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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

वो घड़ी जो उल्टी चलती थी

आधी रात को घड़ी की सुई पीछे हटी — और अयान की साँस रुक गई।

मसूरी की पतली गली में बंद दुकानों के बीच उसकी छोटी सी घड़ी-दुकान की एकमात्र बत्ती जल रही थी। दीवार पर सौ घड़ियाँ टिक-टिक करती थीं, मगर अयान की हथेली पर रखी पीतल की पॉकेट-घड़ी उल्टी दिशा में चल रही थी। बारह से ग्यारह, ग्यारह से दस — जैसे वक़्त पीछे लौट रहा हो।

उल्टी चलती घड़ी

यह घड़ी उसकी दादी ज़ेबा की थी। दादी के जाने के बाद अयान को एक लकड़ी के डिब्बे में यह घड़ी मिली थी, साथ में एक मुड़ा हुआ पर्चा — “इस घड़ी को तब तक मत खोलना, जब तक दिल न कहे।” अयान ने वह पर्चा तीन साल तक दराज़ में सँभालकर रखा। उस रात, जब दुकान की आख़िरी घड़ी भी बंद हो गई और गली में सिर्फ़ बारिश की आवाज़ बची, उसने डिब्बा खोला।

ढक्कन खुलते ही घड़ी की सुई काँपी, फिर उल्टी चलने लगी। अयान ने हँसकर उसे मेज़ पर रख दिया — पुरानी घड़ियों में ऐसा होता है, सोचा उसने। मगर आधी रात के ठीक बारह बजे, जब उसने घड़ी को हाथ में उठाया, कमरे की बत्ती एक पल के लिए बुझी और जली। दीवार की घड़ियों ने बारह बजाए। और अयान ने देखा — उसकी मेज़ पर रखा टूटा हुआ कप फिर से साबुत था।

उस रात उसे समझ आया। यह घड़ी हर आधी रात को अपने मालिक को एक घंटा पीछे ले जाती थी — वही घंटा दोबारा जीने का मौका देती थी। मगर हर रिवाइंड की एक कीमत थी, जो घड़ी के पीछे खुदी हुई एक लाइन में लिखी थी: “जो घंटा वापस लोगे, एक याद देनी होगी।” अयान ने उस लाइन को पहली बार में मज़ाक समझा।

(AI generated illustration)

एक छतरी, एक शाम

मीरा से उसकी पहली मुलाक़ात उसी बारिश में हुई थी। वह छब्बीस साल की स्कूल-टीचर थी, हाथ में अपने पिता की पुरानी दीवार-घड़ी लिए, जो बरसों से बंद पड़ी थी। “इसे ठीक कर दीजिए,” उसने कहा था, “पापा की आख़िरी निशानी है।” अयान ने घड़ी खोली, उसके पुर्ज़े देखे और बोला, “एक हफ़्ता लगेगा।” मीरा ने हँसकर कहा, “एक हफ़्ता? इस गली में तो हर चीज़ एक ही शाम में ठीक हो जाती है।”

उस शाम जब वह दुकान से निकली, बारिश तेज़ हो गई। अयान ने अपनी एकमात्र छतरी उसके ऊपर कर दी और दोनों एक ही छतरी के नीचे गली के मोड़ तक चले। भीगी हुई सड़क पर लैम्प की रोशनी फैली थी, और मीरा की हँसी बारिश की आवाज़ में घुल रही थी। अयान को उस दिन लगा, जैसे उसकी दुकान की सारी घड़ियाँ एक साथ सही वक़्त बताने लगी हों।

फिर मुलाक़ातों का सिलसिला शुरू हुआ — कभी घड़ी लेने के बहाने, कभी सिर्फ़ चाय के बहाने। मीरा को अयान की एक आदत सबसे अच्छी लगती थी: वह हर ग्राहक की घड़ी ठीक करने से पहले उससे पूछता था, “इस घड़ी के साथ आपकी कौन सी याद जुड़ी है?” मीरा कहती, “तुम घड़ियाँ नहीं, लोगों की यादें ठीक करते हो।” अयान मुस्कुरा देता। उसे नहीं पता था कि एक दिन यही बात उसकी सबसे बड़ी परीक्षा बन जाएगी।

(AI generated illustration)

टूटा हुआ घंटा

वह शाम अयान कभी नहीं भूलना चाहता था — और वही शाम टूट गई। मीरा के जन्मदिन की रात, उसने वादा किया था कि सात बजे वह उसके स्कूल के पास वाले कैफ़े में होगा। मगर एक ग्राहक की पुरानी घड़ी ने उसे दुकान में रोक लिया, और जब वह भागता हुआ कैफ़े पहुँचा, तो मीरा जा चुकी थी। फ़ोन पर उसकी आवाज़ में वह ठंडक थी, जो अयान ने पहले कभी नहीं सुनी थी। “कोई बात नहीं, अयान। तुम अपनी घड़ियों के साथ ही रहो।”

