चिराग़ में तेल नहीं था — फिर भी वो जल रहा था।
अरमान दुकान का शटर बंद करके घर जा चुका था। रात के ग्यारह बजे थे, और लखनऊ की पुरानी गली में सन्नाटा उतर आया था। तभी उसे याद आया कि वो अपना चश्मा काउंटर पर ही भूल आया है। वो लौटा, ताला खोला, और अंदर कदम रखते ही ठिठक गया। काउंटर पर रखा पुराना पीतल का चिराग़ जल रहा था — ऊँची, सुनहरी लौ के साथ, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे छुआ हो। उसने उसे कभी जलाया ही नहीं था — उसमें तेल था ही नहीं।

(AI generated illustration)
अरमान तीस साल का था। चौक की इस पुरानी एंटीक दुकान को वो छह साल से चला रहा था — टूटी घड़ियाँ, जंग लगी चाबियाँ, पीले पड़ चुके ख़त, और ऐसी चीज़ें जिन्हें दुनिया कब की भूल चुकी थी। पर ये चिराग़ — ये एक ऐसी चीज़ थी जिसे उसने कभी छुआ तक नहीं था।
दादा की आख़िरी नसीहत
ये दुकान उसके दादा यूसुफ़ की थी। जब उन्होंने दुकान की चाबियाँ अरमान के हाथ में सौंपी थीं, तो एक ही बात कही थी — "बेटा, दुकान में जो चाहे बेच देना, पर इस चिराग़ को कभी मत बेचना। ये किसी का इंतज़ार कर रहा है।"
अरमान ने तब हँसकर कहा था, "दादा, चिराग़ इंतज़ार नहीं करते।" दादा ने जवाब में सिर्फ़ मुस्कुरा दिया था।
उस रात के बाद अरमान ने चिराग़ पर नज़र रखनी शुरू कर दी। दिन में वो बुझा रहता — ठंडा, बेजान पीतल। पर जैसे ही शाम ढलती और दुकान में आख़िरी ग्राहक निकल जाता, उसकी लौ ख़ुद-ब-ख़ुद जाग उठती। अरमान ने उसे तीन बार उठाकर स्टोर रूम में बंद किया। तीनों बार सुबह वो काउंटर पर वापस मिला — जला हुआ। चौथी बार उसने हार मान ली।
नूर की दस्तक
फिर एक दोपहर दुकान की घंटी बजी — नूर अंदर आई।
नूर सत्ताईस साल की थी — ख़तों और पुरानी किताबों को सँवारने वाली, एक कैलीग्राफ़र, जिसके हाथों में स्याही की हल्की-सी महक बसी रहती थी। उसकी बाँहों में कपड़े में लिपटा पुराना पुलिंदा था। "मुझे ये पांडुलिपियाँ सहेजनी हैं," उसने कहा। "काग़ज़ इतना नाज़ुक है कि ज़रा-सी ग़लती से बिखर जाएगा।"
जैसे ही उसने दुकान में कदम रखा, चिराग़ की लौ एकदम ऊँची हो गई — अरमान चौंककर पीछे हट गया। नूर ने भी देखा। उसकी आँखों में हैरानी थी, पर डर नहीं। "आपका चिराग़..." उसने धीरे से कहा, "ये तो ऐसे जल रहा है जैसे किसी को पहचान लिया हो।"

