ने बेचने के काग़ज़ फाड़ दिए। हवेली अब बिकेगी नहीं — सँवरेगी। उसके हाथों से। और हर सावन, पहली बारिश की रात, आँगन में दो दिए नहीं — चार जलेंगे।
क्योंकि कुछ कहानियाँ काग़ज़ पर नहीं, पंखों की आँखों में लिखी जाती हैं।
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।
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