घर लौटकर अयान ने दादी की घड़ी को देखा। वह उल्टी चल रही थी, जैसे उसे बुला रही हो। उसने घड़ी को मुट्ठी में कस लिया और आधी रात का इंतज़ार किया। बारह बजते ही बत्ती बुझी-जली, और अयान ने ख़ुद को फिर से उसी शाम के सात बजे पाया — कैफ़े के दरवाज़े पर, साँस फूलती हुई, मगर वक़्त उसके हाथ में था। इस बार वह वक़्त पर पहुँचा। मीरा की आँखों में मुस्कान लौट आई, और रात हँसी-ख़ुशी गुज़र गई।

मगर अगली सुबह मीरा ने कहा, “अयान, वह गाना कौन सा था जो हम पहली बार मिले थे, तब दुकान में बज रहा था?” अयान ने जवाब दिया, “वही, जो तुमने गुनगुनाया था।” मीरा ने माथा पकड़ लिया। “मुझे याद ही नहीं आ रहा। ऐसा लगता है जैसे उस शाम का एक टुकड़ा कहीं खो गया है।” अयान का दिल धक से रह गया। घड़ी ने अपनी कीमत वसूल ली थी — और वह कीमत मीरा की याद से कटी थी।

फिर भी अयान रुका नहीं। एक छोटी सी कहा-सुनी पर उसने फिर रिवाइंड किया। इस बार मीरा भूल गई कि पहली बारिश वाली शाम अयान ने छतरी किसके ऊपर की थी। “शायद मैं ही छतरी लेकर आई थी,” वह हँसकर बोली। अयान की हँसी उसके गले में अटक गई। घड़ी हर बार वही याद खा रही थी, जिसे वे दोनों सबसे ज़्यादा सँभालकर रखते थे।

आख़िरी रिवाइंड

तीसरी बार जब अयान ने घड़ी को हाथ में लिया, तो मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया। “तुम कुछ छिपा रहे हो,” उसने धीरे से कहा। “मेरी यादें ग़ायब हो रही हैं, अयान — और हर बार जब मैं भूलती हूँ, तुम्हारी आँखों में अपराध-बोध दिखता है। सच बताओ।” अयान ने बहुत देर तक चुप रहकर सब कुछ बता दिया — घड़ी, रिवाइंड, कीमत। मीरा ने घड़ी को देखा। वह उल्टी चल रही थी, जैसे किसी और मौके का इंतज़ार कर रही हो।

“तो तुमने मेरी यादों से अपने वादे पूरे किए,” मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में ग़ुस्सा नहीं, एक गहरी उदासी थी। “अयान, मुझे ऐसी यादें नहीं चाहिए जो मेरी ही कीमत पर खरीदी गई हों। जो टूटा, उसे टूटा रहने दो। वक़्त को पीछे खींचना प्यार नहीं है — वक़्त के साथ खड़ा रहना प्यार है।”

उस रात आधी रात को घड़ी ने फिर अपना मौका दिया। बत्ती बुझी-जली, और अयान के हाथ में घड़ी की सुई काँपने लगी। एक घंटा पीछे जाने का दरवाज़ा खुला था — एक और मौक़ा, एक और सुधार, एक और याद की कीमत पर। अयान ने मीरा की ओर देखा। वह उसके पास खड़ी थी, उसकी आँखों में आँसू और भरोसा, दोनों एक साथ।

अयान ने घड़ी का ढक्कन बंद कर दिया।

उसी पल घड़ी की सुई ठहरी — फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। टिक… टिक… टिक। वह उसी मिनट पर आकर रुकी, जिस मिनट वे पहली बार मिले थे — शाम के पाँच बजकर सैंतालीस मिनट — और फिर आगे चलने लगी, जैसे उसने अपना क़र्ज़ चुका दिया हो। अयान ने घड़ी को डिब्बे में रख दिया और मीरा का हाथ थाम लिया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, मगर इस बार उसने वक़्त से कुछ नहीं माँगा।

दुकान की बत्ती के नीचे, बारिश की हल्की आवाज़ के बीच, अयान ने मीरा के चेहरे को अपने हाथों में लिया। दोनों की साँसें एक-दूसरे के क़रीब आ गईं, और वह पल — जो किसी रिवाइंड से नहीं, सिर्फ़ सच से बना था — उनके बीच ठहर गया। फिर अयान ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया, और दुनिया की सारी घड़ियाँ, एक बार फिर, सही वक़्त बताने लगीं।

(AI generated illustration)

वक़्त आगे बढ़ रहा था — और इस बार, दोनों साथ थे।

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