आन्या ने आईने में देखा, और आईने में उसका अपना चेहरा नहीं था।
उसमें कबीर का चेहरा था — जबकि कबीर उसके पीछे खड़ा था, और आईना दीवार की तरफ़ मुँह किए था।
“ये… ये क्या है?” उसकी आवाज़ में डर से ज़्यादा हैरानी थी।
कबीर ने धीरे से कहा, “अगर मुझे पता होता, तो मैं इस कोठी का ताला कभी न खोलता।”
शीश कोठी
जयपुर के जोहरी बाज़ार से थोड़ा आगे, एक गली के आख़िरी सिरे पर शीश कोठी खड़ी थी — डेढ़ सौ साल पुरानी, बंद दरवाज़ों वाली। उनतीस साल की आन्या दिल्ली से आई थी, पुरानी हवेलियों की तस्वीरें खींचने वाले एक प्रोजेक्ट के लिए। कैमरा गले में था, जेब में कोठी की चाबियाँ।
इकतीस साल का कबीर उसी बाज़ार में पुरानी चीज़ों की मरम्मत की दुकान चलाता था। कोठी की देखभाल का ज़िम्मा उसके परिवार पर तीन पीढ़ियों से था।
“ऊपर वाली मंज़िल पर मत जाना,” उसने कहा था। “सीढ़ियाँ कमज़ोर हैं।”
आन्या ऊपर वाली मंज़िल पर ही गई थी।
दूसरी मंज़िल के आख़िरी कमरे में, धूल की मोटी चादर के नीचे, एक लंबा अंडाकार आईना खड़ा था — पीतल के फ्रेम वाला, जिस पर बारीक़ नक़्क़ाशी थी। उसके नीचे, फ्रेम पर छोटे-छोटे अक्षरों में कुछ खुदा था। आन्या ने धूल पोंछी और पढ़ा — “यह आईना सिर्फ़ सच दिखाता है।”
उसने हँसकर आईने में देखा। और हँसी उसके गले में ही अटक गई।
आईने में कबीर था।
जिसका नाम सोच में हो
कबीर सीढ़ियों की आवाज़ सुनकर ऊपर आया। “मैंने मना किया था—” कहते-कहते वो रुक गया। आन्या का हाथ आईने की तरफ़ था, और काँप रहा था।
“तुम पीछे खड़े हो,” आन्या ने कहा। “आईना दीवार की तरफ़ है। फिर इसमें तुम्हारा चेहरा क्यों है?”
कबीर ने आईने में देखा। एक पल के लिए आईना ख़ाली रहा — फिर उसमें आन्या का चेहरा उभर आया।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। किसी ने कुछ नहीं कहा।
उस शाम, दुकान के पीछे वाले कमरे में, कबीर ने एक पुराना रजिस्टर निकाला — कोठी की चीज़ों की सूची, जो उसके दादा ने लिखी थी। आईने के आगे लिखा था: “शीशा-ए-सच। उस्ताद रहीम, सन 1874। जिसके सामने खड़ा हो, उसे वो चेहरा दिखाता है जो उसी वक़्त उसे सोच रहा हो।”
“तो परख लो,” कबीर ने कहा। “अपनी माँ के बारे में सोचो।”
आन्या ने आँखें बंद कीं और अपनी माँ के बारे में सोचा — दिल्ली में, जो इस वक़्त यही सोच रही होगी कि बेटी ने खाना खाया होगा या नहीं। उसने आईने में देखा।
आईने में उसकी माँ का चेहरा था — चाय की प्याली हाथ में, माथे पर वही चिंता की लकीर।
आन्या का कैमरा हाथ से छूटते-छूटते बचा।
“अब तुम,” उसने कबीर से कहा।
कबीर ने आईने में देखा। आईने में आन्या थी — कैमरा गले में, आँखों में सवाल।
“मैं तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था,” कबीर ने धीरे से कहा।
आन्या ने नज़रें झुका लीं। कोठी की ख़ामोशी में, उस एक लाइन ने हवा का रंग बदल दिया था।
उस्ताद रहीम का ख़त
अगले दिन आन्या कोठी के भंडार-कक्ष में गई। सबसे नीचे वाले बक्से में, एक कपड़े में लिपटा हुआ, उस्ताद रहीम का ख़त मिला — 1874 का, स्याही फीकी पड़ चुकी थी, मगर अक्षर अब भी पढ़े जा सकते थे।
“नूर, तुम्हारी शादी दूसरे शहर में हो गई। मैं जानता हूँ, अब तुम मेरी नहीं हो। मगर मैंने एक आईना बनाया है — जो तुम्हें मेरा चेहरा दिखाएगा, जब-जब मैं तुम्हें सोचूँगा। और मुझे तुम्हारा चेहरा दिखाएगा, जब-जब तुम मुझे सोचोगी। दूरियाँ इस आईने के सामने हार जाती हैं। — रहीम”
