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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

वो लाइटहाउस जो सिर्फ़ एक जहाज़ के लिए जलता था

Full moon over an old stone lighthouse, beam sweeping across the sea

(AI generated illustration)

रात के दो बजे थे, और ज़ोया लाइटहाउस की गैलरी पर खड़ी समंदर को देख रही थी — जब किरण के बीच में एक जहाज़ आ गया।

कोई आवाज़ नहीं। कोई इंजन नहीं। सिर्फ़ एक पुराना जहाज़, जिसके पाल हवा में ऐसे फूल रहे थे जैसे समंदर ने उसे अभी-अभी अपनी गोद से उठाया हो। ज़ोया ने कैमरा उठाया, मगर शटर दबाने से पहले ही जहाज़ किरण से बाहर निकल गया — और अँधेरे में ऐसे ग़ायब हो गया, जैसे कभी था ही नहीं।

उसकी साँस अटकी रह गई। क्योंकि एक बात वो अच्छी तरह जानती थी — ये लाइटहाउस चालीस साल से बुझा हुआ था। इसकी किरण आज रात जलनी ही नहीं चाहिए थी।

बुझा हुआ लाइटहाउस

सत्ताईस साल की ज़ोया समंदर की फ़ोटोग्राफ़र थी। दुनिया के कई किनारों पर उसने लहरों की तस्वीरें खींची थीं, मगर इस एक किनारे पर वो पंद्रह साल बाद लौटी थी — द्वारका के पास वाले उस छोटे-से तट पर, जहाँ उसके दादा बदरुद्दीन ने चालीस साल तक लाइटहाउस की रखवाली की थी।

दादा अब नहीं थे। उनकी डायरी ज़ोया के बैग में थी, और डायरी का आख़िरी पन्ना अधूरा था — जैसे लिखते-लिखते हाथ रुक गया हो।

"आज पूर्णिमा है। अगर ये रोशनी एक बार फिर जले, तो जहाज़ वापस आएगा।"

ज़ोया ने वो पन्ना दस बार पढ़ा था। कौन-सा जहाज़? क्यों वापस आएगा? दादा ने कभी बताया नहीं था। गाँव के बूढ़े लोग बस इतना कहते थे — सन् 1984 की एक पूर्णिमा की रात, जहाज़ "नूर जहाँ" इसी तट के सामने डूब गया था। उसके कप्तान यूसुफ़ थे, और जहाज़ पर लाइटहाउस के लिए एक नया लैंप आ रहा था — पोरबंदर से। लैंप कभी नहीं पहुँचा। लाइटहाउस उसी रात से बुझा हुआ है।

"दादा ने चालीस साल तक एक बुझे हुए लाइटहाउस की रखवाली क्यों की?" ज़ोया ने पहली रात गैलरी पर खड़े होकर समंदर से पूछा था। समंदर ने कोई जवाब नहीं दिया था।

वो जहाज़ जो रडार पर नहीं था

दूसरी रात, ज़ोया फिर गैलरी पर थी। कैमरा तैयार था, टॉर्च बुझी हुई थी। और ठीक दो बजे — वही जहाज़। वही पाल। वही ख़ामोशी। इस बार ज़ोया ने शटर दबा दिया।

सुबह उसने तस्वीर कोस्ट गार्ड के दफ़्तर में दिखाया। वहाँ बैठा अफ़सर तीस साल का रेहान था — चौड़ी कलाई, शांत आँखें, और आवाज़ में वो ठहराव जो सिर्फ़ समंदर के लोगों में होता है।

रेहान ने तस्वीर को देर तक देखा। "ये जहाज़ रडार पर नहीं था," उसने धीरे से कहा। "कल रात इस इलाके में कोई जहाज़ था ही नहीं।"

"तो मैंने क्या देखा?" ज़ोया की आवाज़ में ग़ुस्सा था — मगर ग़ुस्से के नीचे डर भी था। "मैंने अपनी आँखों से देखा है। दो रात — एक ही वक़्त, एक ही जगह।"

रेहान ने उसकी तरफ़ देखा, और एक पल के लिए उसकी शांत आँखों में कुछ हिल गया। "मेरे दादा कप्तान यूसुफ़ थे," उसने कहा। "उसी जहाज़ के कप्तान। चालीस साल से मेरे घर में उनकी तस्वीर के सामने एक दिया जलता है — बिना किसी ने जलाए, वो कभी बुझता नहीं।"

ज़ोया के हाथ से तस्वीर छूटते-छूटते बची।

उसी शाम दोनों लाइटहाउस के नीचे वाले कमरे में दादा की डायरी खोलकर बैठे। डायरी के बीच में एक पुराना नक़्शा था — और नक़्शे के कोने पर दो नाम लिखे थे, एक ही स्याही से, एक ही हाथ से: "बदरुद्दीन — रखवाला। यूसुफ़ — कप्तान।"

रेहान ने नक़्शे को छुआ तो उसकी उँगलियाँ ज़ोया की उँगलियों से टकरा गईं। दोनों ने हाथ पीछे नहीं खींचे। उस एक छुअन में चालीस साल की ख़ामोशी पिघल गई — जैसे दो किनारे, जो समंदर के दो तरफ़ थे, अचानक एक ही लहर पर आ गए हों।

