(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।)
बारिश की उस रात लैंडौर की ढलान पर बादल इतने नीचे उतर आए थे कि सड़क की बत्तियाँ भी धुँध में डूबी हुई लग रही थीं। मेहर ने दुकान का शटर आधा ही गिराया था कि घंटी बजी और भीगा हुआ एक अजनबी अंदर आ गया। वह अट्ठाईस साल की थी और अपने दादाजी की पुरानी चश्मों की दुकान चलाती थी, जिसका नाम था 'नज़र'। दुकान छोटी थी, पर उसकी लकड़ी की अलमारियों में दशकों पुराने फ्रेम, पीतल के डिब्बे और काँच की चमकती हुई शीशियाँ सजी रहती थीं।
अजनबी ने कोट से पानी झाड़ा और मुस्कुराकर कहा, "माफ़ कीजिए, क्या कोई पढ़ने का चश्मा मिल जाएगा? मेरी किताब की लाइनें धुँधली हो रही हैं।" मेहर ने उसे नीचे की शेल्फ़ से दो-तीन फ्रेम दिखाए, पर उसकी नज़र बार-बार ऊपर के ताक़ पर रखे एक पुराने पीतल के चश्मे की तरफ़ जा रही थी। वह चश्मा किसी को नहीं बेचा जाता था। दादाजी कहा करते थे, "बेटा, यह चश्मा हर किसी की आँख पर नहीं चढ़ता।"
"वह वाला?" अजनबी ने पूछा। मेहर ने जल्दी से कहा, "वह बिकाऊ नहीं है।" पर तभी अजीब बात हुई। अजनबी ने जैसे ही वह चश्मा हाथ में लिया, उसकी शीशियों पर जमी धुंध अपने आप छँट गई, जैसे किसी ने भीतर से काँच पोंछ दिया हो।
"अयान," उसने अपना नाम बताया। "मैं पुरानी लाइब्रेरी की मरम्मत के लिए आया हूँ।" वह इकतीस साल का था, और उसके हाथों में पुराने नक्शों की स्याही की हल्की-सी खुशबू बसी हुई थी। मेहर ने चाय बनाई और दोनों काउंटर के पास बैठ गए। अयान ने बताया कि वह हर बरसात में किसी न किसी पहाड़ी कस्बे में जाता है, पर लैंडौर की हवा उसे किसी पुरानी याद की तरह लगती है, जिसे वह कभी जीया ही नहीं।
मेहर हँस पड़ी, "यहाँ आने वाला हर दूसरा आदमी यही कहता है।" पर अयान हँसा नहीं। उसने धीरे से कहा, "मैं मज़ाक़ नहीं कर रहा। जब मैंने वह चश्मा लगाया, तो मुझे एक बाग़ दिखा। गेंदे के फूल, भीगी हुई पगडंडी, और उस पगडंडी पर हँसती हुई एक लड़की। वह लड़की तुम थीं।"
मेहर का हाथ चाय के कप पर रुक गया। उसने वह चश्मा हज़ारों बार देखा था, पर कभी लगाया नहीं था। दादाजी ने मना किया था, "जिस दिन इसे लगाओगी, उस दिन तुम्हारी नज़र बदल जाएगी।" मेहर ने इसे बचपन की कहानी समझकर हँस दिया था। पर अब एक अजनबी उसी चश्मे से उसका चेहरा देखकर आया था।
पीतल का चश्मा
अगली सुबह मेहर ने दुकान का पुराना रजिस्टर खोला। उसमें हर चश्मे की कहानी दर्ज थी, सिवा इस पीतल वाले के। उसके पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी, दादाजी की टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में: "यह चश्मा किसी को नहीं दिखाता, सिवा उस एक नज़र के, जिसमें वह खुद पूरा दिखे।"
उसी शाम अयान फिर आया। इस बार उसके हाथ में एक पुराना पोस्टकार्ड था, जिसके पीछे उसकी माँ की लिखावट थी: "लैंडौर की 'नज़र' दुकान तक एक दिन ज़रूर जाना।" अयान ने बताया कि उसकी माँ बरसों पहले इसी दुकान में आई थीं और उन्होंने भी यही पीतल का चश्मा लगाया था। शीशियाँ उनके लिए भी साफ़ हो गई थीं, और उनमें उन्हें एक आदमी दिखा था, जो बाद में उनके पति बने, अयान के पिता।
मेहर की साँस अटक गई। "तो यह चश्मा भविष्य नहीं दिखाता," उसने धीरे से कहा, "यह वह पल दिखाता है, जब कोई पहली बार किसी को सचमुच देख लेता है।" अयान ने सिर हिलाया। "पर मैंने तुम्हें पहले कभी देखा ही नहीं। फिर वह बाग़, वह हँसी, वह सब क्या था?"