आन्या ने ख़त सीने से लगा लिया। “तो ये आईना दो लोगों के लिए बना था — एक कारीगर और उसकी नूर के लिए।”
उस रात आन्या अकेली आईने के सामने गई। उसने आँखें बंद कीं और कबीर के बारे में सोचा।
आईने में एक बूढ़ी औरत का चेहरा था — सफ़ेद बाल, झुर्रियों में छिपी हुई मुस्कान, आँखों में डेढ़ सौ साल पुराना इंतज़ार।
आन्या की साँस रुक गई। ये कबीर नहीं था — कोई और था, जो इस वक़्त भी किसी को सोच रहा था।
उसने कबीर को बुलाया। कबीर ने आईने में देखा, और उसका चेहरा पीला पड़ गया।
“ये नूर है,” उसने कहा। “रहीम की नूर। अस्सी साल की।”
“मगर नूर तो—” आन्या ने कहा, और रुक गई।
“आईना वक़्त को नहीं मानता,” कबीर ने धीरे से कहा। “जो सोच कभी ख़त्म नहीं हुई, वो इसमें अब भी दिखती है। नूर अब भी रहीम को सोच रही है — कहीं, किसी वक़्त में।”
“तो ये आईना सिर्फ़ चेहरा नहीं दिखाता,” आन्या ने कहा। “ये बताता है कि कौन-सी सोच कभी मरी नहीं।”
आईने के सामने
अगली शाम, जब आन्या को दिल्ली लौटना था, वो आख़िरी बार कोठी आई। उसका बैग पैक था, टैक्सी नीचे इंतज़ार कर रही थी। कबीर आईने वाले कमरे में खड़ा था।
“मैं जा रही हूँ,” आन्या ने कहा।
“जानता हूँ,” कबीर ने कहा। “और इस आईने के सामने झूठ नहीं बोला जा सकता।”
दोनों आईने के सामने खड़े हो गए। आईने में अब दो चेहरे थे — पहली बार, एक साथ।
“मैंने आज सुबह से तुम्हारे सिवा कुछ नहीं सोचा,” कबीर ने कहा। “और मुझे डर है कि अगर तुम चली गईं, तो ये आईना मुझे तुम्हारा चेहरा हर रोज़ दिखाएगा — और मैं उसे देखकर ही जीता रहूँगा, जैसे रहीम जिया था।”
आन्या की आँखों में आँसू आ गए। “और मैं डरती हूँ,” उसने कहा, “कि दिल्ली जाकर मैं हर आईने में तुम्हें ढूँढूँगी, और कोई आईना मुझे तुम नहीं देगा।”
कबीर ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा। आन्या ने हाथ पीछे नहीं खींचा।
वो एक-दूसरे के इतने क़रीब आ गए कि आईने में दोनों के चेहरे एक ही फ्रेम में समा गए। कबीर ने उसका चेहरा हथेलियों में लिया, जैसे कोई नाज़ुक शीशा थाम रहा हो। आन्या ने आँखें बंद कर लीं। उसका माथा कबीर के माथे से टिका, और उस पल कोठी की सारी ख़ामोशी दो धड़कनों में सिमट गई।
उसने उसके माथे को चूमा — धीरे से, जैसे कोई वादा लिख रहा हो। फिर उनके होंठ मिले, और आन्या को लगा जैसे डेढ़ सौ साल पुराना कोई इंतज़ार उसी पल पूरा हो गया हो। बाहर जोहरी बाज़ार की आवाज़ें थीं, अंदर सिर्फ़ आईने की सुनहरी चमक — और उस रात जो कुछ हुआ, वो उस आईने और उन दोनों के बीच ही रहा।
दरार
जब आन्या ने आँखें खोलीं, तो आईने में कुछ बदल गया था।
फ्रेम के एक कोने से एक महीन-सी दरार शुरू हुई — धीरे-धीरे, जैसे कोई पुरानी चीज़ अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करके टूट रही हो। दरार बीच तक आई और रुक गई।
“आईना टूट रहा है,” आन्या ने कहा।
कबीर ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं। आईना अपना काम पूरा कर रहा है। रहीम ने इसे इसलिए बनाया था कि दो लोग एक-दूसरे को सोचें — और जिस दिन दोनों सामने आकर यही कह दें, आईने की ज़रूरत ख़त्म।”
आन्या ने टैक्सी वाले को फ़ोन करके मना कर दिया।
आज दरार वाला आईना कबीर की दुकान में, सबसे ऊँची जगह पर टँगा है — और कहते हैं, शाम ढलते ही उसमें कभी-कभी दो चेहरे एक साथ दिख जाते हैं।
और बहुत ध्यान से देखने पर, उसके पीछे दो और चेहरे — एक कारीगर और उसकी नूर — मुस्कुराते दिखते हैं।
जैसे आईने ने आख़िरकार अपनी कहानी पूरी कर ली हो।



Comments
Post a Comment