मेला खत्म हुए दो घंटे हो चुके थे, मगर उसकी दुकान पर अब भी दिया जल रहा था।
मेहर ने घड़ी देखी — ग्यारह बजकर चालीस मिनट। मैदान लगभग खाली था। झूले थम चुके थे, चाट की ठेलियों पर तिरपाल पड़ रहे थे, और हवा में भुनी मूँगफली की आख़िरी महक तैर रही थी। मगर गली के उस पार, नीले मखमल के पर्दों से घिरी एक दुकान की अलमारियों में कतारबद्ध शीशे की बोतलें अब भी जगमगा रही थीं — नीली, सुनहरी, हरी — जैसे किसी ने तारों को तोड़कर बोतलों में बंद कर दिया हो।
तख़्ती पर लिखा था — "ख़्वाबों की दुकान"।
मेहर हँस पड़ी। छब्बीस की उम्र में वो ख़्वाबों पर यकीन करना कब का छोड़ चुकी थी। फिर भी उसके क़दम उस ओर बढ़ गए, जैसे कोई अदृश्य धागा उसे खींच रहा हो।
दुकान के पीछे एक लड़का खड़ा था — सत्ताईस के आसपास, सादा कुर्ता, आँखों में ऐसी गहराई जैसे रात का समंदर। उसने बिना पूछे एक नीली बोतल उठाई और मेहर की ओर बढ़ा दी।
"सोने से पहले ढक्कन खोलिएगा," उसने कहा। "तकिए के पास रख दीजिएगा। जो दिखे, वही आपका।"
"और दाम?" मेहर ने पूछा।
"सौ रुपये। और एक शर्त — सपना किसी को बताइएगा मत, जब तक वो पूरा न हो जाए।"
मेहर ने पैसे दिए — आधा मज़ाक में, आधा किसी अजीब-सी उम्मीद में। बोतल पर कागज़ की पट्टी चिपकी थी: "नीली खिड़की वाला ख़्वाब"।
उसका नाम विवान था। ये बात मेहर को तीन रातों बाद पता चली।
(AI generated illustration)
उस रात मेहर ने ढक्कन खोला और बोतल तकिए के पास रख दी। आधी रात को उसकी आँख खुली — नहीं, वो जागी नहीं थी। वो सपने में थी, और सपना इतना साफ़ था कि उसकी साँसें तक सुनाई दे रही थीं।
वो अपनी ही गली में खड़ी थी। गली के आख़िर में एक नीला दरवाज़ा था — ऐसा दरवाज़ा जो उसने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं देखा था। दरवाज़े के पास एक पुरानी लालटेन जल रही थी, और उसके नीचे खड़ा एक लड़का उसे देखकर मुस्कुरा रहा था।
उसने मेहर का नाम लिया — इससे पहले कि मेहर कुछ कहती।
"तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?" मेहर ने सपने में पूछा।
"जिस तरह तुम्हें ये दरवाज़ा पता चला," लड़के ने कहा, और उसके हाथ में चमेली का एक फूल थमा दिया। "कल आना। मैं इंतज़ार करूँगा।"
मेहर की आँख तीन बजे खुली। तकिए के पास चमेली की एक पंखुड़ी पड़ी थी।
अगले दिन दोपहर को वो अपनी गली से गुज़री — और उसके क़दम ठिठक गए। दर्ज़ी की दुकान और पुरानी हवेली के बीच, एक नीला दरवाज़ा था। वही दरवाज़ा। जिसे वो सौ बार पार कर चुकी थी, बिना देखे।
दरवाज़े के पास कोई लड़का नहीं था। सिर्फ़ एक पुरानी लालटेन हवा में झूल रही थी।
उस शाम वो फिर मेले गई। विवान दुकान पर था — ऐसे जैसे वो जानता हो कि वो आएगी।
"तुम्हें कैसे पता था वो दरवाज़ा वहाँ है?" मेहर ने सीधे पूछा।
"मुझे नहीं पता था," विवान ने धीरे से कहा। "ख़्वाब को पता था।"
फिर उसने बताया — उसकी दादी कहती थीं कि कुछ ख़्वाब सपने नहीं होते, वो "उधार के कल" होते हैं। जो होना ही है, वो कभी-कभी रात को पहले दिख जाता है। विवान बस उन्हें बोतलों में बंद कर देता है। "मैं चुनता नहीं, मेहर। बोतलें ख़ुद चुनती हैं — किसे कौन-सा कल चाहिए।"
मेहर ने दूसरी बोतल उठाई। पट्टी पर लिखा था — "बारिश वाली रात"।