मेहर ने चश्मा उठाया और पहली बार अपनी आँखों पर लगाया। शीशियाँ एक पल के लिए धुँधली रहीं, फिर साफ़ हो गईं। उसमें उसे वही बाग़ दिखा, गेंदे के फूलों से भरा, भीगी पगडंडी, और उस पगडंडी पर चलता हुआ अयान, जो उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रहा था। मेहर ने चश्मा उतार दिया और दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए। शीशियाँ दोनों के लिए साफ़ हुई थीं, और दोनों ने एक ही बाग़ देखा था।
पर उसी रात एक और सच सामने आया। अयान को एक संदेश मिला: लाइब्रेरी का काम तीन दिन में खत्म हो रहा है, और उसके बाद उसे नीचे शहर लौटना होगा। उसकी अगली परियोजना का काम उसे दिल्ली बुला रहा था। अगर वह चला गया, तो क्या यह कहानी भी दादाजी की कहानी की तरह अधूरी रह जाएगी? मेहर ने कुछ नहीं कहा। वह जानती थी कि किसी को रोकना प्रेम नहीं होता, पर छोड़ना भी आसान नहीं होता।
दादाजी की डायरी
रात भर बारिश होती रही। सुबह मेहर ने दादाजी की पुरानी डायरी खोली, जो दुकान के पीछे की अलमारी में रखी थी। एक पन्ने पर लिखा था: "मैंने यह चश्मा अपनी सबसे सच्ची नज़र से बनाया है। यह उसी को साफ़ दिखेगा, जिसकी नज़र में दूसरा व्यक्ति पूरा दिखे, बिना किसी शर्त के। मेरी अपनी नज़र एक दिन धुँधली हो गई थी, इसलिए मैंने इसे ताक़ पर रख दिया।"
आगे लिखा था कि दादाजी की प्रेमिका एक बरसात में लैंडौर छोड़कर चली गई थी, और उसके बाद उन्होंने कभी वह चश्मा नहीं लगाया। वह चश्मा दशकों तक ताक़ पर पड़ा रहा, हर आने वाले की आँख पर धुँधला, जब तक एक दिन अयान की माँ नहीं आईं। मेहर ने डायरी बंद कर दी। उसे समझ आ गया कि चश्मा कोई जादू नहीं था, वह सिर्फ़ एक आईना था, जो दो लोगों की नज़रों को मिला देता था।
उस शाम मेहर ने अयान को डायरी दिखाई। अयान देर तक चुप रहा, फिर बोला, "मेरी माँ कहती थीं कि प्रेम वह नहीं, जो तुम किसी में ढूँढो। प्रेम वह है, जो तुम किसी को देखकर पहचान लो, जैसे अपना ही कोई भूला हुआ गीत।" मेहर मुस्कुरा पड़ी। पहली बार उस बरसात में, दिल खोलकर।
अयान ने कहा, "मैं तीन दिन में नहीं जाऊँगा।" मेहर ने पूछा, "फिर?" अयान ने कहा, "लाइब्रेरी का काम बढ़ गया है। पुरानी किताबों की एक और अलमारी मिली है, जिसकी मरम्मत में एक महीना लगेगा। मैंने हाँ कह दी है।" मेहर जानती थी कि यह बहाना भी था और सच भी। कुछ फैसले बहाने से ही शुरू होते हैं।
वो बाग़ जो अभी देखा नहीं था
अगले हफ़्ते दोनों ने वह बाग़ ढूँढा, जो चश्मे में दिखा था। वह लैंडौर से थोड़ा नीचे, एक पुरानी कोठी के पीछे था, गेंदे के फूलों से भरा, भीगी पगडंडी के साथ। कोठी की मालकिन ने बताया कि यह बाग़ बरसों से बंद था, पर बरसात में उसके फूल अपने आप खिल उठते हैं। मेहर और अयान पगडंडी पर चले, ठीक वैसे ही, जैसे चश्मे में दिखा था।
बारिश फिर शुरू हो गई, हल्की-सी, फूलों की खुशबू के साथ। अयान ने मेहर का चेहरा अपने हाथों में लिया, उसकी आँखों में देखा, और धीरे से उसके होंठों को चूम लिया, एक लंबा, सच्चा चुंबन, जिसमें बरसात की सारी ठंड पिघल गई। उस रात की कहानी वहीं, गेंदे के फूलों की खुशबू में ही रह गई।
सुबह जब दुकान की घंटी बजी, तो ताक़ पर पीतल का चश्मा अपनी जगह पर था, शीशियाँ साफ़, जैसे किसी की नज़र का इंतज़ार कर रहा हो। मेहर ने दादाजी की डायरी में एक नई लाइन लिखी: "चश्मा अब साफ़ दिखता है, क्योंकि नज़रें मिल गई हैं।" और दुकान के बाहर बारिश में भीगी हुई सड़क पर दो लोगों के कदमों की आहट एक साथ सुनाई दे रही थी।
(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।)
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