(AI generated illustration)
अरमान ने बात को हँसी में उड़ा दिया, पर उस दिन के बाद नूर रोज़ आने लगी। कभी एक पन्ना लेकर, कभी एक ख़त लेकर, कभी सिर्फ़ ये देखने कि चिराग़ आज कैसा है। और हर बार एक अजीब-सा सिलसिला चलता — जब वो काउंटर के पास आती, लौ तेज़ हो जाती; जब वो दूर जाती, लौ मद्धम पड़ जाती। एक शाम जब दोनों के हाथ ग़लती से एक ही पांडुलिपि पर आ टकराए, तो चिराग़ की लौ ने ऐसा झटका खाया जैसे किसी ने उसे छू लिया हो। अरमान का हाथ वहीं ठहर गया। नूर ने हाथ नहीं हटाया। कुछ पल तक दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे — और बीच में चिराग़ की लौ ऐसे नाच रही थी जैसे वो उनकी धड़कनों पर नाच रही हो।
फिर एक रात नूर एक पुराना ख़त पढ़ रही थी, और अरमान उसके कंधे के ऊपर से झाँक रहा था। दोनों ने एक साथ चिराग़ को छुआ — और अचानक दुकान ग़ायब हो गई।
उनके सामने एक रेलवे स्टेशन था। सन् 1947। भीड़, शोर, भागते लोग। और प्लेटफ़ॉर्म के छोर पर एक नौजवान शायर खड़ा था, एक लड़की का हाथ थामे हुए। लड़की रो रही थी। शायर ने उसके हाथ में यही चिराग़ थमाया और कहा, "जब तक ये जलता रहेगा, समझना मैं लौटूँगा।"
1947 की अधूरी कहानी
झलक टूटी तो दोनों हाँफ रहे थे। नूर की आँखों में आँसू थे। उसने काँपती आवाज़ में कहा, "वो लड़की मेरी दादी ज़ोया थीं।"
उस रात नूर ने पूरी कहानी सुनाई। उसकी दादी ज़ोया और शायर रेहान एक-दूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे। बँटवारे की रात रेहान को लखनऊ से जाना पड़ा। जाते-जाते उसने ज़ोया को ये चिराग़ दिया था — उनकी शादी के लिए ख़रीदा गया चिराग़, जो उस रात पहली बार जलाया गया था। रेहान कभी नहीं लौटा। ज़ोया ने उम्रभर इंतज़ार किया।
"दादी के आख़िरी ख़त में इस दुकान का पता था," नूर ने कहा। "उन्होंने लिखा था — 'अगर वो चिराग़ कभी मिले, तो समझना कि रेहान का वादा अब भी ज़िंदा है।'"
अरमान ख़ामोश था। उसका दिमाग़ कह रहा था कि ये सब मुमकिन नहीं, पर उसका दिल जानता था कि जो उसने देखा था, वो सपना नहीं था।
उन्हीं दिनों एक बिल्डर दुकान ख़रीदने आया, इतनी बड़ी रक़म लेकर कि अरमान के सारे कर्ज़ एक झटके में उतर जाते। अरमान ने दो दिन सोचा, फिर हाँ कर दी। उस रात जब उसने बिल्डर को हाँ कहा, तो दुकान में लौटकर देखा — चिराग़ बुझा हुआ था। पहली बार, इतने सालों में पहली बार, वो शाम को नहीं जला। अरमान ने उसे छुआ तो पीतल ठंडा था, जैसे किसी ने उसकी जान निकाल ली हो।
दो लौ, एक रोशनी
अगली सुबह नूर आई तो अरमान ने सब बता दिया — बिल्डर, सौदा, बुझा हुआ चिराग़। नूर ने कुछ नहीं कहा। वो बस काउंटर के पास खड़ी रही, और फिर धीरे से बोली, "तुम्हें क्या लगता है, रेहान क्यों नहीं लौटा?"
"पता नहीं," अरमान ने कहा। "शायद मजबूरी थी।"
"नहीं," नूर ने कहा, उसकी आवाज़ में एक ऐसी नरमी थी जो अरमान ने पहले कभी नहीं सुनी थी। "वो इसलिए नहीं लौटा क्योंकि उसने अपने इंतज़ार को किसी और के हवाले कर दिया था। उसने सोचा, चिराग़ इंतज़ार कर लेगा। पर इंतज़ार किसी चीज़ के हवाले नहीं किया जाता, अरमान। इंतज़ार तो जीना पड़ता है।"
फिर वो पल आया जिसके लिए वो चिराग़ उनासी साल से जल रहा था। अरमान ने नूर का हाथ थामा — इस बार ग़लती से नहीं, जान-बूझकर। "मत जाओ," उसने कहा। "ये दुकान, ये चिराग़, ये सब... मैं नहीं चाहता कि तुम सिर्फ़ पांडुलिपियाँ लेकर आओ और चली जाओ। मैं चाहता हूँ कि तुम रुको।"

(AI generated illustration)
नूर ने उसका हाथ कसकर थाम लिया। दोनों एक-दूसरे के इतने क़रीब आ गए कि उनकी साँसें एक हो गईं। नूर ने अपना माथा अरमान के माथे से टिका दिया, और दोनों की आँखें बंद हो गईं — उस पल में न कोई जल्दी थी, न कोई डर, सिर्फ़ दो दिलों की धड़कन और एक-दूसरे की गर्माहट। अरमान ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया, और वो देर तक ऐसे ही खड़े रहे।
और तभी चिराग़ जल उठा।
पर इस बार लौ एक नहीं थी — दो थीं। दो सुनहरी लौएँ, एक-दूसरे से लिपटी हुईं, एक ही रोशनी में घुली हुईं। जैसे रेहान और ज़ोया की अधूरी कहानी को आख़िरकार उसका अंजाम मिल गया हो।
अरमान ने उसी दिन बिल्डर को मना कर दिया। दुकान अब भी वहीं है — पर अब वो सिर्फ़ एंटीक की दुकान नहीं रही। एक तरफ़ अरमान पुरानी चीज़ों को नया जीवन देता है, दूसरी तरफ़ नूर पुराने ख़तों को सँवारती है। और बीच में वो चिराग़ जलता है — बिना तेल के, बस इसलिए कि अब उसे इंतज़ार नहीं करना पड़ता।
कुछ इंतज़ार सत्तर साल बाद भी ख़त्म नहीं होते। वो सिर्फ़ सही दो हाथों का इंतज़ार करते हैं।
Comments
Post a Comment