Couple lighting a large brass lighthouse lamp together

(AI generated illustration)

दो हाथ, एक रोशनी

डायरी के आख़िरी पन्ने पर, अधूरी लाइन के नीचे, एक और लाइन थी — इतनी हल्की कि ज़ोया ने पहले देखी ही नहीं थी:

"रोशनी अकेले हाथ से नहीं जलती।"

उस रात पूर्णिमा थी। चाँद समंदर पर चाँदी की सीढ़ियाँ बिछा रहा था। ज़ोया और रेहान लैंप वाले कमरे में थे — पुराना लैंप, जिस पर चालीस साल की धूल थी। ज़ोया ने उसे साफ़ किया, रेहान ने तेल भरा। और जब दोनों ने एक साथ लैंप की चाबी घुमाई, तो कुछ ऐसा हुआ जो दोनों ने कभी नहीं देखा था।

लैंप जला — मगर उसकी रोशनी पीली नहीं थी। वो रोशनी चाँदनी जैसी सफ़ेद थी, और वो सीधी समंदर की तरफ़ नहीं, आसमान की तरफ़ उठी — जैसे किसी को बुला रही हो।

और समंदर ने जवाब दिया।

किरण के बीच में, धीरे-धीरे, "नूर जहाँ" उभरने लगा। इस बार वो धुंधला नहीं था। उसके पाल साफ़ दिख रहे थे, उसकी डेक पर लोग खड़े थे — पुराने ज़माने के कपड़ों में, मगर चेहरों पर कोई डर नहीं, सिर्फ़ इंतज़ार था। और सबसे आगे खड़े थे एक बूढ़े कप्तान — जिनकी आँखें रेहान की आँखों जैसी थीं।

ज़ोया की आँखों में आँसू आ गए। "वो तुम्हें देख रहे हैं," उसने फुसफुसाकर कहा।

रेहान ने उसका हाथ थाम लिया — कसकर, जैसे समंदर में डूबते आदमी ने किनारा पकड़ लिया हो। जहाज़ की डेक से एक लैंटर्न उठी, और उसकी रोशनी ने लाइटहाउस की किरण को छू लिया। दो रोशनियाँ मिलीं — और एक पल के लिए पूरा समंदर रौशन हो गया।

उसी पल, गैलरी पर हवा तेज़ हो गई। ज़ोया का दुपट्टा उड़ा, रेहान ने उसे पकड़कर उसके कंधे पर रखा। उनकी आँखें मिलीं — और उस नज़र में वो सब कुछ था जो दो रातों से, दो पीढ़ियों से, अधूरा पड़ा था। रेहान ने धीरे से उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिया। ज़ोया ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ एक-दूसरे के इतने क़रीब आ गए कि साँसें टकराने लगीं —

और रात ने पर्दा डाल दिया।

चाँद बादलों के पीछे छिप गया, किरण धीमी हो गई, और समंदर ने अपनी कहानी अपने पास रख ली।

Ghostly old sailing ship glowing in a beam of light over a moonlit sea

(AI generated illustration)

रोशनी पहुँच गई

सुबह जब ज़ोया की आँख खुली, तो वो गैलरी की रेलिंग से टिकी हुई थी, और रेहान उसके पास बैठा था — दोनों के बीच में वही पुरानी डायरी खुली हुई थी।

डायरी का अधूरा पन्ना अब अधूरा नहीं था।

आख़िरी लाइन के नीचे, उसी पुरानी स्याही से, एक नई लाइन लिखी हुई थी — किसी ने रात में लिखी थी, या रोशनी ने ख़ुद लिख दी थी, ये कोई नहीं जानता:

"रोशनी पहुँच गई।"

और गैलरी के कोने में, जहाँ रात को कोई नहीं गया था, एक पीतल का लैंटर्न रखा था — बिल्कुल नया, जैसे अभी-अभी किसी जहाज़ से उतारा गया हो।

ज़ोया ने लैंटर्न उठाया। रेहान ने उसकी तरफ़ देखा। दोनों मुस्कुरा दिए — वो मुस्कुराहट, जो सिर्फ़ उन लोगों के चेहरे पर आती है जिन्होंने एक साथ कोई राज़ देख लिया हो।

उस दिन से लाइटहाउस फिर से जलता है — हर पूर्णिमा की रात को। गाँव के लोग कहते हैं, अब इस तट पर कभी कोई जहाज़ नहीं डूबता। और जो लोग रात को गैलरी के पास से गुज़रते हैं, वो कहते हैं — कभी-कभी वहाँ दो परछाइयाँ दिखती हैं, कंधे से कंधा मिलाए, समंदर की तरफ़ देखते हुए। और समंदर के बीचों-बीच, किरण के आख़िरी सिरे पर, एक जहाज़ की रोशनी जवाब देती है — जैसे कह रही हो:

अब ये रोशनी कभी नहीं बुझेगी।

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