(AI generated illustration)
अगली शाम आसमान साफ़ था। मौसम विभाग ने बारिश की कोई संभावना नहीं जताई थी। फिर भी सात बजे बादल घिर आए — ऐसे जैसे किसी ने आसमान पर पर्दा खींच दिया हो।
मेहर मेले पहुँची तो विवान दुकान बंद कर रहा था। पहली बूंद उसके माथे पर गिरी, और फिर बारिश ऐसी बरसी जैसे बरसों की प्यास एक साथ बुझ रही हो।
दोनों शामियाने के नीचे खड़े थे। विवान की कुर्ते की आस्तीन भीग गई थी। मेहर ने बिना सोचे उस गीली आस्तीन को छुआ — और फिर अपना हाथ हटाया नहीं।
वो इतने क़रीब थे कि बारिश की आवाज़ के बीच एक-दूसरे की साँसें सुनाई दे रही थीं। विवान का चेहरा उसकी ओर झुका। मेहर की पलकें झपकीं।
तभी बादल गरजा — ज़ोर से — और दोनों हँस पड़े। उनके माथे लगभग टकरा गए थे।
"डर गईं?" विवान ने पूछा।
"तुमसे नहीं," मेहर ने कहा। "इस रात से — जो ख़त्म नहीं होनी चाहिए।"
उस रात मेहर ने तीसरी बार दुकान का रुख किया। अलमारी की सबसे ऊपरी तख़्ती पर एक खाली बोतल रखी थी। पट्टी पर लिखा था — "उस रात के बाद"।
"इसकी क़ीमत?" मेहर ने पूछा।
विवान खामोश हो गया। लालटेन की रोशनी में उसका चेहरा कुछ पल के लिए बहुत दूर लगा।
"ये बिकाऊ नहीं है," उसने कहा। "ये मेरी है।"
"तुम्हारी? मतलब?"
"मैं सबके कल उधार ले सकता हूँ, मेहर। बस अपना नहीं।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "मेरा अपना कल हमेशा खाली रहता है — जैसे कोई पन्ना जिस पर स्याही ही न उतरी हो। दादी कहती थीं, ख़्वाब बेचने वाला कभी एक जगह नहीं रुकता। मेला ख़त्म, दुकान बंद — और मैं अगले शहर।"
मेहर की साँस अटक गई। "तो ये खाली बोतल…?"
"वो ख़्वाब जो मैंने कभी खोलने की हिम्मत नहीं की। वो रात, जब ये मेला ख़त्म हो जाए।"
मेहर ने बोतल उठाई। वो हल्की थी — और फिर भी उसके हाथ काँप रहे थे।
"तो आज रात इसे खोलते हैं," उसने कहा।
(AI generated illustration)
मेले की आख़िरी रात थी। हर तरफ़ लालटेनें जल रही थीं। विवान बोतलें संदूक में रख रहा था — जाने की तैयारी।
मेहर आई, उसके हाथों से खाली बोतल ली, और ख़ुद उसका ढक्कन खोल दिया।
"अब ये तुम्हारी नहीं रही," उसने कहा। "अब ये हमारी है।"
वो दोनों पुरानी हवेली की छत पर चढ़ गए। नीचे मेला सिमट रहा था, ऊपर तारे ऐसे चमक रहे थे जैसे किसी ने आसमान में दीये जला दिए हों।
विवान ने उसका हाथ थामा। मेहर ने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया।
"तुम्हें डर नहीं लगता?" विवान ने पूछा। "कि कल क्या होगा — ये ख़्वाब भी न बता पाए?"
मेहर ने उसका चेहरा अपनी ओर किया। "कल जो होगा, वो हम ख़ुद लिखेंगे। बोतल में बंद करके नहीं — जीकर।"
और फिर उसके होंठ उसके होंठों से मिले — धीरे, जैसे पहली बारिश की बूंद ज़मीन को छूती है। उस पल विवान ने पहली बार अपना कल देखा — उधार का नहीं, अपना। एक छत, एक लड़की, और एक बोतल जो अब कभी खाली नहीं रहेगी।
उस रात के बाद क्या हुआ, ये कोई नहीं जानता — सिवाय उस बोतल के, जो अब मेहर की खिड़की पर रखी है। वो हर रात हल्की-सी जगमगाती है… किसी ऐसे ख़्वाब से, जिसका कोई अंत नहीं।
और विवान? वो अब भी ख़्वाब बेचता है — बस अब उसके अपने कल भी किसी की तकिए के पास रखे जाते हैं।



Comments
Post a Comment